जन्त्र मन्त्र या झाड़ फूँक करनेवाला।
वाके गुनगन गुथति माल कबहूँ उरते नहिं छोरी - १० उ, ११६।
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
बहुत मोटी और भद्दी सिलाई होना।
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
बहुत मोटी और भद्दी सिलाई होना।
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
[सं. गुत्सन, प्रा. गुत्थन]
वह अंक जिसे गुणा करना हो।
लगान पर खेत देने की रीति।
पार्वती के समान सौभाग्यवती स्त्री।
सूर स्याम सबके सुखदायक लायक गुननि गुनज्ञ - पृ. ३४६ (४४)।
गुन रही है, सोच विचार रही है।
मेरौ कह्यौ नाहिंन सुनति। तबहिं ते इकटक रही है, कहा धौ मन गुनति - ७१९।
गोपियों के स्वामी श्रीकृष्ण'।
कहै सूरदास, देखि नैनन की मिटी प्यास, कृपा कीनी गोपीनाथ, आय भुवतल मैं - ८.५।
ऐसे कहत गये अपने पुर सबहिं बिलच्छन देख्यौ। मनिमय महल फरिक गोपुर लखि कनक भुमि अवरेख्यौ - सारा. ८२० |
[हिं. गोबर + ई (प्रत्य.)]
[हिं. गोबर + ई (प्रत्य.)]
गोबर में उत्पन्न एक कीड़ा।
[हिं. गोबर + ऐला या औला (प्रत्य.)]
गायों की वृद्धि करनेवाला।
ब्रज का एक पर्वत। प्रसिद्धि है कि एक बार बहुत वर्षा होने पर श्रीकृष्ण ने इसे उँगली पर उठा लिया था।
गोबर्धन पर्वत को उठानेवाले, श्रीकृष्ण।
[सं. गोपेंद्र, या गोविंद, हि. गोविंद]
[सं. गोपेंद्र, या गोविंद, हि. गोविंद]
जाल का झोला जिसमें कंकड़-पत्थर रखकर चलाये जायँ।
सह्याद्रि की एक पहाड़ी जहाँ गोमती देवी का स्थान है।
उत्तर प्रदेश की एक प्रसिद्ध नदी।
मन यह करत बिचार गोमती तीर गये - १० - ३४७।
गंगोत्तरी का वह स्थान जहाँ से गंगा निकलती है और जिसकी बनावट गाय के मुख की सी है।
घोड़ों के उपरी होठों की एक भँवरी।
हिमालय की एक शिला जहाँ अर्जुन का शरीर गला था।
गाय को मारने वाला, गोहिंसक, कसाई।
[सं. गो+हिं. मर प्रत्य.)]
चल्यौ भाजि गोमायु जंतु ज्यों लैंके हरि कौ भाग - सारा.२६७।
गउ चराइ, मम त्वचा उपारौ। हाड़न कौ तुम ब्रज सँवारौ। सुरपति रिषि की आज्ञा पाई। लिए हाड़, दियौ ब्रज बनाई। गौमुख असुध तबहिं तैं भयौ - ६ - ५।
गोमुख नाहर (व्याघ्र) :- वह मनुष्य जो देखने में तो सीधा हो, पर वास्तव में बड़ा क्रूर और अत्याचारी हो।
एक पटह, एक गोमुख, एक आवझ, एक झालरी, एक अमृत कुंडल रबाब भाँति सौं दुरावै - २४२५।
माला रखने की थैली जिसकी बनावट गाय के मुख की सी होती है।
एक लता जिसमें फूट नामक ककड़ी फलती है।
गैयों के (चलते समय) खुरों से उड़ी हुई धूल।
(क) गोरस मथत नाद इक उपजत, किंकिनि धुनि सुनि स्रवन रमापति - १० - १४९।
(ख) रैनि जमाई धरयौ हो गोरस, परयौ स्याम कैं हाथ - १० - २७७।
(ग) गोरस बेचन गई बबा की सौं हौं मथुरा तें आई - २५४८।
इंद्रियों का सुख, विषय-सुख।
बच्चा जो केवल ऊपरी (विशेषतः गाय के) दूध पर पला हो।
एक बड़ा पेड़ जिसे कल्पवृक्ष भी कहते हैं।
कई तारों-कड़ियों आदि का समूह जिन्हें जोड़ना या अलग करना कठिन होता है।
गोरखपुर के एक प्रसिद्ध सिद्ध जिनका संप्रदाय अभी तक है।
नैपाल का एक प्रदेश। इस प्रदेश का निवासी।
छिपाया, लुप्त किया, दूर किया, मिटाया।
गोकुल गाय दुहत दुख गोयो् कूर भए ए बार - २८००।
(क) द्वै ससि। स्याम नवल घन द्वै कीन्हें विधि गोर. - १९१९।
(ख) बलि तुहिं जाउँ बेगि लै मिलऊ स्याम सरोज बदन तुव गोर - २२१५४।
(ग) मनमोहन पिय दूल्हा राजत दुलहिन राधा गोर - शार.१०६६।
राजों, बढ़इयों आदि का गोनिया नामक औजार।
वह मल्लाह जो नाव की गून खींचता है, गुनरखा।
कंचन कलस गढ़ाये कब हम देखे धौं यह गुनिये - ११३०।
गुन बिना गुनी, सुरूप रूप बिनु नाम बिना श्री स्याम हरी - ११५।
सुनि आनंदे सब लोग, गोकुल - गनक - गुनी - १० - २४।
झाड़-फूँक या जंत्र-मंत्र जाननेवाला।
(क) स्याम भुजंग डस्यौ हम देखत, ल्यावहु गुनी बोलाई ७४३।
(ख) तंत्र न फुरै, मंत्र नहिं लागै, चले गुनी गुन हारे - ३२५४।
अब लौं ऐसी नाहिं सुनी। जैसी करी नंद के नंदन अद्भुत बात गुनी - सा. १०४।
सूत ब्यास सौं हरि - गुन सुने बहुरौ तिन निज मनमैं गुरे - १ - २२८।
अंडे, नीबू आदि के आकार का।
गोल गोल :- (१) मोटे तौर पर, स्थूल रूप से।
(२) साफ साफ नहीं।
गोल बात :- जो बात बिल्कुल स्पष्ट या साफ न हो।
गोल मटोल (मठोल) :- (१) मोटे तौर पर।
(२) मोटा और नाटा।
(३) कम ऊँचाई का पर ज्यादा मोटाईवाला।
गोल होना :- (१) चुप हो जाना।
(२) चुपके से चले जाना।
गोलमाल, गड़बड़, खलबली, हलचल |
गोल पारना (मारना) :- गड़बड़, खलबली या हलचल मचाना।
पारयो गोल :- खलबली पैदा कर दी, हलचल मचा दी।
उ. - ल्याए हरि कुसलात धन्य तुम घर घर पारयौ गोल - ३२६५।
गौर वर्ण की स्त्री. रूपवती रमणी।
जौ तुम सुनहु जसोदा गोरी - १० - २८६।
[सं. गौरी, हिं. पुं. गोर]
अपनी अपनी गाई ग्वाल सब आनि करौ इक ठौरी। पियरी, मौरी, गोरी गैनी, खैरी, कजरी जेती - ४४५।
सींगवाला पशु, चौपाया, मवेशी।
गौरै भाल बिंदु बंदन, मनु इंदु प्रात रवि काँति - ७०४।
एक प्रकार का सुगंधित द्रव्य।
(क) बदन सरोज तिलक गोरोचन, लटलटकनि मधुकर - गति डोलनि - १० - १२१।
(ख) सुंदर भाल - तिलक गोरोचन, मिलि मसिबिंदुका लाग्यौ री - १० - १३७।
बालकों के खेलने का गोल पिंड।
है।
सीसे का गोल छर्रा जो बंदूक से चलाया जाता है।
गोली खाना :- घायल होना।
गोली बचाना :- संकट टल जाना।
गोली मारना :- परवाह न करना।
विष्णुलोक, जो बैकुंठ के दक्षिण में बताया जाता है।
तोप से चलाने का गोल पिंड।
रस्सी, सूत आदि की गोल पिंडी।
[हिं. गोल + आई (प्रत्य.)]
गोल आकार या प्राकृतिवाला।
(क) अपने दीन दास के हित लगि, फिरते सँग सँगहीं। लेते राखि पलक गोलक ज्यों, संतन तिन सबहीं - १.२८३।
(ख). अति उनींद अलसात कर्मगति गोलक चपल सिथिल कछु थोरे।
(ग) अति बिसाल बारिज - दल - लोचन, राजति काजर - रेख री। इच्छा सौं मकरंद लेत मनु अलि गोलक के बेष री - १० - १३६
यहूँ नैन की कोर निहारत कबहूँ बदन पुनि गोवत - १९६६।
सूरदास प्रभु तजी गर्ब तैं नये प्रेम गति गोवति - १८००।
वृन्दावन का एक पर्वत जिसे श्रीकृष्ण ने उँगली पर उठाया था।
मथुरा का एक प्राचीन नगर और तीर्थ।
[सं. गोपेंद्र, प्रा. गोविंद]
[सं. गोपेंद्र, प्रा. गोविंद]
[सं. गोपेंद्र, प्रा. गोविंद]
[सं. गोपेंद्र, प्रा. गोविंद]
[सं. गोपेंद्र, प्रा. गोविंद]
माखन उलूखत बाँध्यौ, सकल लोग ब्रज जोवै। निरखि कुरुत्व उन बालनि को रिसि, लाजनि अँखियनि गोवै - ३४७।
पगड़ी में लगा मोतियों का गुच्छा जो कान के पास रहता है।
गाय के खुर के बराबर गढ़ा।
पापी, दोषी या अपराधी होने का भाव।
(क) हरि सौं ठाकुर और न जन कौं।….। लग्यौ फिरत सुरभी ज्यौं सुत सँग, औचट गुनि गह बन कौं - १ - ९।
(ख) तुमहीं मन मैं गुनि धौं देखौ बिनु तप पायौ कासी - २९३७।
झाड़-फूँक करने वाले, जंत्र-मंत्र जाननेवाले।
जंत्र - मंत्र का जानै मेरौ ? यह तुम जाइ गुनिनि कों बूझौ, इहाँ करति कत झेरौ - ७५३।
सोचता-विचारता है, समझता-बूझता है।
कैसो कनक मेखला कछनी यह मन गुनियत हैं - १४१२।
यह अचरज सुबड़ो जिय मेरे वह छाँइनि वह पोसनि। निपट निकामजानि हम छाँड़ी ज्यों कमान दिन गोसनि - १०उ. ८८।
[फ़ा. गोशा + नि (प्रत्य.)]
पगड़ी में लगी मोतियों की गुच्छी जो कानों के पास लटकती है।
पाग ऊपर गोसमायंत रंग रंग रचि बनाइ - २३५०।
संन्यासियों का एक संप्रदाय।
वह जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो।
(क) गोपी - ग्वाल - गाय - गोसुत - हित सात दिवस गिरि लीन्हयौ - १ - १७।
(ख) गोकुल पहुँचे जाइ गए बालक अपने घर। गोसुत अरु नर नारि मिली अति हेत लाइ गर।
अथर्ववेद का एक अंश जिसमें ब्रह्मांङ-रचना का गाय के रूप में वर्णन है।
वह जिसने इंद्रियों को जीता हो।
वैष्णवाचार्यों के वंशधर या गद्दी के अधिकारी।
उदयपुरी राजवंश का एक पूर्व पुरुष।
(क) भागैं कहाँ बचौगे मोहन। पाछै आइ गई तुव गोहन - १० - ७९९।
(ख) बरन बरन ग्वाल बने महरनंद गोप जने एक गावत एक नृत्यत एक रहत गोहन - २४२८।
(ग) जाके दृष्टिपरे नंदनंदन सोउ फिरत गोइन डोरी डोरी - १४६९।
[सं. गोधन = गौओं का समूह]
(क) सूरदास प्रभु गोहन गोहन की छबि बाढी मेटति दुख निरखि नैन मैन के दरद को - पृ. ३५२ (८२)।
(ख) बार बार भुज धरि अंकम भरि मिलि बैठे दोउ गोहन - पृ. ३१५।
[सं. गोधन = गौओं का समूह]
साथ रहनेवाला, संगी, सहचर।
[हिं. गोहन +इयाँ (पत्य.)]
को यह लिये जात कहँ हमको कृष्णकृष्ण कहि गोहरायौ - २३१६।
पुकार मचाना, जोर से दुहाई देना, रक्षा या सहायता के लिए चिल्लाना।
घावहु नंद गोहारि लगौ किन तेरौ सुत अँधवाह उड़ायौ| १० - ७७।
गौं का :- (१) विशेष कामका, उपयोगी।
(२) स्वार्थी, मतलबी।
गौं का यार (साथी) :- मतलबी या स्वार्थी मित्र।
गौं गाँठना (निकालना) :- काम निकालना, स्वार्थ साधना।
गौं पड़ना :- गरज अटकना, काम पड़ना।
(क) यह सखि मैं पहिलें कहि राखी असित न अपने होंहीं। सूर काटि जौ माथौ दीजै चलत आपनी गौं हीं - ३०५६।
(ख) हम बावरी त्यों न चलि जान्यौ ज्यों गज चलत अपनी गौ हैं - ३४२८।
गाँव के लाभ के लिए किया गया खर्च।
[हिं० गाँव+हाँ (प्रत्य.)]
बाहरी दालान, चौपाल, बैठक।
भीड़ जो पुकार सुनकर इकट्ठा हो।
अपनो बनिज दुरावत हौ कत नाउँ लियौ इतनौ ही। कहा दुरावत हौ मो आगे सब जानत तुव गोही - ११०९।
तुम तौ अलि उनहीं के संगी अपना गौं कै टेकौ - ३२८७।
गाय चराने का कर जिससे कुछ भूमि चराई की छोड़ी जाती है।
एक राग जो तीसरे पहर और संध्या को गाया जाता है।
गौड़िया सम्प्रदाय-चैतन्य महाप्रभु का वैष्णव संप्रदाय।
श्रीकृष्ण चैतन्य स्वामी जो गौरांग महाप्रभु भी कहलाते हैं।
एक न्यायशास्त्र-प्रणेता ऋषि।
सप्तर्षि मंडल का एक तारा।
वह पर्वत जिससे गोदावरी निकलती है।
एक ऋषि जिन्होंने अपनी पत्नी अहल्या को इन्द्र के साथ अनुचित संबंध करने के कारण शाप देकर पत्थर का बना दिया था।
गौतम ऋषि की स्त्री अहल्या। इन्द्र ने छल करके इसका सतीत्व नष्ट किया, यह भेद जानने पर गौतम ने इसे शाप देकर पत्थर का बना दिया। भगवान् रामचन्द्र ने विश्वामित्र के साथ जाते समय इसका उद्धार किया।
गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या।
(केले आदि) फलों का गुच्छा, घौद।
गाय को संकल्प करके दान करने की क्रिया।
गाय की पूँछ की तरह मोटे से क्रमशः पतला होता जाना, उतार-चढ़ाव, गावदुम।
[हिं. गाय + दुम+ आ (प्रत्य.)]
(क) तात बचन रघुनाथ माथ धरि, जब बन गौन कियौ - ९ - ४६।
तौलने का तीन सरसों के बराबर भाग।
एक कोड़ा जिससे ब्रजवासी होली पर मार करते हैं।
[सं. गुण, हिं. गून = रस्सी]
सुक सौं नृपति परीक्षित सुन्यौ। तिहि पुनि भली भाँति करि गुन्यौ - १ - २२७।
(क) राजहु भए, तजत नहिं लोभहिं गुप्त' नहीं जदुराइ - ३११४।
(ख) एक केहरि एक हंस गुपुत रहै, तिनहिं लग्यौ यह गात - सा, उ. - ३।
जाति न गुप्त करी-छिपती नहीं।
कछु इक अंगनि की सहिदानी, मेरी दृष्टि परी।…..। मृग मूसी नैननि की सोभा, जाति न गुप्त करो - ९ - ६३।
जिसका गौना हाल ही में हुआ हो।
[हिं. गौना + हाई (प्रत्य.)]
वह स्त्री जो दुलहिन के साथ उसकी ससुराल जाय।
[हिं. गौना + हार (प्रत्य.)]
गाने-बजाने का काम करनेवाली स्त्रियाँ।
[हिं. गाना + हारी (वाजी)]
(क) अका बकासुर तवहिं सँहारथी, प्रथम कियौ बन गौना - ६०१।
(ख) मो देखत अबहीं कियौ गौना - २४२१।
विवाह के बाद की एक रीति जिसमें वर वधू को ससुराल से बिदा करा कर घर ले आता है, मुकलावा, द्विरागमन।
(क) की हरि आजु पंथ यहि गौने कीधौं स्याम जलद उनयौ–१६२८।
(ख) सूरदास प्रभु मधुबन गौने तो इतनो दुख सहियत - २८५६।
गौर बरन मोरे देवर सखि, पिय मम स्याम सरीर - ९ - ४४।
एक रागिनी जो श्रीराग की स्त्री मानी जाती है।
(क) मालवाई राग गौरी अरु असावरी राग - २२१३।
(ख) बेनु पनि गहि मोको सिखावत मोहन गावन गौरी - २८७३।
गौरीपति पूजति ब्रजनारि - ७६६।
हिमालय की सबसे ऊँची चोटी।
वह पाठक जिसने ग्रंथ का अध्ययन और मनन भली भाँति न किया हो।
[सं. ग्रंथ+चुंबक = घूमनेवाला]
ग्रंथ की सरसरे ढग से पाठ मात्र करना, अध्ययन-मनन न करना।
दो चीजों को गाँठ देकर जोड़ना।
सिपाहियों के गुल्म का नायक।
कमल - बदन कुँभिलात सबन के गौवन छाँड़ी तृन की चरनी - ३३३०।
पहिले ही अति चतुर हुते अरु गुरु सब ग्रंथ दिखाये - ३३६३।
जिय परी ग्रंथ कौन छोरे निकट ननँद न सास - ३४८ (५७)।
सिक्खों का धर्मग्रंथ जिसमें उनके गुरुओ के उपदेश संकलित हैं।
कारो कारो कुटिल अति कान्हर अन्तर ग्रंथि न खोलै - ३०९१।
जैसो कियो तुम्हारे प्रभु अति तैसो भयो तत्काल। ग्रंथित सूत धरत तेहि ग्रीवा जहाँ धरत बनमाल - ३३३३।
विवाह के समय वर-कन्या के दुपट्टे का परस्पर गँठबंधन।
जा सिर फूल फुलेल मेलि के हरि - कर ग्रंथै मोरी
सखी री मथुरा में दा हंस। वै अकूर ए ऊधो सजनी जानत नीके ग्रंस - ३०४९।
ऐसैं मैं सबहिन तैं न्यारौं, मनिन ग्रंथित ज्यौं सूत - २ - ३८।
पकड़ लेता है, ग्रस लेता है, पकड़ने पर।
ग्राह ग्रसत गज कौं जल बूड़त, नाम लेत वाकौं दुख टारयौ - १ - १४।
बुरी तरह पकड़ना, चंगुल में फाँसना।
गुप्त रूप से रखी हुई अविवाहिता स्त्री।
सूर प्रभु कर तें गुवर्धन धरयौ धरनि उतारि - ९९४।
दबाया हुआ क्रोध, दुख आदि मनोभाव।
रबड़ या कागज का थैलीनुमा एक खिलौना।
ग्रास करके, दाँत से पकड़कर।
(१) कहौ तौ गन समेत ग्रसि खाऊँ, जमपुर जाइ न राम - ९ - १४८।
(ख) सिंह को सुत हर - भूषण ग्रसि ज्यों सोई गति भई हमारी - सा, उ. २९।
[सं. ग्रसन, हिं. ग्रंसना]
(क) काम - क्रोध - पद लोभ - ग्रसित ह्वै विषय पर बिष खायौ - १ - १११।
(ख) हरि उर मोहनी बेलि लसी। तापर उरग ग्रसित तब सोभित पूरन अंस ससी - स. उ. २५।
रूप, जोबन सकल मिथ्या, देखि जनि गरबाइ। ऐसेहिं अभिमान आलस, काल ग्रसिहै आइ - १ - ३१५।
चक्षुश्रुवा उरहार ग्रसी ज्यों छिन पुनि या बपु रेष - सा. उ. २९।
बुरी तरह पकड़ लिया, ग्रस लिया।
ग्रस्यौ गज ग्राह लै चल्यौ पाताल कौं, काल कैं त्रास मुख नाम आयौ - १.१।
वे तारे जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
बुरी तरह जकड़ने या तंग करनेवाला।
सूर्य आदि ज्योति-पिंडों के ज्योति मार्ग में किसी अन्य आकाशवारी पिंड के आ जानेके कारण होनेवाली रुकावट या ज्योतिअवरोध।
पकड़ने या लेने की क्रिया।
शरीर की एक नाड़ी।
एक रोग।
ग्रहों की स्थिति के अनुसार मनुष्य की भली-बुरी दशा।
ग्रहों की स्थिति, गति आदि का परिचय वेधशाला के यंत्रों द्वारा जानना।
पकड़ा, ग्रहण किया, आच्छादित किया, अवरोध किया।
चारु स्त्रवननि ग्रहित कीनी झलक ललित कपोल - १३५१।
पकड़ा हुआ, ग्रहण किया हुआ, स्वीकृत, अंगीकृत।
ग्रहपति - सुत - हित अनुचर को सुत
ग्रहपति = सूर्य + सुत (सूर्य का पुत्र=सुग्रीव) + हित = मित्र (सुग्रीव का मित्र राम) + अनुचर (राम का अनुचर या सेवक हनुमान)+सुत (हनुमान का सुत या पुत्र मकरध्वज और कामदेव का भी एक नाम है मकरध्वज)]। काम
ग्रहपति सुत - हित - अनुचर कौ सुत जारत रहत हमेस - सा. २७।
ग्रहबसु मिलत संभु की। सैना चमकत चित न चितैहै - सा. १०।
[सं. ग्रह - बसु (बसु आठ हैं। अतः आठवाँ ग्रह हुआ राहु। फिर राहु से अर्थ लिया राह)]
ग्रहमुनि - दुत हित के हित कर ते मुकर उतारत नाधे - सा. ६।
[सं. ग्रह+मुनि (मुनि सात हैं ; अत: ग्रह - मुनि का अर्थ हुआ सूर्य से सातवाँ ग्रह शनि जिसका दूसरा नाम है मंद) + द्यु ति = प्रकाश]
ग्रहमुनि - पिता - पुत्रिका
ग्रहमुनि पिता - पुत्रिका को रस अति अदभुत गति मातो - सा. ११।
[सं. ग्रह + मुनि मुनि सात हैं, अतः ग्रहमुनि का अर्थ हुआ सातवाँ ग्रह =शनि) + पिता (शनि के पिता=सूर्य)+पुत्रिका सूर्य की पुत्रिका या पुत्री यमुना)]
वर-कन्या के ग्रहों की अनुकूलता जिसका विचार विवाह के समय होता है।
ग्रहों की उग्रता या कोप-शांति के लिए किया गया पूजन या यज्ञ।
जो तन दियौ ताहि बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी। भरि भरि द्रोह बिसै कौं धावत, जैसै सूकर - ग्रामी - १ - १४८।
काव्य का एक दोष, जिसमें ग्रामीण विषयों या प्रयोगों की अधिकता हो।
बैल आदि गाँव के पालतू पशु।
सालन सकल कपूर सुवासत। स्वाद लेत सुंदर हरि ग्रासत - ३९६।
इहिं कलिकाल - ब्याल - मुख - ग्रासित सूर सरन उबरै - १.११७।
मारि न सकै, बिघन नहिं ग्रासै, जम न चढ़ावै कमार - १ - ९१।
सबनि सनेहौ छाँड़ि दयौ। हा जदुनाथ जरा तन ग्रास्यौ, प्रतिभौ उतरि गयौ - १ - २९८।
ग्रहण या स्वीकार करनेवाला व्यक्तिं।
मानने या स्वीकार करने योग्य।
ग्रीव कर परसि पग पीठि तापर दियौ उर्बसी रूप पटतरहिं दीन्हीं - २५८८।
सुद्ध आखर भरत ग्रीषम रिपुन मध्ये साप - सा. - २।
[सं. ग्रीष्म = गर्मी+रिपु = शत्रु (गर्मी का शत्रु पयोधर ; पयोधर के दो अर्थ हैं - (१) एक बादल। (२) स्तन ; यहाँ दूसरा अर्थ लिया गया है)]
जो प्रकट करने योग्य न हो, रहस्यपूर्ण।
गुप्त मते की बात कहौ जनि काहू के आगे - ३२२७।
जो शीघ्र समझ में न आ सके, गूढ़।
वैश्यों की एक पदवी या जाति।
एक प्राचीन भारतीय राजवंश।
एक तीर्थ जो हरद्वार और बदरीनाथ के बीच में है।
नीकन अदभुत बात लई। आपु ना तजत ग्रेह पुर में करबर सूर सई - सा. ११५।
सहज माधुरी अंग अंग प्रति सहज सदावन ग्रेही - १४८५।
मानसिक शिथिलता, अनुत्साह, अक्षमता।
अपने अनुचित कार्यों के विचार से उत्पन्न खेद या खिन्नता।
ताकै मन उपजी तब ग्लानि। मैं कीन्ही बहु जिय की हानि - ४ - १२।
बीभत्स रस का एक स्थायी भाव।
मकानादि के चारों ओर का बाड़ा।
बाड़े या चारदीवारी से घिरा हुआ स्थान।
सखा सहित गए माखन - चोरी। देख्यौ स्याम गवाच्छ - पंथ ह्वै, मथति एक दधि भोरी - १०.२७०।
(क) सोर सुनि नंद - द्वार आए विकल गोपी - ग्वाल - ३५७।
(ख) उत होरी पढ़त ग्वार इत गारी गावति ए नंद नहीं जाये तुम महरि गुनन भारी - २४२६।
एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी और बीजों की दाल होती है।
ढूँढ़त फिरत ग्वारिनी हरिकौं, कितहूँ भेद नहिं पावति - ४५९।
गाय पालने-चरानेवाले, अहीर।
[सं. गो + पाल, प्रा. गोवाल]
व्रज के गोपजातीय बालक जो श्रीकृष्ण के बाल-सखा थे।
[सं. गो + पाल, प्रा. गोवाल]
[सं. गो + पाल, प्रा. गोवाल]
गूढ़ोत्तर अस कहत ग्वालिनी - सा. उ. ८०।
ग्वालिन, ग्वालिनियाँ, ग्वाली
ग्वाल जाति की स्त्री. अहीरिन
ग्वालिन, ग्वालिनियाँ, ग्वाली
(क) हम ग्वाली तुम तरनि रूप रस रवि - ससि मोहै - ११४१।
(ख) जाको ब्रह्मापार न पावत ताहि खिलावति ग्वालिनियाँ - १० - १३२।
ग्वालिन, ग्वालिनियाँ, ग्वाली
ग्वालिन, ग्वालिनियाँ, ग्वाली
मरोड़ना, ऐंठना, घुमाना, टेढ़ा करना।
[सं. गुंठन्हें हिं. गुमेठना]
(क) गोकुल के ग्वैड़ेएक साँवरो सो ढोटा माई - ८७२।
(ख) निकसि गाँव के ग्वैंड़े आये - १०१८।
रुहठि करै तासौं को खेलै रहे बैठि जहँ - तहँ सब ग्वैयाँ - १० - २४५।
सूची प्रीति न जसुदा जानै, स्याम सनेही ग्वैयाँ - ३७१।
हिंदी वर्णमाला का चौथा व्यंजन; उच्चारण जिह्वामूल या कंठ से होता है ; स्पर्श वर्ण ; इसमें घोष, नाद, संवार और महाप्राण प्रयत्न होते हैं।
जलपात्र जो मृतक-क्रिया में पीपल से बाँधा जाता है।
धातु के औंधे पात्र में लगे लंगर या लट्टू से बननेवाला बाजा।
घंट बजाइ देव अन्हवायौ - १० - २६१।
धातु का गोल पत्तर जो मुँगरी से बजाया जाता है।
घंटे मोरछल से उठाना :- किसी वृद्ध वृद्धा के शव को बाजे-गाजे से श्मशान ले जाना।
घड़ियाल जो समय की सूचना के लिए बजाया जाता है।
छोटी-छोटी घंटियाँ जो पशुओं के गले में बाँधी जाती हैं।
कटि किंक्रिन नूपुर बिछयनि धुनि। मनहु मदन के गज - घंटा सुनि - १००५।
दिन रात का चौबीसवाँ भाग, साठ मिनट का समय।
घंटा दिखाना :- कोई चीज माँगने पर न देना, सींगा दिखाना।
घंटा हिलाना :- व्यर्थ के काम में समय नष्ट करना।
शिव का एक उपासक जो कान में इसलिए घंटा बाँधे रहता था कि विष्णु या राम का नाम लिये जाने पर उसे हिला दूँ और वह नाम सुन न सकूँ।
वह ऊँचा स्थान जिस पर बहुत बड़ी घड़ी लगी हो।
छोटे छोटे लंबे घड़े जो रहँट में लगे रहते हैं, घरिया।
स्रवन कूप की रहँट घंटि का राजत सुभग समाज।
पशुओं के गले में काँटे पड़ने का एक रोग।
पानी का भँवर या चक्कर, प्रवाह।
थूनी, टेक।
नरम चीज में नुकीली चीज घुसने या धँसने का शब्द।
(क) माधौ, नैकु हटकौ गाइ।….। अष्टदस घट नीर अँचवति, तृषा तउ न बुझाइ - १ - ५६।
(ख) नैन घट घटत न एक धरी। कबहुँ न मिटत सदा पावस ब्रज लागी रहत झरी - ३४५५।
घटका लगना :- मरते समय कफ रुकना।
कम होता है, क्षीण होती है, घटते-घटते।
(क) हमारे निर्धन के धन राम। चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आवत गढ़ै काम - १.९२।
(ख) नैन घट घटत न एक घरी। कबहुँ न मिटत सदा पावस ब्रज लागी रहत झरी - ३४३५।
(ग) दुतिया चंद बहुत ही बाढ़ै घटत घटत घटि जाइ - १ - २६५।
(क) सिर पर मीच, नीच नहिं चितवत, आयु घटति ज्यौं अंजुलि पानी - १०१५९।
(ख) जिह्वास्वाद, इंद्रियनि - कारन, आयु घटति दिन मान - १ - ३०४।
घटती का पहरा :- अवनति के दिन।
(क) जो घट अंतर हरि सुमिरै। ताको काल रूठि का करिहे, जो चित चरन धरै - १ - ८२।
(ख) वै अबिगत अबिनासी पूरन सब घट रह्यौ समाइ - २९८८।
घट में बसना (बैठना) :- (१) मन में बसना, ध्यान रहना।
(२) बात समझ में आ जाना।
मध्य में होनेवाला, मध्यस्थ।
विवाह तै करानेवाला, बरेखिया।
[सं. गमक= जाने या फैलनेवाला]
किसी पदार्थ आदि के भीतर ही भीतर शब्द का गूँजना।
(हृदय में) शब्द गूँजकर, क्रोध से भरकर, धड़क कर।
धमकि मारयौ घाउ गुमकि हृदय रहयौ झमकि गहि केस लै चले ऐसे - २६१५।
घटती होइ जाहि ते अपनी कीजै ताको त्याग - १०९५।
नायक-नायिका का मेल करानेवाली।
कमबेश, न्यूनाधिक, कम ज्यादा।
कर या तलाशी के लिए रोकनेवाला।
आवत जान न पावत कोऊ तुम मग में घटवाई। सूर स्याम हमको बिरमावत खीझत बहिनी माई - ११४४।
घाट का कर या महसूल उगाहनेवाला।
घाट पर दान लेनेवाला ब्राह्मण, घाटिया।
नदी के घाट पर बैठकर दान लेनेवाजा पंडा।
अगस्त्य ऋषि जो घट से उत्पन्न माने जाते हैं।
घटसुतअरितनयापति सजनी नाहिं नेह निबहो री - सा, उ. ५१।
[सं. घटसुत = अगस्त्य ऋषि + अरि=शत्रु (अगस्त्य का शत्रु समुद्र)+ तनया (समुद्र की पुत्री लक्ष्मी)+ पति (लक्ष्मी के पति विष्णु = श्रीकृष्ण)]
घटसुत असन समै सुत आनन अमीगलित जैसे मेत - सा. २९।
[सं. घटसुत = अगस्त्य ऋषि + असन = भोजन (अगत्य ऋषि का भोजन समुद्र जिसका उन्होंने पान किया था) + सुत (समुद्र का पुत्र, चंद्रमा)]
किसी मंगल कार्य के पूर्व जल से भरा घडा पूजन के स्थान पर स्थापित करना।
नवरात्र का पहला दिन जब घट की स्थापना होती है।
नदी पार पहुँचानेवाली नाव।
उमड़े हुए मेघ, घिरे हुए बादल, मेघमाला।
उड़त फूल उड़गन नभ अंतर, अंजन घटा घनी - २ - २८।
केतिक राम कृपन, ताकी पितु मातु घटाई कानि - ९ - ७७।
बादलों की चारो ओर घिरी हुई घटा।
गाड़ी, पालकी आदि को ढकनेवाला कपडा या ओहार।
चारो ओर से घेर लेनेवाला दल या समूह।
(क) डर पावहु तिनको जे डरपहिं तुम ते घटि हम नाहीं - १११९।
(ख) कहाहम या गोकुल की गोपी बरनहीन घटि जाति - ३२२२।
भाव, अर्थ आदि के विचार से ठीक उतरा हुआ।
रनहूँ में घटिताई कीन्हीं। रसना, स्रवन, नैन के होते की रसनाहीं को नहिं दीन्हीं।
अपमान या अप्रतिष्ठा करना।
भाव, अर्थ अथवा परिणाम के विचार से ठीक ठीक सिद्ध करना या पूरा उतारना।
बहुत कानि मैं करी सजनी अब देखौ मर्याद घटावत - पृ. ३२९ |
ऐसौ को अपने ठाकुर कौ इहिं बिधि महत घटावै - १ - १९२।
(क) अजामिल मनिका हैं कहा मैं घटि कियौ, तुम जो अब सूर चित तें बिसारे - १ - १२०।
(ख) मरियत लाज पाँच पतितनि मैं, हौं अब कहौ घटि कातैं - १.१३७।
(ग) दुतिया - चंद बढ़त ही बाढ़ै, घटत घटत घटि जाइ - १ - २६५।
(घ) बिधिमर्यादा लोक की लज्जा तृन हूँ तें घटि मानैं - पृ. ३४१ (१३)।
मौका देखकर स्वार्थ साधनेवाला।
घटी आना (पड़ना) :- हानि होना।
हृदय की कबहुँ न जरनि घटी। बिनु गोपाल बिथा या तन की कैसै जाति कटी - १ - ९८।
घटोत्कच नामक भीमसेन का पुत्र जो हिडिंबा से पैदा हुआ था।
कम होता है, छोटा होता है, क्षीण होता है, घटता है।
(क) घटै पल - पल, बढ़ै छिन - छिन, जात लागि न बार - १.८८।
(ख) ब्रहावान कानि करी, बल करि नहिं बाँध्यौ। कैसैं परताप घटै, रघुपति आराध्यौ - ९ - ९७।
बीते, समाप्त हो, व्यतीत हो।
नींद न परै, घटै नहिं रजनी व्यथा विरह - ज्वर भारी - २७८२।
हानि या घाटा होगा, छोटा या तुच्छ हो जायगा।
इहिं बिधि कहा घटैगौ तेरौ १ नंदनंदन करि घर कौ ठाकुर, आपुन ह्वै रहु चेरौ - १ - २६६।
भीमसेन का एक पुत्र जो हिडिंबा राक्षसी से पैदा हुआ था।
हाथ-पैर आदि में अधिक या नये काम के कारण पड़ जानेवाला कड़ा या उभड़ा हुआ चिन्ह।
बादल गरजने या गाड़ी चलने का शब्द।
बाँस में घड़े बाँधकर बनाया हुआ नाव का ढाँचा।
घड़ों पानी पड़ना :- लज्जा के कारण सिर नीचा हो जाना, बहुत लज्जित होना।
[सं. गुंबा + टा (प्रत्य.)]
चोट के कारण सिर या माथे पर आनेवाली सूजन।
दबाया हुआ क्रोध आदि भाव, गुबार।
कानाफूसी, धीरे धीरे की हुई बात।
मिट्टी का एक पात्र जिसमें चाँदी गलायी जाती है, घरिया।
[सं. घटिकालि, प्रा. घड़िआलि= घंटों का समूह]
घंटा जो पूजन में बजाया जाता है।
घड़ी-घड़ी :- बार बार।
घड़ी तोला, घड़ी माशा :- कभी एक बात कभी दूसरी।
घड़ी गिनना :- (१) उत्कंठा से प्रतीक्षा करना।
(२) मृत्यु का आसरा देखना।
घड़ी में घड़ियाल है :- (१) जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं।
(२) जरा देर में उलट-पुलट हो जाती है।
घड़ी देना :- मुहूर्त या सायत बताना।
घड़ी भर :- थोड़ी देर।
घड़ी :- सायत पर होना, मरने के करीब होना।
[हिं. घड़ा+ओला (प्रत्य.)]
घड़ा रखने की चौकी या तिपाई।
[हिं. घड़ा + औंची (प्रत्य.)]
घात करने या धोखा देनेवाला।
[हिं. घात + इया (प्रत्य.)]
घात या दाँव में लाना।
चुराना, छिपाना।
किधौं घन बरसत नहिं. उन देसनि।
पगरिपु लगत सघन घन ऊपर बूझत कहा बतैहै—सा. १०।
(ख) नीकनन तें दिवस डारत परत घन पै हेर - सा. ६०।
लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई का विस्तार।
कुटिल भू पर तिलक - रेखा, सीस सिखिनि सिखंड। मनु मदन धनु - सर - सँघाने, देखि घनकोदंड - १ - ३०७।
[सं. घन, फ़ा. दार (प्रत्य.)]
लंबाई, चौड़ाई और मोटाई (या ऊँचाई) का गुणनफल।
किसी संख्या को दो बार उसीसे गुणा करने पर प्राप्त फल।
बेल-बूटेदार, जिसमें बेल-बूटे बने हों।
कहुँ कहुँ कुचन पर दरकी अँगिया घनबेलि।
बेला नामक पौधे की एक जाति।
हाथी का कोढ़ के समान एक रोग।
लंबाई, चौड़ाई और मोटाई का विस्तार।
अनाज भुनाने के लिए भड़भूँजे के पास लेजानेवाला।
[हिं. घान+हारा (प्रत्य.)]
एक हाथ लंबा, चौड़ा और मोटा या ऊँचा पिंड, क्षेत्र या मान |
जिसकी लंबाई, चौड़ाई और मोटाई समान हो।
जो उचित मार्ग पर न चले, कुमार्गी।
(क) दधि लै मथति ग्वालि गरबीली।….। भरी गुमान बिलोकति ठाढ़ी, अपनैं रंग रँगीली - १० - २९९।
(ख) बृन्दाबन की बीथिनि तकि तकि रहत गुमान समेत। इन बातनि पति पावत मोहन जानत होहु अचेत - १०३५।
लोगों की बुरी धारणा, लोकापवाद।
वह कर्मचारी जो माल खरीदने-बेचने पर नियुक्त हो।
पवन पानि घनसारि सुमन दै दधिसुत - किरनि भानु भई भुजें - २७२१।
तड़ित - बसन, घनस्याम - सदृश तन, तेज पुंज तम कौं त्रासै - १ - ६९।
अंत के दिन कौं हैं घनस्याम - १.७६।
हिंदी का एक प्रसिद्ध कवि।
पास का, गहरा (संबंध आदि)।
कहा कमी जाके राम धनी। मनसानाथ मनोरथपूरन, सुख निधान जाकी मौज घनी - १ - ३९।
सकपका गये, भौचक्के हो गये।
पाती बाँचत नंद डराने। कालीदह के फूल पठावहु सुनि सबही घबराने - ५२६।
वह प्रहार जिससे ‘घस' शब्द हो।
घमंड पर आना (होना) :- इतराना, अभिमानना।
घमंड निकलना (टूटना) :- गर्व चूर होना।
जासु घमंड बदति नहिं काहुहिं कहा दुरावति मोसौं।
व्याकुल, अधीर या अशांत होना।
[सं गह्वर या हिं. गड़बड़ाना]
[सं गह्वर या हिं. गड़बड़ाना]
[सं गह्वर या हिं. गड़बड़ाना]
[सं गह्वर या हिं. गड़बड़ाना]
व्याकुलता, अधीरता, अशांति।
सकपकाहट, कर्तव्यविमूढ़ता।
बहुत अधिक (परिमाण वाचक), अतिशय।
बहुत, अधिक, अगणित (संख्या में)।
भैया - बंधु - कुटुंब घनेरे, तिनतैं कछु न सरी - १ - ७१।
[हिं. घने + एरे (प्रत्य.)]
(क) जो बनिता - सुत जूथ सकेले, हयगय बिभव घनेरौ। सबै समपौसूर स्याम कौं, यह साँचौ मत मेरौ - १ - २६६।
(ख) मैं निर्धन, कछु धन नहीं, परिवार घनेरौ - ९ - ४२।
बहुत अधिक (परिमाणवाचक), अतिशय।
(क) जु पैचाहि तै स्याम करत उपहास घनेरो - १११९।
(ख) निजं जन जानि हरि इहाँ पठायौ दीनो बोझ घनेरो - ३४३१।
बहुत अधिक (परिमाणवाचक), ज्यादा।
रवि - सुत - दूत बारि नहिं | सकते, कपट - घनौ उर बरतौ ०१ - २०३।
(एरी) आनँद सौं दधि मथति जसोदा, घुमकि मथनियाँ घूमै - १० - १४७।
जो घाम या धूप में रह सके।
[हिं: घाम - फ़, खोर (खानेवाला)]
(क) त्यौं त्यौं मोहन नाचै ज्यौं ज्यौं रई - घमर कौ होई (री) - १० - १४८।
(ख) माखन खात पराये घर कौ। नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ.शब्द दधिमाट घमर कौ - १० - ३३३।
अपना घर (समझना) :- घर की तरह निःसंकोच व्यवहार का स्थान।
घर उजड़ना :- (१) कुल परिवार की धन-संपत्ति नष्ट होना।
(२) घर के प्राणियों को तितर - बितर हो जाना।
घर करना :- (१) बसना, रहना।
(२) किसी वस्तु के लिए स्थान निकालना।
(३) घर का प्रबंध करना।
(स्त्री का) घर करना :- (१) पत्नी की तरह रहना।
(२) बस जाना।
उ. - मनु सीपज घर कियौ बारिज पर - १० - ९३।
आँख (चित्त, मन, हृदय) में घर करना :- (१) बहुत पसंद आना।
(२) बहुत प्रिय लगना।
घर का (की) :- (१) अपना, निजी।
उ. - मिसरी सूर न भावत घर की चोरी को गुड मठो - सा. ९०।
(२) आपस का, आपसी।
(३) अपने परिवार का व्यक्ति।
(४) पति, स्वामी।
घर का अच्छा :- अच्छे खाते पीते परिवार का।
घर का आदमी :- भाई-बंधु।
घर का उजाला :- (१) कुल की कीर्ति फैलानेवाला।
(२) बहुत प्यारा।
(३) बहुत सुन्दर।
घर का घरवा (घरौवा) करना :- घर उजाड़ना।
घर का बोझ उठाना (सम्हालना) :- घर का प्रबंध करना।
घर का भेदी :- घर की सब बातें जाननेवाला।
घर का भेदी (भेदिया) लंका दाहै (ढाई) :- घर का भेद बतानेवाला घर का सर्वनाश करा देता है।
घर का काटने दौड़ना :- घर का सूनापन भयानक लगना।
घर का न घाट का :- (१) जो न इधर का हो न उधर को, दोनों तरफ जिसका आदर न हो।
(२) निकम्मा, बेकाम।
घर का मर्द (शेर, वीर, बहादुर) :- घर ही में डींग हाँकनेवाला, जो बाहर कुछ न कर सके।
घर के बाढे :- घर में या शत्रु के पीठ पीछे डींग हाँकनेवाला, सामने कुछ न कर सकनेवाला।
उ. - (क) तुम कुँवर घर ही के बाढ़े अब कछू जिय जानिहौ - २२५९।
(ख) अब घर के बाढ़ हो तुम ऐसे कहा रहे मुरझाई - २२६१।
घर ही की बाढी :- घर में ही घमंड दिखानेवाली।
उ. - ग्वालिन घर ही की बाढ़ी। निस दिन देखत अपने ही आँगन ठाढ़ी।
घर का नाम उछालना (डुबोना) :- कुल - परिवार की बदनामी कराना। घर की बात - कुल - परिवार की बात या इज्जत।
घर की तरह बैठना (रहना) :- आराम से बैठना या रहना।
घर की खेती :- अपने यहाँ पैदा होनेवाली चीज, जो खरीदी न गयी हो।
[हिं. घर + ग्राऊ (प्रत्य.)]
कफ के कारण कंठ से साँस लेते समय निकलने वाला शब्द।
घर की आर्थिक दशा बिगाड़नेवाला।
घर के घर :- (१) चुपचाप, गुप्त रीति से।
(२) बहुत से घर।
घर खोना :- घर का नाश करना।
घर-घर :- सभी घरों में।
घर चलना :- (१) घर का नाश होना।
(२) घर की बदनामी होना।
घर-घाट :- (१) रंग-ढंग।
(२) प्रकृति, स्वभाव।
(३) ठौर-ठिकाना।
घर-घाट जानना :- सभी भेद जानना।
घर घालना :- (१) घर का नाश करना।
(२) घर की बदनामी करना।
(३) प्रेम करके घर बरबाद कर देना।
घर घुसना :- हर समय घर ही में रहनेवाला।
घर चलना :- निर्वाह होना।
घर चलाना :- निर्वाह करना।
घर डुबोना :- (१) घर बरबाद करना।
(२) घर की बदनामी कराना।
घर डूबना :- (१) घर बरबाद होना।
(२) घर की बदनामी होना।
घर जमना :- गृहस्थी का सामान जुटना।
घर जाना :- कुल का नाश होना।
घर जुगुत :- गृहस्थी का प्रबंध।
घरझँकनी :- घर-घर झाँकनेवाली।
घर तक पहुँचना :- माँ-बहन या बापदादे को गाली देना।
घर देखना :- किसी के घर माँगने जाना।
घर देख लेना (पाना) :- एक बार कुछ पाकर परच जाना।
किसी के घर पड़ना :- पत्नी के रूप से रहना।
(वस्तु) घर पड़ना :- किस भाव से घर आना।
घर पीछे :- एक एक घर से।
घर फटना :- (१) बुरा लगना।
(२) घर वालों में झगड़ा होना।
घर फूँक तमाशा देखना :- घर की संपत्ति आदि का नाश करके मनोरंजन करना या प्रसन्न होना।
घर फोड़ना :- घर वालों में झगडा कराना।
घर बंद होना :- (१) घर में ताला पड़ना।
(२) घर वालों का तितर-बितर हो जाना।
(३) घर से संबंध न रहना।
घर बिगाड़ना :- (१) घर की संपत्ति नष्ट करना।
(२) घरवालों में फूट पैदा करना।
(३) घर की बहू-बेटी को बुरे मार्ग पर ले जाना।
घर बनना :- घर की आर्थिक दशा सुधरना।
घर बनाना :- (१) जम कर रहना।
(२) घर की आर्थिक दशा सुधारना।
(३) अपना घर भरना, अपना लाभ करना।
घर बरबाद होना :- घर की आर्थिक दशा बिगाड़ना।
घर बसना :- (१) घर की दशा सुधरना।
(२) विवाह होना।
घर बसाना :- (१) घर की दशा सुधारना।
(२) विवाह करना।
घर बैठना :- (१) एकांत में रहना
(२) स्त्रियों में रहना।
(३) काम छोड़ बैठना।
(४) पत्नी-रूप में रहने लगना।
घर बैठे रोटी :- बेमेहनत की जीविका।
घर बैठे बैठे :- (१) बिना काम किये।
(२) बिना कहीं गये-आये।
(३) बिना यात्रा किये। घर भर-परिवार के सब लोग।
घर भरना :- (१) अपना ही लाभ करना।
(२) हानि की पूर्ति होना।
(३) घर में मेहमान आना।
घर में :- स्त्री. घरवाली।
घर में डालना :- पत्नी रूप में रख लेना।
घर में पड़ना :- पत्नी रूप से रहना।
घर से :- पास से।
घर से पाँव निकालना :- मनमाने ढंग से घूमना-फिरना।
घर से बाहर पाँव निकालना :- हैसियत से ज्यादा काम करना।
घर से देना :- (१) अपने पास से देना।
(२) हानि उठाना।
घर सेना :- (१) घर में पड़े रहना।
(२) बेकार बैठना।
घर होना :- (१) निबाह होना।
(२) परस्पर प्रेम या मेल होना।
रेखाओं से घिरा स्थान, खाना।
चौपड़, शतरंज आदि का खाना।
चौपरि जगत मड़े दिन बीते। गुन पासे क्रम अंक चार गति सारि न क कबहूँ जीते। चारि पसारि दिसानि, मनोरथ घर फिरि फिरि गिनि आने-१.६०।
घर बंद होना :- गोटी चलने का रास्ता बंद होना।
(संदूक, अलमारी आदि का) खाना।
चेहरे या शरीर के किसी अंग पर गोल सूजन, मसा या मांस का लोथड़ा।
गुड़ की चाशनी में पगाया हुआ पाग।
कड़ाह में गाढ़ा करके जलाया हुआ ऊख का रस. गुड़।
(क) रस लैलै - "श्रौटाइ करत गुर, डारि देत है खोई - १ - ६३।
(ख) गूँगे गुर की दसा भई है पूरन स्याम सोहाग सही - १९८२।
(ग) अति बिचित्र लरिका की नाई गुर देखाइ बौरावहिं - २९८५।
तुम गुर होहु और जो सीखै तिनकी समुझ सहेली - सा, ८४।
मूलमंत्र, सार, तत्व की बात।
सूर भजि गोबिंद के गुन, गुर बताए देत - १:३११।
(पानी आदि के समाने का) स्थान।
(नगीना आदि जड़ने का) स्थान।
रहने का स्थान, ठौर, ठिकाना।
[सं. धर्म + ना (प्रत्य.)]
[हिं. घर + वा या वाहा (प्रत्य.)]
[हिं. घर + वा या वाहा (प्रत्य.)]
घर का साज-सामान या धन संपति, गृहस्थी।
[हिं. घर + वात (प्रत्य.)]
तरुवर.मूल अकेली ठाढ़ी दुखित राम की घरनी। बसन कुचील, चिहुर लपिटाने, बिपति जाति नहिं बरनी - ९ - ७३।
(ख) जांकी घनि हरी छल - बल करि, लायो बिलँब न आवत - ९ - १३३।
(ग) सूरदास धनि नंद की घरनी, देखत नैन सिराइ - १० - ३३।
घरवालों में झगड़ा-बखेड़ा करानेवाला।
घरवालों में फूट या कलह करानेवाली।
रखेली। घर में पत्नी की तरह रहनेवाली प्रेमिका।
घर की दशा बिगाड़नेवाली (व्यंग्य)।
रहने का स्थान, ठौर ठिकाना।
निज की सारी संपत्ति, गृहस्थी का साज-सामान, घरद्वार।
तुम्हरै भजन सबहि सिंगार। जो कोउ प्रीति करै पद - अंबुज, उर मंडत निरमोलक हार। किंकिनि नूपुर पाट - पटंबर, मानो लिये फिरैं घरबार - १ - ४१।
घर की मालिकिन या स्वामिनी।
[हिं. घर + वाली (प्रत्य.)]
[हिं. घर + वाली (प्रत्य.)]
घर में झगड़ा करनेवाली स्त्री।
[हिं. घर+सं. घाती, हिं.घ ई]
घर की बुराई करने या कलंक लगानेवाली स्त्री।
[हिं. घर+सं. घाती, हिं.घ ई]
कलंक, लांछन यो दोष लगानेवाली स्त्री।
(क) बहुरि हिमाचल के सुभ घरी। पारवती ह्वै सो अवतरी - ४ - ७।
(ख) मेरे कहैं। बिप्रनि बुलाइ, एक सुभ घरी धराइ, बागे चीरे बनाइ भूषन पहिरावौ - १० - ९५।
करत घरी-बाँधते हो, ल पेटते हो, सम्हालते हो।
इन निर्गुन निर्मोल की गठरी अब किन करत घरी - ३१०४।
घर का ठीक-ठीक, बँधा-बँधाया प्रबंध या खर्च।
[हिं. घर + एला, एलू (प्रत्य.)]
[हिं. घर + एला, एलू (प्रत्य.)]
घर का बना या तैयार किया हुआ।
[हिं. घर + एला, एलू (प्रत्य.)]
स्याम अकेले आँगन छाँडे, आपु गई कछु काज घरै - १०.७६।
विवाह में कन्या-पक्ष के लोग।
[हिं. घर + आती (प्रत्य.)]
[हिं. घर + आना (प्रत्य.)]
(क) तुरतहिं देत बिलंब न घरि कौ - १० - १८१।
(ख) और किए हरि लगी न पलक घरि - ३४०९।
सुनत शब्द घरियार के नृप द्वार बजावत - २५६०।
(क) तरु दोउ धरनि गिरे भहराइ।…...। कोउ रहे अकास देखत, कोउ रहे सिरनाइ। घरिक लौं जकि रहे जहँ तहँ, देह गति बिसराइ - ३८७।
(ख) घरिक मोहिं लगिई खरिका मैं, तू जनि आवै हेत - ६७९।
मिट्टी का एक पात्र जिसमें सोना-चाँदो गलायी जाती है।
(कपड़े आदि की) तह लगाना, लपेटना।
काल का एक समय जो चौबीस मिनट के बराबर होता है।
(क) राम न सुमिरयौ एक घरी - १ - ७१।
(ख) मोकौं मुक्ति बिचारत है प्रभु पचिहौ पहर - घरी - १.१३०।
हथियार चल जाना, गोली छूट पड़ना।
बच्चों द्वारा बनाया हुआ धूल-मिट्टी का घर
घर्रा चलना (लगना) :- मरते समय कफ के कारण साँस का घरघराहट के साथ निकलना।
गहरी नींद में नाक से निकलनेवाला ‘घरघर' का शब्द।
[अनु, घर्र + आटा (प्रत्य.)]
घर्राटा भरना :- गहरी नींद में सोना।
रगड़ा हुआ, रगड़ खाया हुआ।
छूट जाना, गिर पड़ना, फेंका जाना।
फटे-पुराने कपड़ों से बना ओढ़ना या बिछौना, कंथा।
गुदड़ी के लाल :- साधारण स्थान में बहुमूल्य वस्तु या महान व्यक्ति।
गुदड़ी का लाल :- ऐसा धनी या गुणी जिसके वेश से धन या गुण का पता न लगे।
स्त्री जो गोदना गुदाये हो।
रगड़ते हुए खींचना, कढ़ोरना। यौ-घसीटा-घसीटी-खींचातानी।
[सं. घृष्ट, प्रा. घिष्ट + ना (प्रत्य.)]
जल्दी से लिखकर चलता करना।
[सं. घृष्ट, प्रा. घिष्ट + ना (प्रत्य.)]
किसी झगड़े या मामले में जबरदस्ती शामिल करना।
[सं. घृष्ट, प्रा. घिष्ट + ना (प्रत्य.)]
लटपटी पाग महाबर के रँग मानिनि पग पर सीस घसेहो - १९५५।
किसी धातु खंड (घंटे अदि) पर आघात का शब्द होना, घहराना।
(घंटे आदि) बजने या घनघनाने लगे।
घोर शब्द करता है, गरजता है।
गर्जत, ध्वनि प्रलयकाल गोकुल भयौ अंधकाल चकृत भए ग्वालबाल घइरत नभ करत चहल - ९४८।
गंभीर, घोर या भीषण ध्वनि करना, गरजना।
गरजकर, गंभीर शब्द करके, घहराकर।
(क) गगन घहराइ जरी घटा कारी - ३८४।
(ख) फूले बजावत गिरि गिरी गार मदन भेरि घइराइ अपार संतन हित ही फूल डोल - २४१३।
गगन भेद घंहरात थहरात गात - ९६०।
गरजना, गंभीर या घोर ध्वनि करना, भीषण शब्द निकालना।
गंभीर ध्वनि, तुमुल शब्द, गरज।
सुनत घहरानि ब्रज में लोग चकित भए, कहा आघात धुनि करत आव - २० - ६९।
गरजने लगी, घोर शब्द किया।
घोर शब्द करनेवाला, गरजनेवाला।
(क) गुहि गुंजा, घसि बन धातु, अंगनि चित्र ठए - १० - २४।
(ख) एकनि कौं पुहुपनि की माला, एकनि कौं चंदन घसिनीर - १० - २५
(ग) घसि कै गरल चढाइ उरोजनि, लै रुचि सौं पय। प्याऊँ - १० - ४९।
(अपराध स्वीकार करके क्षमा मागते या बिनती करते हुए माथा आदि चरणों या देहली पर) घिसकर या रगड़कर।
जावक रस मनौ संबर अरिगन पिया मनायी पद ललाट घसि - १९५४।
[सं. घर्षित + ना (प्रत्य.)]
[हिं. घास + आरा (प्रत्य.)]
[हिं. घास + आरा (प्रत्य.)]
गंभीर ध्वनि करनेवाली, गरजनेवाली।
मथति दधि जसुमति मथानी, पुनि रही घर - घहरि - १० - ६७।
इहिं अंतर अँधवाह उठयौ इक, गरजत गगन सहित घहरै - १० - ७६।
किहिं घाँ के तुम बीर बटाऊ कौन तुम्हारौ गाउँ - ९४४।
(क) गर्भ परीच्छित रच्छा कीनी, हुतौ नहीं बस माँ कौ। मेटी पीर परम पुरुषोत्तम, दुख मेट्यौ दुहुँ घाँ कौ - १ - ११३।
(ख) सूर तबहि हम सौं जौ कहती तेरी घाँ ह्वै लरती - १२७१।
स्त्रियों का घेरदार पहनावा, लहँगा।
[सं. घर्घर= क्षुद्र घंटिका]
दो उँगलियों के बीच की संधि।
पेड़ी और ङाल के बीच का कोना।
घाइयाँ बताना :- झाँसा देना।
संज्ञा घाव, क्षत, जखम, चोट, आघात।
(क) धमकि मारथौ घाउ गुमकि हृदय रहयौ झमकिं गहि केस लै चले ऐसे - २६१५।
(ख) रिषि दधीचि हाड़ ले दान। ताकौ तू निज बज्र बनाउ। मरि है असुर ताहि कैं घाउ - ६ - ५।
गुप्त रूपसे माल उड़ानेवाला।
हरि बिछुरे हम जिती सहत हैं तिते बिरह के घाइ - ३१५९।
जिसे घाव लगा हो, जखमी, घायल।
दो वस्तुओं के बीच का स्थान, संधि।
मोहन मुसुकि गही दौरत मैं छूटि तनी छंद रहित घाघरी - २३९६।
नदी या जलाशय का ऐसा स्थान जहाँ लोग नहाते-धोते हैं।
घाट-वाट-सर्वत्र, सभी स्थलों पर।
करि हियाव, यह सौंज लादि के, हरि कै पुर लै जाहि। घाट-बाट कहुँ अटक होइ नहिं. सब कोउ देहि निंबाहि -- १-३१०।
नदी या जलाशय का वह स्थान जहाँ धोबी कपड़े धोते हैं।
नदी या जलाशय का वह स्थान जहाँ लोग नाव पर चढ़कर पर उतरते हैं।
घाट धरना :- राह रोकना।
घाट धरयौ :- जबरदस्ती रास्ता रोक लिया।
उ. - धाट धरयौ तुम यहै जानि कै करत ठगन के छंद।
घाट मारना :- नाव या पुल का किराया (उतराई) न देना।
घाट लगना :- नाव पर एक बार में चढ़नेवाले यात्रियों का इकट्ठा होना।
नाव का घाट लगना :- नाव किनारे पहुँचना।
(किसी का) किनारे लगना :- आश्रय या सहारा पा जाना।
तंग पहाड़ी रास्ता या उतार।
एक अनुभवी व्यक्ति जिसकी कहावतें बहुत प्रसिद्ध हैं।
बड़ा चालक या खुर्राट आदमी।
उल्लू की जाति का एक पक्षी।
स्त्रियों का एक पहनावा, लहँगा।
[सं, घर्घर=क्षुद्रांटिका]
आप अपनी घात निरखत खेल जम्यौ बनाई।
घात पर चढ़ना (में आना) :- वश में आना, हत्थे चढ़ना।
घात में पाना :- काम सिद्ध होने की स्थिति में पा जाना।
घात लगना :- सुयोग मिलना।
घात लगाना :- उपाय भिड़ाना, तदबीर लगाना, मौका ढूँढ़ना।
उ. - सहसबाहु के सुतनि पुनि राखी घात लगाइ। परसुराम जब बन गयौ मारयौ रिसि कौं धाइ - ९ - १४।
उपयुक्त अवसर या सुयोग की प्रतीक्षा, ताक।
घात में फिरना :- ताक में घूमना।
घात में बैठना :- छिपकर बैठना या तैयार रहना।
घात में रहना (होना) :- अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करना।
घात लगाना :- तदबीर लडाना, मौका ताकना।
(क) मैं जानी पिय मन की बात। धरनी पग - नख कहा करोवत अब सीखे ए घात - २०००।
(ख) घात मन करत लैं डारिहौं दुहुनि पर दियो गज पेलि आपुन हँकारयो - २५९२।
(ग) भाजि जाहि सघन स्याम महूँ जहाँ न कोऊ घात - २७७७ |
घात बताना :- (१) चालाकी सिखाना।
(२) चाल चलना, बहलाना, रास्ता बताना।
रंग-ढंग, तौर-तरीका, ढब, धज।
क्रूरकर्मा, हिंसक, बधिक, जल्लाद।
माघौ जू मोतैं और न पापी। घातक, कुटिल, चबाई कपटी, महाक्रूर संतापी - १ - १४१
उर्द की पीठी के बड़े जो गुड़ के रस में या उसकी चटनी में भिगोये गये हों।
मूँगपकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे, इक भिजे गुरबरा - ३९६।
[हिं. गुड़ + बड़ा= पीठी की गोल चकतियाँ]
गुरू से मंत्र लेनेवाला, जिसने दीक्षा ली हो, दीक्षित।
आम का वह वृक्ष जिसके फल खूब मीठे हों।
चारा काटने का हथियार, गड़ासा।
घाटा भरना :- कमी पूरी करना।
[हिं. घाट+सं. रोध) घाट से किसी को उतरने-चढ़ने न देना।
बाकी (रही), शेष (बची), कम (रही)।
कौन करनी घाटि मोसौं, सो करौं। फिरि काँधि। न्याइकै नहिं खुनुस कीजै, चूक पल्लैं बाँधि - १ - १९९।
घाट पर दान लेनेवाला ब्राह्मण, गंगापुत्र।
पहाड़ी सँकरा मार्ग, दर्रा।
मार्ग-कर चुकाने का प्राप्तिपत्र।
ये कुलटा कलीट वे दोऊ। इक तें एक नहिं घाटे दोऊ
(क) सुआ पढ़ावत गनिका तारी, व्याध तरयौ सर - घात किऐं - १८९।
(ख) घात करयौ नख उर कौं–७३८।
घात चलाना :- जादू टोना करना।
उ. - (क) प्रान हमारे घात होत हैं तुमरे भावै हाँसी–३०६३।
(ख) सूरदास सिसुपाल पानि गहै पावक जारि करौं तन घात–१०उ. ११।
किंचित स्वाद स्वान बानर ज्यौं, घातक रीति ठटी - १.९८।
केसि - कंस दुष्ट मारि, मुष्टिक कियौ घाता - १ - १२३।
कुच बिष बाँटि लगाइ कपट करि, बालघातिनी परम सुहाई - १० - ५०।
घाती कुटिल ढीठ अति क्रोधी कपटी कुमति, जुलाई - १ - १८६।
क्यों एं बचन सुअंक सूर सुनि बिरह मदन सर घाती - २९८०।
घाम खाना :- धूप में रहना।
घाम लगना :- लू खा जाना।
घाम में घर छाना :- घर को कष्ट या संकट में डालना।
घर में घाम आना :- बड़ी मुसीबत में पड़ जाना।
जो (चौपाया) धूप से व्याकुल हो।
कहुँ जावक कहूँ बने तँबोल रँग, कहुँ अँग सेंदुर दाग्यौ। मानो रन छूटे घायल कौं जहँ तहँ स्रोनित लाग्यौ - १९७२।
पानी के बहाव से कटकर बननेवाला गड्ढा या मार्ग।
दाँव, सुयोग, स्वार्थ सिद्धि का उपयुक्त स्थान और अवसर।
मोंसों कहत स्याम हैं कैसे ऐसी मिलई घातें–१२६०।
(क) मेरी बाँह छोड़ि दै राधा, करत उपरफट बातें। सूर स्याम नागर, नागरि सौं, करत प्रेम की घातै - ६८१।
(ख) हम सब जानत हरि की घातैं - ३३३८।
(ग) तुम निसि दिन उर अंतर सोचत ब्रज जुवतिन की घातैं - ३०२४।
उतनी वस्तु जितनी एक बार कोल्हू में पेरने, चक्की में पीसने, कड़ाही में पकाने या भाड़ में भूनने के लिए डाली जाय।
संहार या नाश करना, मारना।
[सं. घात, प्रा. घाय+ना (प्रत्य.)]
मीत, घाम घन, बिपति बहुत बिधि, भार तरैं मर जैहौं - १ - ३३१।
घाल न गिनना :- बहुत तुच्छ समझना।
जौ प्रभु भेष धरैं नहिं बालक। कैसे होहिं पूतनाघालक - ११०४।
मारने या नाश करने की क्रिया या भावना।
[सं. घालक + ता (प्रत्य.)]
बिगाड़ते हैं, नाश करते हैं।
सूर स्याम संगहि सँग डोलत औरनि के घर घालत - पृ० ३२२।
तनक तनक से ग्वाल छोहरन कंस अबहिं | बधि घालत - २५७४।
मारती है, चलाती है, चुभोती है।
घालति छुरी प्रेम की बानी सूरदास को सकै सँभारि।
(किसी वस्तु के भीतर या ऊपर) रखना या डालना।
[सं. घटन, प्रा. घडन या घलन]
[सं. घटन, प्रा. घडन या घलन]
[सं. घटन, प्रा. घडन या घलन]
दूर किये, मिटाये, नष्ट किये।
तुम पूरे सब भाँति मातु पितु संकट घाले - ११३७।
इनकी बुद्धि इनकौं अब घालौं - १०४२।
बिगाडा, बुरा चैता, अनिष्ट किया।
मैं नहिं काहू को कछु घाल्यौ पुन्यमि करवर नाक्यौ - २३७३।
किसी चीज के भीतर या ऊपर डाला।
बिन ही भीत चित्र किन कीनो किन नभ हठ करि घाल्यौ झोरी - ३०२८।
परत निसासनि घाव तमकि धनु तरपत जिहिं जिहिं वार - २८२६।
घाव खाना :- घायल होना।
घाव (जले) पर नमक (नोन) छिड़कना :- दुख के समय और जी दुखाना।
घाव देना :- जी दुखाना।
घाव पूजना (भरना, पूरना) :- (१) घाव ठीक होना।
(२) शोक या दुख कम होना।
घाव का इलाज करनेवाला, जर्राह।
[हिं. घाव + वरिया (वाला)]
हरी घास हू सो नहिं चरै - ५ - ३।
[सं. घटन, प्रा. घडन या घलन]
[सं. घटन, प्रा. घडन या घलन]
टूक टूक ह्वै सुभट मनोरथ आने झोली घालि - ३८२६।
रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ - १ - ५८।
किसी वस्तु के भीतर या ऊपर रखकर।
कहा मन मैं घालि बैठी भेद मैं नहिं लख सकी - २२५९।
ठाढो बाँध्यौ बलबीर, नैननि शिरत नीर, हरिजू तैं प्यारौ तोकौं, दूध, दही घियतौ - ३७३।
घेवर अति घिरत चभोरे - १० - १८३।
घेरे घिरतिं न तुम बिनु माधौ, मिलतिं न बेगि दई - ६१२।
घास काटना (खोदना) :- (१) तुच्छ या हीन काम करना
(२) व्यर्थ का प्रयत्न करना।
(३) लापरवाही से काम करना।
काटिबो घास :- निरर्थक प्रयत्न करना।
उ. - तुम सौं ने प्रेमकथा को कहिबो, मनौ काटिबो घास - ३३३६।
घास खाना :- मूर्खता का काम करना।
घास छीलना :- तुच्छ या निरर्थक काम करना।
उँगलियों के बीच की संधि, गावा, घाई।
देखहु जाइ रूप कुबजा को सहिन सकत यहु घाहु - ३२२४।
रोते-रोते पड़नेवाली सुबकी या हिचकी।
डर के मारे मुँह से शब्द ननिकलना।
माला आदि का दाना, मनका या गाँठ।
[हिं. गुड़+ईला (प्रत्य.)]
[हिं. गुड़+ईला (प्रत्य.)]
देवताओं के प्राचार्य, बृहस्पति।
लटकन लटकि रहे भ्रू् ऊपर रंग रंग मनिगन पोहे री। मानहु गुरु सनि - सुक्र एक ह्वै लाल भाल पर सोहै री - १० - १३९।
करुण स्वर से | विनती करना, गिड़गिड़ाना।
कम जगह में बहुत सी चीजें होना।
जिसे देखकर घिन लगे, बुरा, गंदा, घिनौना।
[हिं. घिन + आवना (प्रत्य.)]
घृणा करेंगे, अरुचि दिखायँगे।
जिन लोगनि सौं नेह करत है, तेई देखि घिनैहैं - १ - ८६।
चारो तरह से रुकवाते हैं, घिरवाते हैं।
मैया हौं न चरैहौं गाइ। सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं, मेरे पाइ पिराइँ - ५१०।
केस गहे पुहुमी घिसिटायौ - २६२१।
काम होने से मशीन आदि की क्षीणता।
एक पक्षी जो पानी के ऊपर मँडराता रहता है।
रगड़ खाकर कम होना, छीजना।
घिसने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
कुब्जा घिसि चंदन लै आई - सारा, ५०२।
घी का कुप्पा :- बड़ा धनी।
घी का कुप्पा लुढ़कना :- (१) धनी आदमी का मरना।
(२) गहरी हानि होना।
घी के कुप्पे से जा लगना :- (१) धनी से भेंट और लाभ होना।
(२) मोटा होने लगना।
घी के दिये जलना :- (१) कामना पूरी होना।
(२) उत्सव होना।
(३) धन धान्य से पूर्ण होना।
घी के दिये जलाना :- (१) इच्छा पूर्ति पर उत्सव मनाना।
(२) धन-धान्य से पूर्ण होना।
घी के दिये भरना :- (१) उत्सव मनाना।
(२) सुख-संपति भोगना।
घी -खिचड़ी :- खूब मिला-जुला।
घी खिचड़ी होना :- बहुत गहरी मित्रता होना।
पाँचों उँगलियाँ घी में होना :- खूब लाभ का सुख होना।
रोटी, बाटी, पोरी झोरी। इक कोरी, इक घीव नभोरी - ३९६।
घिसने या रगड़ने की क्रिया, माँजा, रगड़।
तुमहिं कहत कोउ करै सहाइ। वह देवता कंस मारैगौ, केस धरे धरनी घिसिआइ - ५३१।
हाथ से डोरी लड़ाने को खेल।
हाथ से डोरी लड़ाने का खेल।
(क) घींच मरोरि, दियौ कागासुर मेरें ढिग फटकारी - १० - ६०।
(ख) नाथत ब्याल बिलँब न कीन्हौ। पग सौं चाँपि घींच बल तोरयौ, नाक फोरि गहि लीन्हौ - ५५७।
[सं. ग्रीव अथवा हिं. घींचना]
बूट का कोष जिसमें चना दाना रहता है।
[अनु. घुन घुन + सं. रव या रू]
सनई का सूखा फल जिसके बीज बजते हैं।
[अनु. घुन घुन + सं. रव या रू]
जिसमें घुँघरू लगे या बंधे हों, घुँघुरुओं से युक्त।
कपड़े की सिली हुई छोटी गोली जो बटन की जगह लगायी जाती है।
जी की घुंडी खोलना :- मन से बैर द्वेष निकालना।
कड़े, बाजु, जोशन आदि गहनों की गाँठ।
कटने पर धान की जड़ से फूटनेवाला नया अंकुर, दोहला।
इस लता को लाल बीज जिस पर एक छोटा काला छींटा रहता है।
घुँघनी मुँह में रखकर बैठना :- मौन रहना।
घुँवरारे, घुँघराला, घुँघराले
मृगमद मलय अलक घुँघरारे। उन मोहन मन हेरे हमारे।
धातु की पोली गुरिया जिसमें कंकड़ आदि भरकर बजाते हैं।
[अनु. घुन घुन + सं. रव या रू]
घुँघरू सा लदना :- शरीर में बहुत अधिक चेचक के दाने, छाले या फुंसियाँ होना।
छोटी छोटी गुरियों का बना पैर का गहना जो बच्चों को पहनाया जाता है या नाचनेवाले पहनते हैं।
प्रेम सहित पग बाँधि घूँघरू सक्यौ न अंग नचाइ - १५५।
[अनु. घुन घुन + सं. रव या रू]
घुँघरु बाँधना :- (१) नाचना सिखाने के लिए चेला बनाना।
(२) नाचने को तैयार होना।
मरते समय कफ की अधिकता के कारण निकलनेवाला घुरघुर शब्द।
[अनु. घुन घुन + सं. रव या रू]
घुँघरू बोलना :- मरते समय कफ के कारण घुरघुर शब्द निकलना, घर्रा या घटका लगना।
उल्लू का, या उल्लू की तरह, बोलना।
बिल्ली का, या बिल्ली की तरह, गुर्राना।
जाँध और टाँग के बीच की गाँठ, संधि या जोड़।
घुटना टेकना :- (१) घुटनों के बल बैठना।
(२) नम्र होना, प्रार्थना करना।
घुटनों (के बल) चलना :- बच्चों का बैंयाँ बैयाँ चलना।
घुटनों में सिर देना :- (१) सिर नीचा करना, चिंतित या उदास होना।
(२) मुँह छिपाना, लज्जित होना।
घुटनों से लगकर बैठना :- हर समय पास रहना।
साँस का रुकना, फँसना या खुल कर न लिया जाना।
मीनार या अन्य इमारत का ऊपरी भाग।
विद्या, बुद्धि, वय, पद आदि में बड़े, पूज्य व्यक्ति।
गुरु या आचार्य का कर्तव्य।
(क) घुटरुनि चलत अजिर महँ बिहरत मुख मंडित नवनीत - १० - ९७।
(ख) घुटरुन चलत कनक आँगन में - सारा. १६६।
पैर के बीच की गाँठ या जोड़, घुटना।
घोट्ने। या रगड़ने का काम करना।
घोटने, रगडने, चिकना या चमकीला बनाने की क्रिया या मजदूरी।
घोंटने या रगड़ने का काम करना।
घुटुरुनि, घुटुरुअनि, घुटुरुवनि
(क) कबहिं घुटुरुवनि, चलहिंगे, कहि, बिधिहिं मनावै - १० - ७४।
(ख) कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वै क धरै - १०.७६।
(ग) घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित सूरदास बलि जाई - १० - १०८।
घुट्टी में पड़ना :- स्वभाव का अंग होना।
बंदर घुड़की-झूठमूठ डराना, धमकाना।
विवाह की एक रीति जिसमें दुलहिन के घर जाने के लिए दूल्हा | घोड़े पर चढ़ता है।
जुआ। जो घोड़ों के दौड़ने पर खेला जाता है।
घुटघुट कर मरना :- (१) बड़ी कठिनता से प्राण निकलना।
(२) बहुत कष्ट सहकर जीवन बिताना।
(३) कष्ट सहने को इस प्रकार विवश या अधीन होना कि उसका विरोध करना तो दूर, चर्चा तक न कर सकना।
फँसना, उलझ कर खड़ा हो जाना।
घुटा हुआ :- बहुत चालाक, काँइयाँ, छँटा हुआ।
रगड़ से चिकना-चमकीला होना।
मेल जोल या घनिष्टता होना।
(कार्य या अभ्यास) बार बार होना।
वह रथ जिसमें घोड़े जोते जाते हों।
मिट्टी धातु आदि का घोड़ा।
[हिं. घोड़ा + ला (प्रत्य.)]
[हिं. घोड़ा + ला (प्रत्य.)]
घोड़े बाँधने का स्थान, अस्तबल, पैड़ा।
क्रोध, द्वेष आदि को मन ही मन रखने या पालनेवाला, चुप्पा।
मन का भाव छिपाने में कुशल, चुप्पी, मौन।
[हिं. घूमना + अकड़ (प्रत्य)]
[हिं. घूमना + अकड़ (प्रत्य)]
[हिं. घूमना + टा (प्रत्य.)]
बादलों का छाना या उमढ़ना।
ऐसा कार्य या रचना जो अनजान या आकस्मिक रूप से हो जाय।
घुन लगना :- (१) इस कीड़े की लकड़ी या अनाज को खाना।
(२) धीरे धीरे किसी चीज का छीजना या नष्ट होना।
घुन के द्वारा लकड़ी आदि का खाया जाना।
ना।
किसी चीज का भीतर ही भीतर छीजना या नष्ट होना।
स्याम के बचन सुनि, मनहिं मन रहयो गुनि, काठ ज्यौं गयौ घुनि, तनु भुलानौ - ५९०।
घुनो बाँस गत बु न्यौ खटोला काहू को पलँग कनक पाटी को - १० उ. - ७१।
घूमने या चक्कर खाने की क्रिया।
पटकि चरन नृप स्रवनन घुमरयौ - २६४३।
जमीन की एक नाप जो दो बीघों के बराबर होती है।
चक्कर देना, चारो ओर फिराना।
किसी विषय या काम में लगाना
चक्कर देना, चारो ओर फिराना।
किसी विषय या काम में लगाना
गरजि घुमरात मद मार गंडनि स्रवत पवन ते बेग | तेहि समय चीन्हो - २५९१।
घोर शब्द करके, ऊँचे स्वर से बजकर, गूँजकर।
सूर धन्य जदुबंस उजागर धन्य धन्य धुनि घुमरि रह्यौ–२६१६।
[हिं. घुर + हर (प्रत्य.)]
फेनी घुरि मिसि मिली दूध संग - २३२१।
फलन माँझ ज्यों करुई तोमरि रहत घुरे पर डारी - २९३५।
घूमता फिरता हुआ चक्कर खाता हुआ।
वह व्यक्ति जो विद्या, वय, पद आदि में बड़ा हो।
सूरज दोष देत गोबिंद कौं गुरु तोगनि न लजात - १० - २९४।
कुमंत्रणा देनेवाला व्यक्ति, गुरु घंटाल (व्यंग्य)।
एक हरि चतुर हुते पहिले ही अब बहुतै उन गुरु सिखई - ३३०४।
घुमाव-फिराव की बात :- छल कपट, हेर फेर या दाँव-पेंच की बात या चाल।
जिसमें घुमव-फिराव या चक्कर हों, चक्करदार।
लोचन भरि भरि दोऊ माता, कनछेदन देखत जिय मुरकी। रोवत देखि जननि अकुलानी, दियौ तुरत नौवा कै घुरकी - १० - १८०।
कफ रुकने के कारण होनेवाली शब्द।
(बिल्ली आदि के) गुर्राने का शब्द।
घुरघुर शब्द निकालने का भाव, घुर्राहट।
अवधपुर आए दसरथ राई।…..। घुरत निसान, मृदंग - सुख धुनि, भेरि झाँझ सहनाइ - ९ - २९।
किसी द्रव पदार्थ का खूब हिल-मिल जाना।
घुलघुल कर बातें करना :- बड़ी लगन या प्रीति से बातें करना।
घुलमिलकर :- बड़ी लगन या प्रीति से।
नजर (आँखें) घुलना :- प्रेमपूर्वक देखना।
जल, दूध आदि के संयोग से गलना।
रोग आदि से शरीर क्षीण या दुर्बल होना।
घुला हुआ :- जिसकी शक्तियाँ क्षीण हो गयी हैं, बुड्ढा।
घुलघुल कर काँटा होना :- इतना दुर्बल होना कि हड्डियाँ दिखायी दें।
(समय) बीतना या व्यतीत होना।
पकाकर या दबाकर पिलपिला करना।
[सं. कुश = घेखा अथवा घर्षण]
[सं. कुश = घेखा अथवा घर्षण]
[सं. कुश = घेखा अथवा घर्षण]
किसी विषय में ध्यान लगाना।
[सं. कुश = घेखा अथवा घर्षण]
[सं. कुश = घेखा अथवा घर्षण]
साड़ी जैसे वस्त्र का वह भाग जिससे कुलवधू का मुँह ढँका रहता है।
(क) घूँघट पट कोट टूटे, छुटे दृग ताँजी - ६५०।
(ख) घूघट ओट महल में राखति पलक कपाट दिये - पृ. ३२६।
घूँघट उठाना (उलटना) :- (१) घुँघट हटाकर मुँह खोलना।
(२) परदा दूर करना।
(३) नयी वधू का मुँह खोलना।
घूँघट करना :- लाज-शर्म करना।
घूँघट काढ़ना (निकालना, मारना) :- घूँघट डाल कर मुँह ढकना।
दै घूँघट पट :- घूँघट काढ़कर, मुँह ढककर।
उ. - दै घूँघट पट ओट नील, हँसि, कुँवर मुदित मुख हेरे - ६३२।
पानी आदि द्रवों का उतना अंश जितना एक बार में घूँटा जाय।
घूमि रहीं जित तित दधि - मथनी, सुनत मेघ - धुनि लाजै री - १० - १३९।
चारो ओर फिरती है, चक्कर खाती है।
(एरी) आनँद सौं दधि मथति जसोदा, धमकि मथनियाँ घूमै - १० - १४०।
(क) पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै - २ - १३।
(ख) अपनो घर परिहरै कहौ को घूर बतावै…..।
(ग) ऊधौ घर लागै अब घूर कहौ मन कहा धावै - ३४४३।
[सं. कूट, हिं. कुरा, कूड़ा, घूरा]
[सं. कूट, हिं. कुरा, कूड़ा, घूरा]
[सं. कूट, हिं. कुरा, कूड़ा, घूरा]
बुरे भाव या बुरी | नियत से ताकना।
सिपाहियों की लोहे-पीतल की टोपी।
घेरे में मँडराना, कावा काटना।
लघु - लघु लट सिर घूँ घरवारी, लटकन | लटकि रह्यो माथे पर - १० - ९३।
(क) गभुआरे सिर केस हैं बर घूँघरवारे. - १० - १३४।
(ख) अरुझि रहे मुकताइल निरवारत सोहत घूँघरवारे बाल - पृ. ३१५।
लाख जतन करि देखौ, तैसें बार बार बिष घूँटै - १ - ६३।
साँस रोकने से, साँस दबाने से।
कहा पुरान जु पढ़ै अठारह, ऊर्ध्व धूम के घूँटै - २०१९।
बँधी हुई मुट्ठी, मुक्का, धमाका।
(किसी गाढी चीज को) हाथ या उँगली से मिलाना।
घर घर इहै घेर (घैर) बृथा मोसों करै बैर यह सुनि स्रवननि हृदय सहि दहिये - १२७३।
चारो ओर का फैलाव, विस्तार।
बार-बार प्रार्थना या सिफारिश लेकर जाना।
चोर ओर से रोकते हैं, इधर-उधर नहीं जाने देते।
मैया री मोहिं दाऊ टेरैत। मोकौं बन - फल तोरि देत हैं, आपुन गैयनि घेरत–४२४।
घेरने, रोकने या छाने की क्रिया, युक्ति या रीति।
(क)कहत न बनै काँध कामरि छबि बन गैयन की घेरन - ३२७७।
(ख) कोउ गए ग्वाल गाइ बन घेरन कोउ गए बछरु लिवाइ - ५००।
वह स्थान जहाँ कूड़ा फेका जाय।
दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य।
नील सेत अरु पीत लाल मनि लटकन भाल रुलाई। सनि गुरु - असुर देवगुरु मिलि मनुभौम सहित समुदायी - १० - १०८।
[सं. गुरु+हिं. आइन (प्रत्य.)]
[सं. गुरु+हिं. आइन (प्रत्य.)]
[सं. गुरु+हिं. आई (प्रत्य.)]
[सं. गुरु+हिं. आई (प्रत्य.)]
[सं. गुरु+हिं. आई (प्रत्य.)]
[सं. गुरु + आनी (प्रत्य.)]
[सं. गुरु + आनी (प्रत्य.)]
आचार्य का निवास स्थान जहाँ। रहकर ही विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करें।
जिसे देख या सुनकर मन में घृणा पैदा हो।
है हरि नाम कौ आधार।….। सकल स्रुति - दधि मथत पायौ, इतोई, घृत - सार - २ - ४।
यज्ञ में घी डालने की करछुली, श्रुवा।
किसी स्थान पर अधिकार जमाये रखना।
आक्रमण के लिए चारो ओर फैलना।
किसी के पास प्रार्थना या स्वार्थ से जाना।
चारों ओर से घेरने या रोकने की क्रिया।
गैयाँ गई बगराइ सघन बृंदावन बंसीबट जमुना तट घेरनो - २२८०।
आक्रमण करने या अधिकार जमाने के लिए चारो ओर से घेर लें।
सब दल होहु हुसियार चलहु मठ घेरहिं जाई - १० उ.८।
चारो ओर की सीमा या फैलाव, परिधि।
सीमा या परिधि का जोड़ या मान।
दीवार आदि जो किसी स्थान को घेरे हो।
(क) सकुचति हौं घर घर घेरा को नेक लाज नहिं तेरे - १०३९।
(ख) घेरा यहै चलावत घर घर सवन सुनत जिय खुनसों - १२२१।
(ग) सुनि न जात घरघर को घेरा काहू मुख न समाऊँ - १२२२।
पशु चराने की क्रिया या मजदूरी।
घेरने या घिरने की क्रिया या भाव।
चारो ओर से उमड़ कर, छा कर।
(क) अति भयभीत निरखि भवसागर, घन ज्यों घेरि रहयौ घट घरहरि - १. ३१२।
(ख) माधव मेघ घेरि कितौं आए - ९५८।
चारो ओर से रोक या छेंक कर।
(क) गैयन घेरि सखा सब लाए।
(ख) ग्वाल - बाल संग लिए थेरि रहै डगरौ - १० - ३३६।
तुम तें दूरि होत नहिं कतहूँ तुम राखौ मोहिं घेरी - ११९३।
दुर्ग पर अधिकार करने के लिए आक्रमण करने या चारो ओर से छेंक कर।
(क) लखन दल संग लै लंक घेरी - ९:१३९।
(ग) भीषम भवन रहत ज्यों लुब्धक असुर सैन्य मिलि घेरी - १० उ. - १२।
घेरे घिरतिं न तुम बिनु माधौ, मिलतिं न बेगि दई - ६१२
किसी स्वार्थ या उद्देश्य से सदा साथ रहते हैं।
या संसार विषय विष - सागर, रहत सदा सब घेरे - १ - ८५।
आक्रांत करता, छेंकता बा ग्रसता है।
दिन है लेहु गोविंद गाई। मोह माया - लोभ लागे, काल घेरै आइ - १ - ३१६।
कहा भयौ जौ संपति बाढ़ी, कियौ बहुत घर घेरौ - १ - २३६।
माधव सखा स्याम इन कहि - कहि अपने गाइग्वाल सब घेरौ - २५३२।
कहाँ कान्ह कहाँ मैं सजनी ब्रज घर घर यह चलत है घेरो - १२७१।
चारो ओर से घेरा, ग्रसा, छेको, आक्रांत क्रिया।
(क) ग्राह जब गजराज घेरयौ, बल गयौ हारी। हारि कै जब टेरि दीन्ही, पहुँचे गिरधारी - १ - १७६।
(ख) सुरति के दस द्वार रूँधे, जरा घेरयौ आइ। सूर हरि की भक्ति कीन्हैं, जन्म - पातक जाई - १ - ३१६।
एक वस्तु को चमकीली बनाने के लिए दूसरी से रगड़ना।
बार बार अभ्यास करना, रटना।
गला इस तरह दबाना कि दम घुट जाय।
वस्तु जिससे घोटने का काम किया जाय।
एक प्रकार की मिठाई जो, मैदे, घी और चीनी से बनती है।
घेवर अति घिरत - चभोरे - १० - १८३।
ताजे दूध के ऊपर के माखन को काछकर इकट्ठा करने की क्रिया |
(क) कजरी धौरी, सेंदुरि, धूमरि मेरी गैया। दुहि ल्याऊँ मैं तुरत हीं, तू करि दै री घैया–६६६।
(ख) दूध दोहनी लै री मैया। दाऊ टेरत सुनि आऊँ तब लौं करि बिधि धैया–७२५।
गाय के थन से निकलती हुई दूध की धार जो मुँह लगाकर पी जाय।
गिरि पर चढ़ि गिरवर - घर टेरे। अहो सुबल, श्रीदामा भैया, ल्यावहु गाइ खरिक के नेरे। आई छाक अबार भई है, नैंसुक घैया पिएउ सबेरे - ४६३।
पेड़ काटने या उसमें से रस निकालने के उद्देश्य से किया गया आघात।
निंदामय चर्चा, बदनामी, अपयश।
सूरदास - प्रभु बड़े गारुडी, ब्रज - घर - घर यह घेरु चलाइ - ७६१।
शंख की तरह का पानी का एक कीड़ा।
घूँट घूँट करके या धीरे धीरे पीना।
[हिं. घूँट, पू. हिं. घोंट]
[हिं. घूँट, पू. हिं. घोंट]
चिड़ियों का घर, नीड़, खोता।
[सं. कुशालय या हिं घुसना]
घोटने का भाव, क्रिया या मजदूरी।
[हिं. घोटना + आई (प्रत्य)]
घोटनेवाला।
रट्टू।
घोटने का औजार या वस्तु।
कटक.सोर अति घोर दसौं दिसि, दीसति बनचर - भीर - ९ - ११५
ज्यौं पावस रितु घन - प्रथम - घोर। जल जीवक, दादर रटत मोर - ९ - १६६।
क्रोध की मुद्रा के साथ, दृढ़ता से पकड़े हुए।
चित दै चितै तनय मुख ओर। सकुचत सीत भीत जलरुह ज्यौं तुव कर लकुट निरखि सखि घोर - ३५७।
कहि काको मन रहत स्रवन सुनि सरस मधुर मुरली की घोर - १४४७।
घोड़ा छोड़ना :- (१) किसी के पीछे घोड़ा दौड़ामा।
(२) घोड़े को इच्छानुसार चलने देना।
घोड़ा डालना :- किसी के पीछे घोड़े को जोर से दौड़ाना।
घोड़ा निकालना :- घोड़े को दूसरे से आगे बढ़ा लेना।
घोड़े पर चढ़े आना :- लौटने की बहुत जल्दी करना।
घोड़ा फेंकना :- घोड़ा बहुत तेज दोडाना।
घोड़ा बेचकर सोना :- गहरी नींद लेना।
बंदूक को एक पेंच या खटका।
शतरंज का एक मोहरा जो ढाई घर चलता है।
[हिं. घोड़ी+इया (प्रत्य.)]
[हिं. घोड़ी+इया (प्रत्य.)]
[हिं. घोड़ी+इया (प्रत्य.)]
विवाह की एक रीति जिसमें दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर दुलहिन के घर जाता है।
विवाह के गीत जो वर-पक्ष की ओर से गाये जाते हैं।
क्रोधी का अभिमानवश कर्कश स्वर में बोलना।
लड़कों के खेलने का मिट्टी का घोड़ा।
खुँटा जिसकी बनावट घोड़े के मुँह की तरह हो।
कुंकुम चंदन अरगजा घोरी - २४४४।
मनु आई चढ़ि घोरै :- (१) बहुत जल्दी मचा रही है।
(२) बड़ा गर्व कर रही है, किसी घमंड में है।
उ. - कहा भयौ तेरे भवन गए जो दियौ तनक लै भोरे। ता ऊपर का हैं गरजति है, मनु आई चढ़ि घोरे - १० - ३२१।
सुनि मुरली को घोरै सुर - बधू सीस ढोरें - २२८७।
घोलता है, पानी आदि। में मिलता है।
कागद धरनि करै द्रुम लेखनि जल - सायर मसि घोरै - १ - १२५।
कहौं तौ पैठि सुधा कैं सागर, जल समस्त मैं घोरौं। - ९ - १४८।
वह पानी जिसमें कुछ घुला हो।
पानी आदि द्रव पदार्थों में हल करना या मिलाना।
घोले में डालना :- (१) किसी काम को उलझन में डाल कर देर लगाना।
(२) टालटूल करना।
घोले में पड़ना :- झगड़े में पड़ना, देर लगाना।
[हिं. घोलना + उवा (प्रत्य.)]
घोलुवा पीना :- कड़ुई वस्तु पीना।
घोलुवा घोलना :- काम में देर लगाना।
(क) बकीजु गई घोष मैं छल करि, जसुदा की गति दीनी - १ - १२२।
(ख) आजु कन्हैया बहुत बच्यौ री। खेलत रह्यौ घोष के बाहर कोउ आयो शिशु रूप रच्यौ री।
बिछुरत भेंट देहु ठाढे ह्वै निरखो घोष - जन्म को खेरो - २५३२।
नंद बिदा ह्वै घोष सिधारौ - २६५३।
भारी शब्द करता है, गरजता है।
चहुँ दिसि पवन चकोरत घोरत मेघ घट गंभीर - ६६४।
तैसोई नन्ही नन्ही बूँदनि बरषै मधुर मधुर ध्वनि घोरनो - २२८०।
घोलकर, पानी आदि में-मिलाकर।
(क) जो गिरिपति मसि घोरि उदघि मैं, लै सुरतरु विधि हाथ। ममकृत दोष लिखे बसुधा भरि, तऊ नहीं मिति नाथ - १ - १११।
(ख) घोरि हलाहल सुन री सजनी औसर सर तेहि न पियो - २५४५।
अहीरों या ग्वालों की कुमारियाँ।
बहुत नारि सुहाग सुंदरि और घोषकुमारि - १०.२६
राजाज्ञा आदि की सूचना, मुनादी।
जो सुख ब्रज में एक घरी। सो सुख तीनि लोक मैं नाहीं घनि यह घोष पुरी - १० - ६९।
घौद, गौद, फलों का गुच्छा।
उत्सव जो फसल कटने पर मनाया जाता है।
(क) महुवरि बाँसुरी चंग लाल रंग हो हो होरी - २४१०।
(ख) डिमडिमी पटह ढोल डफ बीणा मृदंग उपंग चंग तार - २४४६।
चंग चढ़ना या उमहना :- खूब जोर या बढ़ती होना।
चंग पर चढ़ना :- (१) इधर उधर की बातें करके अपने अनुकूल या पक्ष में करना।
(२) मिजाज बढ़ा-चढ़ा देना।
[हिं. घाव + हा (प्रत्य.)]
चुटीला, घायल, चोट खाया हुआ।
क वर्ग का अंतिम अक्षर, स्पर्श वर्ण जिसका उच्चारण कंठ और नाक से होता है।
हिंदी का छठा व्यंजन और अपने वर्ग का पहलाअक्षर जिसका उच्चारण तालु से होता है।
भले जू भले नंदलाल वेऊ भली चरन जावक पाग जिनहिं रंगी। सूर - प्रभु देखि अंग अंग बानिक कुसल मैं रही रीझि वह नारि चंगी।
बनी-चगी :- बनी-चुनी, सजी-सजायी, खूब छँटी हुई, चतुर, भली (व्यंग्य)।
उ. - सखी बूझत ताहि हँसत जामुख चाहि स्याम को मिली री बनी चंगी - २१७५।
पशुपक्षियों का टेढ़ा और कड़ा पंजा।
किसी चीज को पकड़ते या लेते समय हाथ के पंजों की स्थिति।
चंगुल में फँसना :- वश या काबू में होना।
बिकसत कमलावली, चले प्रपुज - चंचरीक, गुंजत कतकोमल धुनि त्यागिं कंज न्यारे - १० - २०५।
तब लगि तरुनि तरल चंचलता, बुधि - बल सकुचि रहै। सूरदास जब लगि वह धुनि सुनि, नाहिंन धीर ढहै - ६४६।
[सं. चंचल + आई (प्रत्य.)]
बड़े गुरु की बुद्धि बड़ी वह काहू को न पत्यैहै - १२६३।
आँखें फाड़ फाड़ कर देखना, घूरना।
[सं. गुरु - बड़ा+ हेरना = ताकना]
मिट्टी की गोली जो गुलेल से चलायी जाती है।
किले का गोलाकार स्थान जहाँ से सिपाही लड़ते हैं, बुर्ज।
घास फूस का पुतला जो खेतों में पशु-पक्षियों के डराने के लिए गाड़ते हैं।
(क) जेंवत परखि लियौ नहि हमकौं, तुम अति करी चँड़ाइ - ४४४।
(ख) मैं अन्हवाए देति दुहूनि कौं, तुम आत करौ चँड़ाई - ५११।
(ग) रीदिनि भोजन करौ चँड़ाईं बार - बार कहि - कहि करि आरति - ५१२।
(घ) जननि मथत दधि, दुहुत कन्हाई। सखा परस्पर कहत स्याम सौं हमहूँ सौं तुम करत चँड़ाई - ६६८।
(ङ) गाई गई सब प्याइ के, प्रातहिं नहिं आई। ता कारन मैं जाति हौं, अति करति चँडाई–७१३।
(च) सूर नंद सौं कहति जसोदा, दिन आए अब करहु चँडाई - ८११।
सेना के पीछे का भाग, ’हरावल' का विपरीतार्थक।
लडाकू, कर्कशा, उग्र स्वभाववाली।
पुराना चंडूल :- बेडौल या मूर्ख आदमी।
मिट्टी का एक खानेदार खिलौना
चंद्रमा के समान सुख-शांति देनेवाला व्यक्ति।
सूरदास पर कृपा करौ प्रभु श्रीबृंदाबन - चंद - १ - १६३।
एक सुगंधित लकड़ी जिसको पीसकर हिंदू माथे पर तिलक लगाते हैं, पूजा करते हैं और स्थान आदि लिपाते हैं।
कंचन-कलस, होम द्विज-पूजा, चंदन भवन लिपायौ १० - ४।
पृथ्वीराज-रासो का रचयिता हिंदी का एक कवि।
मोर की पूँछ का अर्द्धचंद्रक चिह्न।
मोरन के चँदवा माथे बने राजत रुचिर सुदेस री।
(क) अपने कर गहि गगन बतावै खेलन को माँगै चंदा - १०. १९२।
(ख) ज्यौं चकोर चंदा को इकटक भृंगी. ध्यान लगावै - १८१८।
कमला तारा बिमला चंदा चंद्रावलि सुकुमारि - १५८०।
वह धन जो दान या सहायता-रूप में लिया जाय।
पत्र-पत्रिका या सभा-समिति का मासिक, छमाही या वार्षिक शुल्क।
चँदिया पर बाल न छोड़ना :- (१) सब कुछ हर लेना।
(२) खूब जूते मारना।
चंदिया मूड़ना :- धन-संपत्ति हर लेना।
चँदिया खाना :- (१) बकवाद से सिर खाना।
(२) सब कुछ हरकर दरिद्र बनाना।
चँदिया खुजलाना - मार खाने को जी चाहना।
ताल का सबसे गहरा तल या स्थान।
किसी पदार्थ का वह विंदु या स्थान, जिसे किसी नोक पर टिकाने से वह पदार्थ ठीक ठीक तुल जाय, इधर उधर झका न रहे।
वह आकर्षण जिसके द्वारा पृथ्वी पर सब पदार्थ गिरते हैं।
भेंट या दक्षिणा जो शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात प्राचार्य को दी जाय।
एक ही गुरु के शिष्य, गुरु-भाई।
[सं गुरु + बन्धु, हिं. बांधव]
एक ही गुरु के शिष्य, गुरु-बांधव।
जिसने गुरुमंत्र लिया हो, दीक्षित, गुरु के प्रति कृतज्ञ या नम्र।
दुरजोधन कें कौन काज जहँ आदर भाव न पइयै। गुरुमुख नहीं बड़े अभिमानी, कापै सेवा करइयै - १ - २३९।
पंजाब में प्रचलित एक लिपि जो देवनागरी का ही एक रूप है।
एक प्राचीन नगर जो ग्वालियर राज्य में था।
(क) रुक्म चँदेरी बिप्र पठायौ–१० उ. ७।
(ख) राव चँदेरी को भूपाल।
सिंहासन पर सोने-चाँदी के चोबों पर तना वितान।
वह बिंदी जो सानुनासिक वर्ण पर लगायी जाती है।
काम की केली कमनीय चंद्रक चकोर, स्वाति को बू्ँद चातक परौ री - ६९१।
चंद्रमा-सा मंडल या घेरा |
चंद्रमंडल का सोलहवाँ भाग।
चंद्रकला जनु राहु गहौ री–१० उ. ३०।
एक रत्न जो चंद्रमा के सामने पसीजता है।
एक रत्न जो चंद्रमा के सामने पसीजता है।
मस्तक पर चंद्रमा धारण करनेवाले शिव, महादेव।
बाण जिसका फल अर्द्धचंद्राकार होता है।
नख मानों चंद्रबान साजि कै झझकारत उर अग्यौ - १९७२।
अर्द्ध अनुस्वार का चिह्न।
चंद्रजोत, चंद्रजोती, चंदज्योति
चंद्रजोत, चंद्रजोती, चंदज्योति
सत्ताइस नक्षत्र जो चंद्रमा की पत्नियाँ मानी जाती हैं।
चंद्रकिरण या चंद्र प्रकाश।
चंद्रमा के प्रकाश से रात को दिखायी देनेवाला इंद्रधनुष।
सुभ कुरुखेत अयोध्या, मिथिला, प्राग त्रिबेनी न्हाए। पुनि सतनु औरहु चंद्रभागा, गंग ब्यास अन्हवाए - सारा, ८२८।
श्रीकृष्ण का एक पुत्र जो सत्यभामा के गर्भ से पैदा हुआ था।
चौकी हेम चंद्रमनि लागी हीरा रतन जराय खची।
[सं. चंद्रमा +ललाम = मस्तक पर तिलक का चिन्ह]
वह मास जिसमें चंद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा कर लेता है।
मस्तक पर चंद्रमा धारण करनेवाले शिव, महादेव।
द्वितीया का चंद्रमा जो एक रेखा के रूप में होता है।
चंद्रलोक दीन्हो ससि को तब फगुआ में हरि आय। सब नछत्र को राजा कीन्हो ससि मंडल में छाय।
बीर बहूटी नामक एक छोटा लाल कीड़ा।
द्वितीया के चंद्रमा के दोनों नुकीले ओर या किनारे।
चीनी में अमलतास या गुलाब के फूल धूप की गर्मी से पकाकर तैयार किया हुआ पदार्थ।
एक लाल बुकनी जो होली में चेहरे पर मली जाती है।
सूती, ऊनी या रेशमी पट्टी जो गले या सिर में लपेटी जाती है।
शिव जी जिनके मस्तक पर चंद्रमा है।
ब्रज का एक तीर्थ स्थान जो गोवर्द्धन के समीप स्थित है।
गले में पहनने की सोने की माला जिसके बीच में सोने का चंद्राकार पान रहता है।
मरने की अवस्था जब-टकटकी बँध जाती है और गला रुँध जाता है।
महीने भर का एक व्रत जिसमें चंद्रमा के घटने बढ़ने के अनुसार आहार घटाना-बढ़ाना होता है।
सहस बार जौ बेनी परसै, चंद्रायन कीजै सौ बार - २ - ३।
श्री कृष्ण की प्रेमिका और राधा की एक सखी जो चंद्रभानु की पुत्री थी।
(क) ललिता अरु चंद्रावली सखिन मध्य सुकुमारि - ११०२।
(ख) तारा, कमला बिमला चंद्रा चंद्रावलि सुकुमारि - १५८०।
चंद्रमा का प्रकाश, चाँदनी।
मोर की पूँछ का अर्द्धचंद्राकार चिन्ह।
सोभित सुमन मयूर चंद्रिका नील नलिन तनु स्याम।
रानियों का एक शिरोभूषण, चंद्रकला।
चंपा जिसका फूल हलका पीले रंग का होता है। सुंदर नारियों के रंग की उपमा इससे दी जाती है।
(क) चंपक - बरन, चरन कमलनि, दाड़िम दसन लरी - ९ - ६३।
(ख) चंपक जाइ गुलाब बकुल फूले तरु प्रति बूझति कहुँ देखे नँदनंदन - १८१०।
(क) रंगभरी सिर सुरंग पाग लटक रही बाम भाग चंपकली कुटिल अलक बीच - बीच रखी री - २३६२।
(ख) चंपकली सी नासिका रंग स्यामहिं लीन्हे - पृ.३२९।
गले में पहनने का एक आभूषण।
एक पौधा जिसमें हल्के पीले रंग के फूल लगते हैं, जिन पर, प्रसिद्धि है कि भौरे नहीं बैठते।
अंगदेश के राजा कर्ण की राजधानी।
सुमना, बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना भाना भाउ - १५८०।
गले का एक गहना जिसमें चंपे की कली की तरह के दाने होते हैं।
घर बैठेहि दसन अधरन धरि चँपै स्वाँस भरैं।
सुरागाय की पूँछ के बालों का गुच्छा जो काठ, सोने या चाँदी की डाँड़ी में लगाकर राजा या देवी-देवताओं पर डुलाया जाता है।
बैठति कर - पीठ ढीठ, अधर - छत्रछाँहि। राजति अति सँवर चिकुर, सरद सभा माँहि - ६५३।
घोड़े या हाथी के सिर पर लगाने की कलगी।
वह सेवक जो चँवर डुलाता हो, चँवरधारी सेवक।
लकड़ी की डाँडी जिसमें घोड़े की पूँछ के बाले लगाकर चँवर बनाते हैं।
किसी देवी-देवता, महात्मा, साधु आदि का स्थान
(क) दै मैया भौंरा चक डोरीं - ६७९।
(ख) ब्रज लरिकन सँग खेलत, हाथ लिए चक डोरि - ६७०।
किसी बात का सिलसिला या क्रम।
चउपार, चउपारि चउपाल, चउपालि
चउपार, चउपारि चउपाल, चउपालि
चकपकाया हुआ, भौचक्की, चकित।
मादा चकवा कविप्रसिद्धि के अनुसार जो अपने नर से रात्रि में बिछुड़ जाती है।
चकई री, चलि चरन - सरोवर, जहाँ न प्रेम - बियोग - १ - ३३७।
घिरनी के आकार का छोटा खिलौना जिसे डोरी के सहारे लड़के नचाते हैं।
भौंरा चकई लाल पाट को लेडुआ माँग खिलौना।
पानी, खून आदि का छन छन कर ऊपर आना।
[फा. गुजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
[फा. गुजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
[फा. गुजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
उपस्थित या पेश किया जाना।
[फा. गुजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
[फ़ा. गुजरान+हिं. ना (प्रत्य.)]
[फ़ा. गुजरान+हिं. ना (प्रत्य.)]
अब कंथा एकै अति गुदरी क्यों उपजी मति मन्द - ३२३१।
गुल खिलना :- (१) आनंददायी घटना होना।
(२) उपद्रव होना।
गुल कतरना :- (१) कागज-कपड़े के बेल-बूटे बनाना।
(२) अद्भुत काम करना।
(३) गालों में हँसते समय पड़नेवाला गड्ढा।
(४) शरीर पर गरम धातु से डाला गया दाग या छाप
(५) दीपक की बत्ती का जला हुआ भाग।
(६) चिलम की तंबाकू का जला हुआ अंश।
(७) किसी चीज पर भिन्न रंग का दाग या चिन्ह।
(८) आँख का डेला।
(९) अंगारा।
गुल बँधना :- (१) कोयलों को खूब दहकना।
(२) कुछ धन प्राप्त होना।
अत्यधिक प्रकाश के कारण आँखों की झपक या तिलमिलाहट।
अरुझि परयो मेरो मन तब तें, कर झटकत चकडोरि हलत - ६७१।
(ख) दै मैया भंवरा चकडोरी।
(ग) हाथ लिए भौंरा चकडोरी।
चकई नामक खिलौना, चक्कर खानेवाली वस्तु, चक्कर, फेरी।
उत ते वै पठवत इतते नहिं मानत हौं तौं दुहुनि बिच चकडोरी कीनी - २२३८।
कपड़े, चमड़े अदि का टुकड़ा, चकत्ता, थिगली।
कड़ी चमक या। अधिक प्रकाश के सामने आँखों की झपक।
आँख में चमक या चकचौंध उत्पन्न करती है।
चमकि चमकि चपला चकचौंधति स्याम कहत मन धीर।
अधिक प्रकाश में आँख झपकना, चकाचौंध होना।
आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करना।
चमक से आँख तिलमिला गयी, प्रकाश के सामने न ठहर सकी।
कोउ चक्रित भई दसन - चमक पर चकचौंधी अकुलानी - ६४४।
आश्चर्य से ताकना, भौचक्का होना।
काश्मीरी ब्राह्मणों का एक भेद।
एक पत्थर जिस पर चोट करने से जल्दी आग निकलती है।
बादल में चकती लगाना :- असंभव बात करने को तैयार होना, बहुत बढ़ी-चढ़ी बातें करना।
शरीर पर लाल-नीले उभरे हुए दाग।
चकत्ता भरना (मारना) :- काटना।
तातारवंशी चगताई के वंशज मुगल बादशाह।
दूसरे की जमीन पर कुँआ बनवाने, उसे काम में लाने और उसका लगान देनेवाला।
[हिं. चक + फ़ा.दार (प्रत्य.)]
असमंजस. ऐसी स्थिति जब उचित-अनुचित न सूझे
सिर का घूमना या चक्कर खाना।
मिट्टी की पीड़ी जो ऐसे पौधे में लगी रहती है।
पत्थर या लकड़ी का रोटी बेलने का गोल पाटा।
पौधे को एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान पर लगाना।
चंदन आदि घिसने का छोटा चकला।
चकित करना, आश्चर्य में डालना।
चाकरी या नौकरी करनेवाला, सेवक
[फ़ा. चाकरी + हा (प्रत्य.)]
सौ जोजन विस्तार कनकपुरी, चकरीजोजन बीस - ९ - ७५।
लड़कों का चकई नामक खिलौना।
भ्रमित, घूमनेवाला, अस्थिर, चंचल।
सु तौ ब्याधि हमेकौ लै आए देखी - सुनी न करी। यह तौ सूर तिन्हैं ले सौपौ जिनके मन चकरी - ३३६०।
तैसेइ हरि तैसेइ सब बालक कर भौंरा चकरीन की जोरी।
[हिं. चकरी + न (प्रत्य.)]
पौधे को उखाड़ने और दूसरे स्थान में लगाने की क्रिया।
एक पक्षी जिसके संबंध में प्रसिद्ध है कि रात में यह अपनी मादा से अलग रहता है।
शरीर पर तलवार आदि के प्रहार का शब्द।
सार्वभौम राजा, समुद्रात पृथ्वी का राजा।
सूरदास - प्रभु - रूप चकित भए पंथ चलत नर बाम - ९ - ४४।
अजित रूप ह्वै शैल घरो हरि जलनिधि मथिबे काज। सुर अरु असुर चकित भए देखे किये भक्त के काज -
विस्मित, चकित, चकपकाया हुआ।
अब अति चकितवंत मन मेरो। हौं आयौ निर्गुन उपदेसन भयौ सगुन कौ चेरौ - ३४३१।
अंबू पंडन शब्द सुनत ही चित चकृत उठि धावत - सा, उ, ३३।
कौसिल्या सुनि परम दीन ह्वै, नैन नीर ढरकाए। बिह्वल तन - मन, चकृत भई सो यह प्रतच्छ सुपनाए - ९ - ३१।
एक तीतर जिसके काले काले रँग पर सफेद चित्तियाँ होती हैं। चोंच और आँखें इसकी लाल होती हैं। भारतीय कवियों में यह चंद्रमा का बड़ा प्रेमी प्रसिद्ध है और उन्होंने इसके प्रेम का बराबर उल्लेख किया है।
एक तरह की कमान जिससे मिट्टी की गोलियाँ चलायी जाती हैं।
[हिं. गुलेल+ची (प्रत्य.)]
वह स्थान जहाँ गुड़ बनाया जाता है।
[सं. गुल = गुड़ हिं. औरा (प्रत्य.)]
एक जाति ह्वै रहे वृन्दावन गुल्मलता कर बास - सारा, ५७९।
बहुत चमक या प्रकाश से आँखों की झपक या तिलमिलाहट।
चमकि गए बीर सब चकाचौंधी लगी चितै डरपे असुर घटा घोटा - २५९१।
[सं. चक=चमकना +चौ = चारो ओर + अंध]
अचंभे से ठिठकना, चकराना, हैरान होना, चकपकाना।
सूर्य (जिसके प्रकाश में चकवा चकवी साथ रहते हैं)।
रात (जो चकवा-चकवी को अलग कर देती है)।
विष्णु के अयुधों के चिन्ह जो वैष्णव बाहु आदि पर गुदाते हैं।
मूड़े मूड़ कंठ बनमाला मुद्रा चक्र दिये। सब कोउ कहते गुलाम स्याम कौ सुनत सिरात हिए।
चक्कर काटना :- मँडराना, बार बार आनाजाना।
चक्कर खाना :- (१) टेढ़े-मेढ़े या घुमावदार मार्ग से जाना।
(२) धोखा खाना।
(३) भटकना, मारे मारे फिरना।
चक्कर पड़ना :- ज्यादा घुमाव या फेर पड़ना।
चक्कर आना :- हैरान होना, दंग रह जाना।
चक्कर में डालना :- (१) हैरान करना।
(२) कठिन स्थिति में डालना।
चक्कर में पड़ना :- (१) हैरान होना।
(२) दुबिधा में पड़ना।
चक्कर लगाना :- (१) मँडराना।
(२) घूमना-फिरना।
घुमाव, पेंच, जटिलता, धोखा, भुलावा।
चक्कर में आना (पड़ना) :- धोखा खाना।
[सं. चक्रवर्ती, प्रा.चक्क वत्तीं]
आटा-दाल आदि पीसने का यंत्र, जाँता।
तुव मुख दरस आस के प्यासे हरि के नयन चकोरै - २२७५।
चमक या प्रकाश की अधिकता से आँख की झपक।
चक्की की मानी :- (१) चक्की के निचले पाट की वह खुँटी जिस पर ऊपरी पाट घूमती है।
(२) ध्रुव तारा।
चक्की छूना :- (१) चक्की चलाना शुरू करना।
(२) अपनी कथा छेड़ना।
चक्की पीसना :- (१) चक्की चलाना।
(२) कड़ा परिश्रम करना।
पैर के घुटने की गोल हड्डी।
थकित होत रथ चक्र हीन ज्यौं - १ - २०१।
दक्षिण भारत का एक तीर्थं।
विष्णु भगवान का विशेष अस्त्र।
ग्राह गहे गजपति मुकरायौ, हाथ चक्र लै धायौ - १ - १०।
चक्र गिरना (पड़ना) :- विपत्ति आना।
अति विपरीत तृनावर्त आयौ। बात - चक्र मिस ब्रज ऊपर परि नंद - पौरि कैं भीतर धायौ - १० - ७७।
चक्रपाणि, चक्रपाणी, चक्रपानि, चक्रपानी
रबि - छबि कैंधौं निहारि, पंकज बिगसाने। किधौं चक्रवाक निरखि, पतिहीं रति मानें - ६४२।
वेग से चक्कर खाती हुई हवा, बवंडर, वातचक्र।
तृनावर्त बिपरीत महाखल सो नृप राय पठायौ। चक्रवात ह्वै सकल घोष मैं रज धुंधर ह्वै धायौ–सारा. ४२८।
(क) नंदहिं कहति जसोदा रानी। माटी कैं मिस मुख दिखायौ, तिहुँ लोक रजधानी। नदी सुमेर देखि चक्रित भई, यकी अकथ कहानी १० - २५६।
(क) गोपाल दुरै हैं माखन खात।…..। उठि अवलोकि ओट ठाढ़े ह्वै, जिहिं बिधि हैं लखि लेत। चक्रित नैन चहूँ दिसि चितवत, और सखनि कौ देत - १० - २८३।
(ख) तरु दोउ धरनि गिरे भहराइ। जर सहित अरराइ कै, आघात सब्द सुनाई। भए चक्रित लोग ब्रज के सकुचि रहे डराइ - ३८७।
चकित, विस्मित, भौचक्का, भ्रांत।
(क) सुनत नंद जसुमति चक्रित चित, चक्रित गोकुल के नर - नारि - ४३०।
(ख) देखि बदन चक्रित भई सौंतुष की सपनैं ४३९।
चक्र आदि का। चिह्न जो वैष्णव शरीर पर गुदाते हैं।
जिसके चक्र आदि का चिह्न शरीर पर गुदा या अंकित हो।
वैष्णवों का एक वर्ग जो विष्णु के चक्र आदि आयुधों के चिह्न शरीर पर गुदाता है।
किसी चीज को छोटा नुकीला टुकड़ा।
लकड़ी का छोटा टुकड़ा जिसे डंडे से मारने का एक खेल होता है।
रस या स्वाद लेनेवाला, रसिक।
कनक कलस रस मोहिं चखावहु - १०५०।
चखाऊँगा, खिलाऊँगा, स्वाद दिलाऊँगा।
यह हित मनै कहत सूरज प्रभु, इहिं कृत कौ फज तुरत चखैहौं - ७ - ५।
काजल की लंबी रेखा जो बच्चों को नजर से बचाने के लिए उनके माथे पर लगाई जाती है।
(क) लट लटकनि सिर चारु चखौड़ा, सुठि सोभा सिसु भाल - १० - ११४।
(ख) भाल तिलक पख स्याम चखौड़ा जननी लेति बलाइ - १० - १३३।
(ग) चारु चखौड़ा पर कुंचित कच, छबि मुक्ता ताहू मैं - १० - १४७।
(घ) अंजन दोउ दृग भरि दीन्हौ। भ्रव चारु चखौड़ा कीन्हौ - १० - १८३।
साँप जो आँख से सुनता भी है।
चक्षुश्रवा डर हर ग्रसी ज्यौं छिन द्वितिया बपु रेख - २७५१।
जो (औषध आदि) नेत्रों को हितकर हो।
जो नेत्रों को प्रिय लगे, सुंदर।
लटकति बेसरि जननि की, इकटक चख लावै - १० - ७२।
अधिक प्रकाश के कारण आँखों की झपक या तिलमिलाहट।
चटपटे या तीक्ष्ण स्वाद का।
छपे कपड़ों को धोने की रीति।
‘चट' ध्वनि करके टूटता या फूटता है, तड़कता है।
दसहूँ दिसा दुसह दवामिनि, उपजी है इहिं काल। पटकत बाँस, काँस कुस चटकत, लटकत ताल तमाल - ६१५।
[हिं. चटक + फ़ा. दार (प्रत्य.)]
किसी कड़ी चीज के टूटने का शब्द।
उँगली आदि चटकाने का शब्द।
चटकर जाना :- (१) झटपट खा लेना।
(२) दूसरे की चीज हड़प लेना या हजम कर जाना।
मुकुट लटकि भ्रकुटी मटक देखौ कुंडल की चटक सों अटकि परी दृगनि लपट - ३०३९।
चटक-मटक-बनाव सिंगार, चमकदमक।
चटकीला, चमकीला, मनोहर, आकर्षक।
(क) नटवर बेष बनाये चटक सो ठाढो रहे, जमुना के तीर नित नव मृग निकट बोलावै - ८४०।
(ख) ऐसो माई एक कोद को हेत। जैसे बसन कुसुंभ रँग मिलिकै नेकु चटक पुनि स्वेत - ३३४६।
दाँत से दबा-दबाकर या खींच खींचकर रस चूसना।
सूरदास प्रभु ऊख छाँड़ि के चतुर चकोरत आग - ३०अ९५।
आपु गयौ तहाँ जहँ प्रभु परे पालनैं, कर गहे चरन अँगुठा चचोरैं - १० - ६२।
तामैं सक्ति अपनी धरी। चच्छावादिक इंद्री बिस्तरी - ३ - १३।
सो अंजन कर ले सुत - चच्छुहिं आँजति जसुमति माइ - ४८७।
‘चट' शब्द करके टुडनी या तडकना
(कोयले आदि का) चटचट करना।
जुग जुग यहै बिरद चलि आयो टेरि कहत हौ याते। मरियत लाज पाँच पतितन में होब कहा चटका ते।
अटपटात अलसात पलक पट मूँदत कबहूँ करत उघारे। मनहुँ मुदित मरकत मनि आँगन खेलत खंजरीट चटकारे - २१३२।
स्वाद या रस लेते हुए जीभ चटकाने का शब्द।
चटकारे का :- चरपरे या मजेदार स्वाद का।
चटकारे भरना :- स्वाद लेकर चाटना।
बिगड़कर, झगड़कर, अनबन करके।
एक ही संग हम तुम सदा रहति हीं आजु ही चटकि तू भई न्यारी - २२६९।
चटकीला पट लपटानो कटि बंसीवट जमुना के तट नागर नट ८३९।
(२) चमकदार।
(३) चटपटे स्वाद का।
[हिं. चटक + ईला (प्रत्य.)]
उँगलियाँ दबाकर चटचट शब्द करना।
किसी वस्तु से चटचट शब्द निकालना।
जूतियाँ चटकाना :- मारे-मारे फिरना।
उतावली, शीघ्रता, हड़बड़ी।
(क) देखे बिना चटपटी लागति कछू मूड़ पड़ि पर ज्यौं।
(ख) नैनन चटपटी मेरे तब ते लगी रहति कहौ प्रान प्यारे निर्धन कौ धन - १८१०।
बच्चों की पाठशाला, शिक्षालय।
(क) तिनकै सँग चटसार पठायौ। राम - नाम सौं तिन चित लायौ - ७.२।
(ख) अब समझीं हम बात तुम्हारी पढे एक चटसार - १४८३।
(ग) चातक मोर चकोर् बदत पिक मनहु मदन चटसार पढ़ावत - १०उ. - ५।
[सं. चेतक या हिं. चट्ट=चेला+सार, साल या शाला]
भँवर कुरंग काग अरु। कोकिल कपटिन की चटसार - २६८७।
[सं. चेतक या हिं. चट्ट=चेला+सार, साल या शाला]
हरि कौं टेरत फिरति गुवारि - ४६१।
(क) सब आनंद - मगन गुवाल, काहूँ बदत नहीं - १० - २४।
(ख) बिहँसत हरि - संग चले गुवाला - ४९९ |
बिनु दीन्हैं ही देत सूर - प्रभु ऐसे हैं। जदुनाथ गुसाई' - १ - ३।
होहु बिदा घर जाहु गुसाई माने रहियो नात - २६५७।
[हिं. चटकीला + पन (प्रत्य.)]
[हिं. चटकीला + पन (प्रत्य.)]
चटचटाकर (टूटना, फूटना) या जलना।
झपटि झपटत लपट, फूल - फल चटचटकि, फटत लटलट द्रुम द्रुमनवारौ - ५९६।
चटचट ध्वनि करके (टूटता या फूटता)।
सरन - सरन अब मरत हौं, मैं नहिं जान्यौ तोहिं। चटचटात अँग फटत हैं, राखु राखु प्रभु मोहिं - ५८९।
चटचट शब्द करके टूटना या फूटना।
लकड़ी-कोयले का चटचट करके जलना।
धनिया-पुदीना आदि की पिसी हुई चरपरी चीज।
चटनी करना (बनाना) :- चूर चूर करना।
चटपट होना :- चटपट मर जाना।
कर सौं हाँकि सुतहिं दुलरावति, चटपटाइ बैठे अतुराने - १० - १९७।
गउ चटाइ मम त्वचा उपारी - ६ - ५।
सींक, ताड़ के पत्तों आदि से बननेवाला बिछावन, साथरी।
चटाके का :- बहुत तेज़ या कड़ा।
चटाने खिलाने का काम करना।
बच्चे को पहली बार अन्न चटाने का संस्कार, अन्नप्राशन।
दधिहिं बिलोइ. सदमाखन राख्यौ, मिश्री सानि चटावै नँदलाल - १० - ८४।
अजामील, गनिका व्याध, नृग, ये सब मेरे। चटिया। उनहूँ जाइ सौंह दे पूछौ, मैं करि पठयौ सटिया - १ - १९२।
जिसे देखकर सुख मिले, प्रियदर्शन। सुंदर |
चटुल चारु रतिनाथ के हरि होरी है। - २४५५ (८)।
अच्छी चीजें खाने का लालची, स्वादू।
[हिं. चाट + ओरा (प्रत्य.)]
[हिं. चाट + ओरा (प्रत्य.)]
अच्छी चीजें खाने का लोभ या व्यसन।
[हिं. चटोरा + पन (प्रत्य.)]
चढ़ता है, लगाया या पोता जाता है।
काठ के छोटे-छोटे खिलौनों का समूह।
[हिं. चट्टू = चाटने का खिलौना+ बट्टा = गोला]
बाजीगर के छोटे-बड़े गोले।
[हिं. चट्टू = चाटने का खिलौना+ बट्टा = गोला]
एक ही थैली के चट्टे-बट्टे :- एक ही रुचि, स्वभाव और ढंग के आदमी।
चट्टे-बट्टे लड़ाना :- कुछ कहकर आपस में झगड़ा कराना।
रंग चढ़त :- रंग खिलता (है)।
उ. - (क) सूरदास कारी कमरि पै, चढ़त न दूजौ रंग - १ - ३३२।
(ख) जो पै चढ़त रंग तौ ऊपर त्यौं पै होब स्यामता सेतु - ३३९०।
परनि परेवा प्रेम की (रे) चित लै चढत अकास - १ - ३२५।
किसी देवता पर चढ़ाई वस्तु या भेंट।
द्वार की ओर उठाया जाता हुआ।
प्रारंभ होता और बढ़ता हुआ।
देवता पर चढ़ायी हुई वस्तु।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
ऊपर की ओर खिसकना या समिटना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
सितार, धनुष आदि में तार या डोरी चढ़ाकर या कसकर।
कुबुधि - कमान चढ़ाई कोप करि, बुधि - तरकस रितयौ - १ - ६४।
उ. - घसि कै गरल चढ़ाइ उरोजनि लै रुचि सौं पय प्याऊँ - १० - ४९।
(सितार, धनुष आदि में) डोरी कसी या कसकर।
उ. - तुम तौ द्विज, कुल - पूज्य हमारे, हम - तुम कौन लराई १ क्रोधवंत कछु सुन्यौ नहीं, लियौ सायकधनुष चढ़ाई - ९ - २८।
लियो धनुष चढ़ाइ :- धनुष की डोरी कसी
मेरी बलि पर्वतहिं चढ़ाई - १०४१।
ऊँचाई की ओर जानेवाली भूमि।
लड़ने के लिए प्रस्थान, धावा, आक्रमण।
किसी देवी-देवता की पूजा की तैयारी।
देवता या महात्मा को अर्पित करना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
वर्ष, मास आदि का आरंभ होना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
चूल्हे या अँगीठी पर रखा जाना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
रंग चढ़ना :- (१) रंग का खिलना या आना।
(२) किसी प्रकार का प्रभाव पड़ना।
किसी झगड़े को अदालत तक ले जाना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
।
एक वस्तु के ऊपर दूसरी का मढ़ा जाना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
चढ़ (बढ़) कर होना :- अधिक श्रेष्ठ या महत्व का होना।
चढ़ा बढ़ा :- श्रेष्ठ।
चढ़ बनना :- लाभ का अवसर हाथ आना।
चढ़ बजना :- बात बनना, पौ बारह होना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
धूमधाम या साज-बाज के साथ कहीं जाना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
नदी के प्रवाह के विरुद्ध चलना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
(नस. डोरी या तार) कस जाना।
[सं. उच्चुलन, प्रा. उच्चडन, चड्ढन]
नैन चढ़ाए :- क्रोध से भृकुटी ताने हुए।
उ. - नैन चढ़ाए कापर डोलति ब्रज मैं तिनुका तोरि - १० - ३१०।
ऊपर की ओर सिकोड़ना या समेटना।
सितार, धनुष आदि की डोरी कसना या चढ़ाना।
देवता या महात्मा को भेंट देना।
बही आदि में लिखना या टाँकन।
एक वस्तु को दूसरी पर मढ़ना।
लेप किया, लगाया, मला, पोता।
चोवा चंदन अगर कुमकुमा परिमल अंग चढ़ायौ - १०उ. ६५।
किसी देवी देवता को पूजा या भेंट चढ़ाने की क्रिया या सामग्री, चढ़ावा, कढ़ाई।
सूर नंद सों कहत जसोदा दिन आये अब करहु चढ़ाई।
बार बार चढ़ने-उतरने की क्रिया।
तन मन जारौं, भस्म चढ़ाऊँ बिरहिन गुरु उपदेस - २७५४।
आगे बढ़ जाने का भाव या प्रयत्न, लागडाँट।
मढ़वाए, आवरणरूप में लगाए।
ऊँचे मंदिर कौन काम के कनक - कलस जो चढ़ाए। भक्त भवन मैं हौं जू बसति हौं जद्यपि तृन करि छाए - १ - २४३।
कंचन को रथ आगे कीन्हों। हरिहिं चढ़ाए वर कै - २५२९।
भुजा बिसाल स्याम सुंदर की चंदन खौरि चढ़ाए री - १३४३।
कमल - पत्र मालूर चढ़ावें - ७९९।
पुस्तक, बही, कागज आदि पर लिखे।
अब तुम नाम गहौ मन नागर।…..। मारि न सके, बिघन नहिं ग्रासै, जम न चढ़ावै कागर - १ - ९१।
कहै भामिनि कंत सौं मोहि कंध चढ़ाहु - १८८९।
बिप्रनि पै चढ़िकै जौ आवहु। तौ तुम मेरौ। दरसन पावहु - ६ - ७।
चढ़ि बाजी :- बात बन गयी, पौ बारह हो गयी।
उ. - अधर रस मुरली लूट करावति। आपुन बार बार लै अँचवति जहाँ तहाँ ढरकावति। आजु यहाँ चढ़िबाजी वाकी जोइ कोइ करै बिराजै।
धावा या आक्रमण करके, चढ़ाई करके।
बार सत्रह, जरासंध मथुरा चढ़ि आयो - १० उ.३।
चढ़ाव उतार-क्रमशः मोटाई कम होना।
विवाह में दुलहिन को चढ़ाये गये गहने आदि, चढ़ावा।
विवाह में दुलहिन को दिये गये गहने आदि पहनने की रीति।
वह दिशा जिधर से नदी बहकर आ रही ही।
गैवर भेति चढ़ावत रासभ प्रभुता मेटि करत हिनती - १२२८।
जो पै जोग लिखि पठयौ हमकौ तुमहु न भस्म चढ़ावत - ३२१८।
देवार्पित करना, चढ़ाने की क्रिया |
दस मुख छेदि सुपक नव फल ज्यौं, संकर - उर दससीस चढ़ावन - ९ - १३१।
जरासंध सिसुपाल नृपति ते जीते हैं उठि अर्ध्य चढ़ावहु - १० उ. - २३।
वे गहने जो दुलहिन। को चढ़ाये जाते हैं।
वह सामग्री जो देवी देवता पर चढ़ायी जाती है, पुजापा।
किसी देवी-देवता को अर्पित किया।
अब गोकुल भूतल नहिं राखौं मेरी बलि मोको न चढ़ायौ - ९४२।
ब्याध, गीध, गनिका जिहिं कागर, हौं तिहिं चिठि न चढ़ायौ - १ - १९३।
प्रथम जोबन रस चढ़ायौ अतिहिं भई खुमारि - ११६६।
ऊँचे पर पहुँचाया, ऊपर उठाया।
मूड़ चढायौ :- सर पर चढ़ा लिया है, ढीठ कर दिया है।
उ - (क) बारे ही तैं मूढ़ चढ़ायौ - ३९१।
(ख) तैही उनको मूढ़ चढत्यौ - १६५८।
सीस चढ़ायौ :- माथे से लगाया, प्रणाम किया, बंदना की।
उ. - तब बसुदेव लियौ कर पलना अपने सीस चढायौ - सारा, ३७४।
किसी के ऊपर चढ़ाकर उँचा किया।
ऊखल ऊपर अनि पीठि दै तापर सखा चढ़ायौ - १० - २९२।
सवार कराया, सवारी पर बैठाया।
चले बिमान संग गुरु - पुरजन तापर नृप पौढायौ। भस्म अंत तिल अंजलि दीन्हीं, देव इमान चढ़ायौ - ९.५०
चढ़ाव-उतार, ऊँचा-नीचा स्थान।
बढ़ने का भाव, वृद्धि, बाढ़, बढ़ती।
रंग चढ़ि रह्यौ :- रंग आ चुका है, रंग चढ़कर खिल चुकी है।
उ. - पहले ही चढ़ि रह्यौ स्याम रंग छूटत नहिं देख्यो धोई - ३१४५।
(नदी आदि) बाढ़ पर आयी, बढ़ गयी।
तुम्हरे बिरह ब्रजनाथ राधिका नैनन नदी बढ़ी। लीने जाति निमेष कूल दोउ एते मान चढ़ी - ३४५४।
ऊपर गयी हुई, ऊँचे स्थान पर पहुँची हुई।
नंदनंदन को रूप निहारत अहनिसि अटा | चढ़ी - २७९४।
(सवारी पर) बैठकर, सवार होकर।
(क) आनँदमगन सब अमर - गगन छाए, पुहुप बिमान चढ़े पहर पहर के - १० - ३०।
(ख) कहुँ गजराज बाजि सृंगारे तापर चढ़े जु आप - सारा, ६७७।
आक्रमण या धावा किया, चढ़ाई की।
सब मिलि करहु कछु उपाव। मार मारन चढ़ेउ बिरहिन करहु लीनो चाव - २७१५।
नीचे से ऊपर जाती है, चढ़ती है।
एकनि लै मन्दिर चढ़ै, एकनि बिरचि बिगोवै (हो) - १ - ४४।
लेप होता है, पोता या लगाया जाता है।
रंग चढ़ै :- किसी वस्तु पर रंग आवे या खिले।
उ. - सूरदास स्याम रंग राँचे, फिर न चढ़े
रँग रातै - ३०२४।
(चूल्हे, अँगीठी आदि पर) चढ़ाकर।
एक जेंवन करत त्याग्यौ चढ़े चूल्है दारि - पृ० ३३९ (८४)
जिहि सिर केस कुसुम भरि गूँदै तेहि कैसे भसम चढ़ए - ३१२४।
चतुरंगिणी सेना का प्रधान अधिकारी।
सेना के चार अंग-हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल।
चार अंगों से युक्त सेना।
मनहुँ चढ़त चतु रंग चमू नभ बाढ़ी है खुर खेह - २८२०।
चार अंगों से युक्त (सेना)।
सेना जिसमें चारो अंग हों-हाथी, घोड़े, रथ और पैदल।
[हिं. चढ़ना + ऐत (प्रत्य.)]
[हिं. चढना + ऐया (प्रत्य.)]
भेंट देंगे, (देवता पर) चढ़ावेंगे।
जा दिन राम रावनहिं मारैं, ईसहिं लै दससीस चढ़ेहैं। ता दिन सूर राम पै सीता सरबस बारि बधाई दैहैं - ९ - ८१।
भेंट करूँगा, देवार्पित करुँगा |
दैत्य प्रहारि पाप - फल - प्रेरित, सिरमाला सिव सीस चढ़ैहौं - ९ - १५७।
सूरज दास चढ़ौ प्रभु पाछ्, रेनु पखारन दीजै - ९ - ४१।
ऊपर उठा, ऊँचे स्थान को गया।
रवि चढ़यौ :- सूर्य उदय होकर क्षितिज पर आ गया।
उ. - रवि बहु चढ़ैयौ, रैनि सब निघटी, उचटे सकल किवार - ४०८।
दई न जाति खेवट उतराई, चाहत चढ़ैयौ जहाज - १ - १०८।
(क) गज अहंकार चढ़ायौ दिग बिजयी, लोभ - छत्र - करि सीस १ - १४४।
(ख) इंद्रजित चढ़यौ निज सैन सब साजि कै रावरी सैनहूँ साज कीजै - ९ - १३६।
(जोर-जोर से चिल्ला कर) शिकायत की, उलाहना दिया।
काहू के लरिकहिं हरि मारयौ, भोरहिं आनि तिनहिं गुहरायौ - ३६९।
बार बार हरि सौं गुहरावत मोहिं मँगावत पुनि - पुनि आनि लरै - १६७१।
शिकायत करो, पुकारो, दोहाई दो।
जाइ सबै कंसहिं गुहरावहु। दधि माखन घृत लेत छँड़ाए आजुहिं मोहिं हजूर बोलावहु - १०९४।
हम अब कहा जाइ गुहरावै बसत तुम्हारे गाउँ - १०९२।
(क) अयुत अधार नहीं कछु समझत भ्रम गहि गुहा रहै - ३३५६।
(ख) जनु सु अहेरो हति यादव पति गुहा। पींजरी तोरी - १० उ.५२।
(क) मोहन काहैं न उगिलै माटी।….| महतारी सौं मानत नाहीं कपट - चतुरई ठाटी - १० - २५४।
(ख) चोर अधिक चतुरई सीखी जाइ ने कथा कही - १० - २९१।
जैसे हरि तैसे तुम सेवक कपट चतुरई साने हो - ३००५।
चतुरई छोलत हौ :- चालाकी दिखाते हो, धोखा देते हो।
उ. - जाहु चले गुन - प्रगट सूरप्रभु कहा चतुरई छोलत हौ।
चतुरई तौलत हौ :- चालाकी करते हो।
उ. - बहुनावकी आजु मैं जानी कहा चतुरई तौलत हौ।
लियौ तँबोल माथ धरि हनुमत, कियौं चतुरगुन गात - ९ - ७४।
चतुर होने का भाव, चतुराई।
स्यामा, कामा चतुरानवला प्रमुदा सुमदानारि - १५८०।
[सं. चतुर + हिं. आई (प्रत्य.)]
(क) मन तोस किती कही समुइ। नंद नँदन के चरन - कमल भजि, तजि पाखँड चतुराइ - १ - ३१७।
(ख) स्याम फाँसि मन करण्यो हमरो अब समुझी चतुराई - १३१३।
[सं. चतुर + हिं. आई (प्रत्य.)]
बृद्ध बयस पूरे पुन्यनि तैं तैं बहुतै निधि पाई। ताहू के खैबे - पीबे कौ कहा करति चतुराई - १० - ३२५।
[सं. चतुर + हिं. आई (प्रत्य.)]
माया कला ईस चतुरानन चतुब्यूह धर रूप - सारा, ३५५।
चतुराई, होशियारी।
धूर्तता।
[हिं. चतुरा+पन (प्रत्य.)]
चतुराई, होशियारी।
धूर्तता।
[हिं. चतुरा+पन (प्रत्य.)]
गयौ हरषि भुज ललिता धाय। गयी स्याम की सब चतुराय - २४५४ (८)।
ग्याननमनि, विद्यामनि, गुनमनि, चतुरनमनि, चतुराई - २१७०।
बहुरौ धरै हृदय महँ ध्यान। रूप चतुरभुज स्याम सुजान - ३ - १३।
बरसात के चार महीने, चौमासा।
चतुरमास सूरजे प्रभु तिहिं ठौर बितायौ - ९.७१।
[सं. चातुर्मास, हिं. चतुर्मास]
चतुर्दशी, चतुर्दसि, चतुर्दसी
[सं. चतुर्भुज + ई (प्रत्य.)]
[सं. चतुर्भुज + ई (प्रत्य.)]
मृत्यु के चौथे दिन की रस्म, चौथा।
वर्षा के चार महीने-आषाढ़, सावन, भादों और कुआर, चौमासा।
चारौं बेद चतुर्माख ब्रह्मा जस गावत हैं ताको - १ - ११३।
उतना समय (वर्ष) जिसमें एक बार चारो युग बीत जायँ।
अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
किसी धातु का लंबा चौड़ा पत्तर।
नदी आदि के बहते हुए पानी का वह अंश, जिसका ऊपरी भाग चादर के समान समतल हो जाता है, जिसमें लहरें नहीं उठतीं और जिसमें फँस जानेवाली नाव या प्राणी कठिनता से बचता है।
बेसन दारि चनक करि बान्यो - १००६।
मूँग, मसूर, उरद, चनदारी। कनक - फटक धरि फटकि पछारी - ३९६।
घिरा हुआ कोई चौकोर स्थान।
चारो वेद जाननेवाला व्यक्ति।
चार मनुष्यों या पदार्थों का वर्ग अथवा समूह जैसे राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न या कृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध।
(क) प्रगट भए दसरथ गृह पूरन चतुर्व्यूह अवतार - सारा, १६०।
(ख) माया कला ईस चतुरानन चतुर्व्यूह धरि रूप - सारा.३५५।
वह शब्द जो खातेपीते समय कुत्ते के मुँह से निकलता है।
(क) सूरदास चरननि के बलि बलि कौन गुसा ते कृपा बिसारी।
(ख) रति माँगत' पै मान कियौ सखि सो हरि गुसा गही - २८९९।
(क) मेरौ मन मतिहीन गुसाई'। सब सुखनिधि पद - कमल छाँङि, स्रम करत स्वान की नाई' - १० - १०३।
(ख) तुम्हरीं कृपा कृपाल गुसाई किहिं किहिं स्रम न गँवायौ - १ - १९०।
(क) खेलत मैं को काकौ गुसैयाँ - १० - २४५।
(ख) नहिं अधीन तेरे बाबा के नहिं तुम हमरे नाथगुसैयाँ - ७३५।
(ग) यह सुनिकै बलदेव गुसाई हल मूसल लियौ हाथ - सारा - ८३३।
गुस्सा उतरना :- क्रोध शांत होना।
(किसी पर) गुस्सा उतारना (निकालना) :- (१) क्रोध का फल चखाना।
(२) एक के क्रोध का फल दूसरे को चखाना।
गुस्सा थूक देना :- क्षमा करना।
नाक पर गुस्सा होना (रहना) :- बहुत जल्दी गुस्सा हो जाना।
गुस्सा पीना (मारना) :- क्रोध प्रगट न करना।
गुस्से से लाल होना :- क्रोध से तमतमा जाना।
बहुत जल्दी क्रोधित हो जानेवाला।
[हिं. गुस्सा + ऐल (प्रत्य.)]
साग चना सँग सब चौराई - २३११।
चने का मारा मरना :- इतना दुबला कि जरा सी चोट से मर जाय।
नाकों चने चबवाना :- बहुत हैरान करना |
लोहे का चना :- बहुत कठिन काम।
लोहे के चने चबाना :- कठिन काम करना।
गीली या चिपचिपी वस्तु चुपड़ना या लगाना।
मिलाना, सानना, ओतप्रोत करना।
फुर्ती से, तेजी से, जोर से।
मवरजु एक चकृत चपरि कर भरि बंदूर्ष षग डारि है - सा. उ. ४।
चंचल, अस्थिर, तेज, गतिवान।
(क) रथ तै उतरि अवनि आतुर ह्वै, चले चरन अति धाए। मनु संचित भू - भार उतारन चपले भए अकुताए - १ - २७३।
(ख) चपल समीर भयो तेहि रजनी भीजे चारों यामा - १० उ. ६६।
अवसर पर न चूकनेवाला, बहुत चालक।
कहकर मुकर जानेवाला, झूठा।
चपरास पहननेवाला अरदली या नौकर।
[फ़ा. चप=वायाँ+रास्ता=दाहनः]
किसी गीली या चिपचिपी वस्तु को चुपड़कर।
ऊधौ जाके माथे - भागु। अबलन जोग सिखावन आए चेरिहिं चपरि सोहाग - ३०९५
मिलाकर, सानकर, ओतप्रोत करके।
बिषय चिंता दोऊ हैं माया। दोउ चपरि ज्यों तरुवर छाया - ११ - ६।
(क) मंजुल तारनि की चपेलाई, चित चतुराई करषै री - १० - १३७।
(ख) कुंडल किरनि निकट भूलोचन आरति मीन दृग सम चपलाई - १३३८।
(ग) खंजन मीन मृगज चपलाई नहिं पटतर एक सैन - १३४९।
मारते-पीटते हुए पीछे खदेड़ना।
करनि तिह तुम्हरी घरी, कैसे चपै सुगाल - १० उ. - ८।
[सं. चतुष्पाद, प्रा. चउप्पाव]
[सं. चतुष्पाद, प्रा. चउप्पाव]
चार अंगुल या एक बालिस्त जगह।
[सं. चतुष्पाद, प्रा. चउप्पाव]
[सं. चतुष्पाद, प्रा. चउप्पाव]
धीरे धीरे पैर दाबने की क्रिया।
बृच्छ दोउ धर परे देखे, महरि कीन्ह पुकार। अबहिं आँगन छाँड़ि आई, चप्पौ तरु की डार - ३८७।
चंचल, चपल, चबाइ, चौपटा, लिए मोह की फाँसी - १ - ८६।
दासी तृष्ना भ्रमत टहल - हित, लहत न छिन बिश्राम। अनाचार - सेवक सौं मिलिकै, करत चबाइनि काम - १ - १४१।
इधर की उधर लगानेबाला, चुगलखोर।
(क) माधौ जू, मोतैं और न पापी। घातक, कुटिल, चबाई, केपटी, महाकुर, संतापी - १ - १४०।
(ख) सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई जनमत ही कौ धूर्त - १० - २१५।
(ग) सूरदास बल बड़ौ चबाई सैसेहिं मिले सखाऊ - ४८१।
चारो ओर फैलनेवाली चर्चा, प्रवाद।
नैनन तें यह भई बड़ाई। घर घर यहै चबाउ चलावत हम सौं भेंट न माई।
दाँत चबात :- क्रोध प्रदर्शित करते हुए।
उ. - दाँत चबात चले जमपुर तै धाम हमारे कौं - १ - १५१।
चबा चबाकर बात करना :- स्वर बनाकर बोलना
चबे को चबाना :- किया हुआ काम फिर से करना।
भुना हुआ सूखा अनाज, भूँजा, चर्वण।
एक दूध, फल, एक झगरि चबेना लेत, निज निज कामरी के आसननि कीने - ४६७।
बरातियों को दिया जानेवाला जलपान।
दूसरे का दिया हुआ गोला, डुब्बी, डुबकी।
केवट जिसने श्रीराम को गंगा पार पहुँचाया था।
(चोटी आदि) गू्ँधकर, गूँधने पर।
मैया, कबहिं बढ़ेगी चोटी...। काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन - सी भुई' लोटी - १०.१७५।
एक में पिरोने (को), गूँथने या गूँधने (को)।
कहि हैं न चरनन देन जावक गुहन बेनी फूल - २७५६।
खाते-पीते समय मुँह का शब्द।
कुत्ते-बिल्ली का पानी पीने का शब्द।
रोटी, बाटी, पोरी, झोरी। इक कोरी इक घीव चभोरी - ३९६।
भीगे हुए, तर, रस में डूबे हुए।
(क) मीठे अति कोमल हैं नीके। ताते, तुरत चभोरे घी के - ३९६।
(ख) घेवर अति घिरत चभोरे। लै खाँड उपर तर बोरे - १० - १८३।
जल्दी चिढ़ने या भड़कनेवाली।
चमकाती है, कांति लाती है।
तनक कटि पर कनक - कर - धनि, छीन छबि चमेकाति - १० - १८४।
अधर बिंब दसननि की सोभा दुति दामिनि चमकारी।
जगमगाना, प्रकाशपूर्ण होना।
प्रसिद्ध होना, उन्नति करना।
मटकना; उँगलियाँ मटकाकर भाव बताना |
चमक देना (मारना) :- चमकना।
चमक लाना :- चमकाना।
रिषि - दृग चमकत देखत भई - ९ - ३।
हँसति दसननि चमकताई बज्र कन रुचि पाँति - १३५५।
मिटि गई चमक दमक अँग - अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी - १ - ३०५।
चमकीली, प्रकाशयुक्त, अभावाली।
तरपि तरपि चपला चमकावै - १०४९।
चमक कर, जगमगाकर, प्रकाशयुक्त होकर।
तृष्ना - तड़ित चमकि छनहीं छन, अह - निसि यह तन जारौ - १ - २०९।
फुरती से खिसक कर, झटपट भाग कर।
सुखा साथ के चमकि गये सब गयी स्याम कर धाइ। औरनि जानि जान मैं दीन्हौं, तुम कहँ जर पराइ - १० - ३१४।
चमकि गये बोर सेव चकाचौंधी लगी चितै। डरपै असुर घटा घोटा - २५९१।
रुपहले-सुनहले तारों के गोल-चौकोर तारे या सितारे।
[हिं. चमक + ईला (प्रत्य.)]
[हिं. चमक + ईला (प्रत्य.)]
चमकती है, जगमगाती है, आलोकित होती है।
निसि अँधेरी, बीजु चमकै, सघन बरसै मेह - १० - ५।
एक सखा हरि त्रिया रूप करि पठै दियौ तिनं पास।…..। पीलांवर जिनि देहुं स्याम को यह कहि चमक्यौ ग्वाल - २४१६।
एक पक्षी जो दिन में नहीं निकलता, रात में उड़ता है।
[सं. चर्मचटका, पं. चमचिचड़ी, हिं. चमगिदड़ी]
(क) चपली चमचमाति चमकि नभ झहरात राखिले क्यों न ब्रज नंद तात - ९६०
(ख) चपला अति चमचमाति ब्रज जन सब डर डरात टेरत सिसु पिता - मात ब्रज गलबल।
चमकना, प्रकाशित होना, झलकना, दमकना।
पीछा न छोडनेवाली वस्तु या पात्र।
सुरा गाय की पूछ का बना चँवर या चामर।
चारु चक्रमनि खचित मनोहर चंचल चमर पताका - २५६६।
चरखे की गुडियों में लगाने की चकती।
बहुत दुबली-पतली, सूखी-साखी।
विलक्षण काम करनेवाला, करामाती।
एक जाति जो चमड़े का काम बनाती है।
इन बिरहिन मैं कहूँ तू देखी सुमन गुहाए मंग - ३२२३।
रक्षा के लिए की गयी पुकार, दोहाई।
(क) सृंगीरिषि तब कियौ बिचार। प्रजा दोष करैनृपति गुहार - १ - २९०।
(ख) दीन गुहारि सुनौ स्रवननि भरि गर्व बचन सुनि हृदय जरौं - ११०३।
(ग) प्रभु स्रवनन तहँ परी गुहारी - २४५९।
(घ) अब यह कृपा जोग लिखि पठए मनसिज करी गुहारि - ३००२।
लगहु गुहार-दुहाई करो, पुकार लगाओ।
शत्रु - सेन सुधाम फेरथौ सूर लगहु् गुहार - २८३४।
शोर-गुल, हो-हल्ला, कोलाहल, जोर का शब्द।
(क) दौरि परे ब्रज के नर - नारी। नंद द्वार कछु होत गुहारी - ३९१।
(ख) धाए नंद, जसोदा धाई, नित प्रति कहा गुहारि - ६०४।
(क) गुहि गुंजा घसि बन धातु, अंगनि चित्र ठए - १० - २४।
(ख) सूरदास प्रभु की यह लीला, ब्रज - बनिता पहिरै गुहि हार - १० - १७३।
(ग) संभुभूषन बदन बिलसत कंज ते गुहि माल - सा. ९४।
गूँथी, एक में पिरोई, गाँथी।
(क) सुभ स्रवननि तरल तरौन, बेनी सिथिल गुही - १० - २४।
(ख) तब कित लाड़ लड़ाइ लड़इते बेनी कुसुम गुही गाढ़ी - पृ. ३५३ (६५)।
सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुईहौं - १० - १९३।
(क) सत्रह बार फेर फिरि आयौ हरि सब चमू सँहारी - सारा, ५९८।
(ख) सखी री - पावस सैन पलान्यो। ......। दसहु दिसा सों धूम देखियत कंपति है। अति देह। मनहु चलत चतुरंग चमू नभ बाढ़ी है। खुर खेह - २८२०।
सेना जिसमें हाथी, इतने ही रथ, तिगुने सवार और पँचगुने पैदल हों।
एक झाड़ी या लता जिसके फूल सफेद या पीले होते हैं।
माखन - चोर री मैं पायौ।...। बारबार हौं ढूँका लागी मेरी घात न आयौ। नोई नेत की करौं चमोटी घूँघट में डरवायौ ९०६।
[हिं. चाम + औटा (प्रत्य.)]
[हिं. चाम + औटा (प्रत्य.)]
त्रिबिध पवन मन हरष दयन। सदा बहत न बिहरत चयन - २३६७।
चुनी हुई वस्तुओं, बातों या रचनाओं का संग्रह।
गुप्त रूप से कार्य करने को नियुक्त व्यक्ति।
कौड़ी।
दलदल।
जब हरि मुरली अधर धरत। थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं, , जमुना जल न बहत - ६२०।
अस्थिर, एक स्थान पर न रहनेवाला।
पशुओं को पानी पिलाने का पक्का गहरा गढ़ा या छोटा हौज।
इकट्ठा करने का कार्य, संग्रह, संचय।
पशु का चारा काटनेवाला आदमी।
रेशम आदि लपेटने का ढाँचा |
कुएँ से पानी निका लने का रहट।
बुढ़ापे या कमजोरी के कारण बहुत शिथिल शरीर।
कुएँ से पानी निका लने का रहट।
बुढ़ापे या कमजोरी के कारण बहुत शिथिल शरीर।
चरचर शब्द करके जलना, टूटना या फटना।
घाव आदि का दर्द करना या चर्राना।
[हिं. चरचराना+हट (प्रत्य.)]
चरचर करके फटने या टूटने का शब्द।
[हिं. चरचराना+हट (प्रत्य.)]
हरि - जन हरि - चरचा जो करै। दासी - सुत सो हिरदै धरै - ७ - ८।
निंदा या शिकायत करनेवाला।
देह में चंदन, अरगजा आदि सुगंधित पदार्थ लगाकर।
बाजत ताल - मृदंग जंत्र - गति, चरचि अरगजा अंग चढ़ाई - १० - १९।
सूरदास मुनि चरन चरचि करि सुर लोकनि रुचि मान।
लगाया या पोता हुआ, लेप हुआ।
चरचित चांदन नील कलेवर, बरसत बू दन सावन - ८:१३।
चंदन अंग सखिन कै चरच्यौ - ३९६।
कुएँ से पानी खींचने की गराड़ी।
चरण देना :- पैर रखना।
चरण पड़ना :- आगमन होना, कदम जाना।
बड़ों का संग, बड़ों की समीपता।
जहाँ जहाँ तुम देह धरत हौ तहाँ तहाँ जनि चरण (चरन) छुड़ायहु।
बहिरौ सुनै गूँग पुनि बोले - रंक चलै सिर छत्र धराई - १ - १।
वह जल जिसमें किसी महात्मा आदि के चरण धोये गये हों।
दूध, दही, घी, शकर और शहद का घोल जिसमें किसी देवमूर्ति को स्नान कराया गया हो।
अजानायक मगन क्रीड़त, चरत बारंबार - १ - ३२१।
चरती हैं, (चारा आदि) खाती हैं।
जहाँ जहँ गाइ चरतिं ग्वालनि संग, तहँ तहँ आपुन धायो - ४११।
धूल आदि पर पड़ा पैर का निशान।
चरण के आकार का चिह्न जिसका पूजन होता है।
चरणचिह्न जिसका पूजन होता है।
घाव या जख्म का चर्रना या पीड़ा देना।
घाव या जख्म का चर्र्राना या पीड़ा देना।
चरने का स्थान, चरी, चरागाह।
कमल बदन कुँमिलात सबन के गौवन छाँड़ी चरनी - ३३३०।
(क) जाको चरनोदक सिव सिर धरि तीनि लोक हितकारी - १ - १५।
(ख) चरन धोइ चरनोदक लीन्हौं - १ - २३९।
स्वाद में तीक्ष्ण या तीता।
मीठे चरपर उज्ज्वल कौरा। हौंस होइ तौ ल्याऊँ औरा - ३९६।
बड़ों का संग-साथ या सामीप्य।
जहाँ जहाँ तुम देह धरत हौ तहाँ तहाँ जनि चरन छुड़ायडु।
सूर भज चरनारबिंदनि, मिटै जीवन - मरन - १ - ३०९ |
चीमड़ वस्तु के दबने या मुड़ने पर होनेवाला शब्द।
चरवाहा, चौपायों का रक्षक।
राजनीति जानौ नहीं, गो - सुत चरवारे - २ - २३८।
पशुओं को चरानेवाला, चौपायों का रक्षक।
खाने, पीने आदि की क्रिया।
इन गैयन चर वो छाँड़ों है जो नहिं लाल चरै हैं—३४३६।
गाँजे के पेड़ का गोंद जो मादक होता है।
शरीर का चिकना गाढ़ा पदार्थ जो मांस से बनता है, मेद।
चरबी चढ़ना :- मोटा होना।
चरबी छाना :- (१) मोटा होना।
(२) गर्व से अंधा होना।
(क) गाय चरावन को सो गयौ - ९ - ७१।
(ख) आजु मैं गाय चरावन जैहौं - ४११।
(गाय, भैंस आदि) चराता है।
सौह गोप की गाई चरावै - १० - ३।
(क) व्योम, थर, नद, सैल, कानन इते चरि न अघाइ-१-५६।
(ख) जगत-जननी करी बारी मृगा चरि चरि जाइ-९-६०।
अपनो भेद तुम्हैं। नहिं के हैं। देखहु जाइ चरित तुम वाके जैसे गाल बजैहै - १२६३।
चरननि चित्त निरंतर अनुरत, रसना - चरित - रसाल - १ - १८९।
[हिं. चरस + इया ई, (प्रत्य.)]
[हिं. चरस + इया ई, (प्रत्य.)]
तहँ गैयाँ गनी न जाहिं. तरुनी बैच्छ बढ़ीं। जो चरहिं जमुन कै तीर, दूनै दूध चढ़ीं - १० - २४।
पशुओं के चरने या पानी पीने का स्थान।
पशुओं को चारा खिलाने के लिए मैदान में ले जाना।
माधौ जू, यह मेरी इक गाइ। अब आज हैं आप - प्रागै दई, लै आइयै चराई - १ - ५१।
मैदान में ले जाकर पशुओं को चारा खिलाया।
प्रथम कयौ जो बचन दया रत, तिहिं बस गोकुल गाइ चराई - १६।
गूदेदार, मांस या गूदे से युक्त।
चित्त में चाह या उत्कंठा पैदा करना।
गूँगे को गुड़ :- वह विषय या बात जिसका अनुभव तो हो परंतु वर्णन न किया जा सके।
उ. - (क) अमृत कहा अमित गुन प्रगटै सो हम कहा बतावैं। सूरदास गूँगे के गुर ज्यों बूझति कहा बुझावै १६३६।
(ख) गूँगे गुर की दसा भई ह्वै पूरन स्याम सोहाग सही - १९८२।
गोल बिछिया जो स्त्रियाँ उँगली में पहनती हैं।
दोमुहाँ साँप।
(क) अबिगत - गति कछु कहत न आवै। ज्यौं गूँगै मीठे फल कौ रस अंतरगत हीं भावे - १ - २।
(ख) कहि न जाइ या सुख की महिमा ज्यौं गूँगे गुर खायो - ४ - ३३।
गूँगा व्यक्ति, मूक प्राणी।
गूँगौ गुर खाइ :- ऐसी बात जिसका अनुभव तो हो, परंतु वर्णन न हो सके, जैसे गुड़ के स्वाद का अनुभव करके भी गूँगा उसे कह नहीं पाता।
उ. - ज्यों गूँगौ गुर खाइ अधिक रस, सुख स्वाद न बतावै (हो) - २ - १०।
चर और अचर, जड़ और चेतन, स्थावर और जंगम।
त्रिभुवन - हार सिंगार भगवती, सलिन चराचर जाके ऐन। सूरजदास विधात कें तर प्रगट भई संतनि सुख देन - ९ - १२।
समुद्र के किनारे का दल दल।
(गाय, भैंस आदि को) चराया।
धनि गो - सुत, धनि गाइ ये, कृष्ण चरायौ अपु - ४९२।
वह व्यक्ति जिसके चरित्र के अधार पर कोई ग्रंथ लिखा जाय।
वह व्यक्ति जिसके चरित्र के आधार पर कोई ग्रंथ लिखा जाय।
छोटी ज्वारका हर पेड़ जो चारेके काम आता है।
हवन का अन्न पकाने का पात्र।
भाँड़ के साथ पकाया हुआ चावल।
मिट्टी का पात्र जिसमें प्रसूता स्त्री के लिए जल पकाया जाता है।
वह व्यक्ति या नायक जिसके चरित्र के आधार पर पुस्तक लिखी जाय।
जिसका उद्देश्य पूरा हो चुका हो, कृतार्थ।
जो ठीक ठीक घटे या पूरा उतरे।
भूषन - बिबिध चिसद अंबर जुत सुंदर स्वाम सरीर। देखत मुदित चरित्र सबै सुर ब्योम - विमाननि भीर ९:२६।
हरिजन हरि - चर्चा जो करें।
ऐसी बातचीत का प्रसंग जो जगह-जगह किसी की निंदा के उद्देश्य से छिड़ा रहे।
चर्चा परी बहुत द्वारावति कृष्नचंद्र की बात। तब हरि गये सैल कंदर मैं अति कोमल मृदु गात - सारा, ६४६।
जिसकी चर्चा, वर्णन या जिक्र हो।
बसंत या फाग का गीत, चाँचर।
संग मृगनिहू को नहिं करै। हरी घासहू सो नहिं चरै - ५ - ३।
जमुनातट तुन बहुत, सुरभि - गन तहाँ चरैऐ - ४३१।
(क) ये दोऊ मेरे गाइ चरैया - ५१३
(ख) मार मार कहि गारि दै धृग गाई चरैया - ५७५।
इन गैयन चरबो छड़ो है जो नहिं लाल चरैहैं - ३४३६।
मैया हौंन चरैहौं गाइ - ५१०।
ह्वै बिरक्त, सिर जटा धरै द्रुम. चर्म, भस्म सव गात - ९.३८।
घुमा-फिरा, विचरण, करता रहा।
मन बस होत नाहिंनै मेरें।….। कहा करौं, यह चरयौ बहुत दिन, अंकुस बिना मुकेरैं अब करि सूरदास प्रभु आपुन, द्वार परयौ है तेरैं - १ - २०६।
ध्वनि तरंगों को दूर तक व्याप्त होना।
बड़ी पिराक, जो आटे या मैदे की अर्द्धचंद्राकार बनती है।
पिस्ता, दाख, बदाम, छुहारा, खुरमा, खाझा, गूँझा, मटरी - ८१०।
[सं. गुह्यक, प्रा. गुज्झा, हिं. गूझा]
गूथ कर, (एक लड़ी में) पिरोकर।
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजबनिता, गूँथि कुसुम बनमाल - १० - २०६।
(लड़ी में) गूँथ दी, पिरो ली।
माँग पारि बेनी जु सँवारति, गूँथी सुन्दर भाँति - ७०४।
गुझियाँ, पिराक, समोसे आदि का मुँह बंद करना।
गोझा गूदे गाल मसूरी - २३२१।
बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी। किन तेरे भाल तिलक रचि कीनौ, किहिं कच गूँदि माँग सिर पारी - ७०८।
दर्द का एकबारगी बंद हो जाना।
चिति चरन - मृदु - चारु - नंद - नख, चलल चिन्ह चहुँ दिसि सोभा - १ - ६९।
चलता करना :- (१) हटाना, टालना।
(२) झगड़ा निपटाना।
चलता पुरजा :- बहुत काइयाँ।
चलता बनना (होना) :- झटपट चल देना।
जिसका क्रम या सिलसिला न टूटा हो।
चलता लेखा (खाता) :- चालू हिसाब।
जिसका चलन या प्रचार खूब हो।
चलता गाना :- जो गाना खूब लोकप्रिय हो।
किसी की हुई क्रिया या बात को बार-बार करना या कहना, पिष्टपेषण।
चलना, गति, चाल, चलने का भाव, ढंग या क्रिया।
(क) ज्यों कोउ दूरि चलेन कौं करै। क्रम - क्रम करि डग डग पग धरै - ३ - १३।
(ख) कबहुँ हरि कौं लाइ अँगुरी, चलन सिखावति ग्वारि - १० - ११८।
(ग) तीनि पैंड़ जाके धरनि न आवै। ताहि जसोदा चलन सिखावै - १० - १२९।
रीति-रिवाज, रस्म-व्यवहार।
चलन से चलना :- हैसियत से रहना।
किसी चीज का व्यवहार या प्रचार।
लागी चलन-चलनेलगी। प्रवाहित हुई, बह चली।
कियौ जुद्ध अति ही बिकरार। लागी चलन रुधिर की धार - १ - २७६।
केसी सकट अरु बृथभ पूतना तृनाबत की चलति कहानी - २३७९।
जो (भूमि) जोती-बोई जाती हो।
जिसका खूब व्यवहार या प्रचार हो।
[हिं. चलन + सार (प्रत्य.)]
जो काफी समय तक चल या टिक सके।
[हिं. चलन + सार (प्रत्य.)]
गमन या प्रस्थान करना, जाना।
पेट चलना :- निर्वाह होना।
मन (दिल) चलना :- प्राप्ति की इच्छा होना।
मुँह चलना :- (१) खाते रहना।
(२) मुँह से बराबर अनुचित शब्द निकलना।
हाथ चलना :- मारने को हाथ उठाना।
चल बसना :- मर जाना।
अपने चलते :- भरसक, यथाशक्ति, शक्ति भरे।
कोई काम करने में समर्थ होना, निभना।
चल निकलना :- उन्नति करना।
किसी उपाय को काम में आना।
किसी की चलना :- प्रयत्न सफल होना, दूसरे का वश या अधिकार होना।
शतरंज, ताश आदि के मोहरे या पत्ते बढ़ाना या डालना।
चलने की क्रिया, गति, चाल।
रथ तै उतरि चलनि आतुर ह्वै कच रज की लपटानि - १.२७९।
[हिं. चलना + औस (प्रत्य.)]
क्रम या परंपरा का निर्वाह होना।
क्रम या परंपरा का निर्वाह होना।
टिकना ठहरना, काम में आना।
लेन-देन या व्यवहार में आना।
लेन-देन या व्यवहार में आना।
उपयोग या काम में लाया जाना।
अच्छी तरह या ठीक काम देना।
कछु न चलाई :- कुछ वश न चला, कोई उपाय काम न आया, प्रयत्न सफल न हुआ।
उ. - (क) रहेउ दुष्ट पचि हार दुसासन कछू न कला चलाई - सारा. ७६९।
(ख) दुर्वासा सापन को आये तिनकी कछु न चलाई - सारा, ७७२।
प्रसंग छेड़ा, बात शुरू की।
(क) सूरदास वे सखी सयानी और कहूँ की बात चलाई - १२६६।
(ख) समय पाय ब्रज बात चलाई सुख ही माझ सुहाती - ३४१८।
मनु सुक सुरँग बिलोकि बिंव - फल चाखन कारन चोंच चलाई - ६१६।
(क) यह मारग चौगुनो चलाऊँ, तौ पूरौ ब्यापारी - १ - १४६।
(ख) यकटक रहैं पलक नहिं लागें पद्धति नई चलाऊँ - १४२५।
सूरजदास भक्त दोऊ दिसि कापर चक्र चलाऊँ - १ - २७४।
बहुत दिन चलनेवाला, टिकाऊ।
विशेष अर्थ या अभिप्राय से युक्त, गंभीर।
कठिनता से समझ में आनेवाला, जटिल, कठिन।
कहत पठवन बदरिका मोहिं गूढ़ ज्ञान सिखाइ - ३ - ३।
व्यवहार, प्रचार, रीति, रस्म।
चलत अंग त्रिभंग कटिकै भौंह भाव चलाइ - १३५६।
आरंभ की, वर्णन की, बतायी।
बचन परगट करन कारन प्रेमकथा चलाइ - २९१६।
लक्ष्य पर फेंक कर, (तीर आदि) छोड़कर।
दियौ चलाई- चला दिया, लक्ष्य करके छोड़ दिया।
अस्वत्थामा बहुरि खिस्याइ। ब्रह्म अस्त्र कौं दियौ चलाइ - १ - २८९।
छिरक लरिकन मही सौं भरि, ग्वाल दए चलाइ - १० २८९।
नई रीति इन अवहिं चलाई - १०४१।
चलाने का काम दूसरे से कराना।
अंडबंड, बेठिकाने, अस्तव्यस्त।
नियम का उल्लंघन, व्यतिक्रम।
चलेंगे, (एक स्थान से दूसरे को जायँगे।
कबहि घुटरुवनि चलहिंगे, कहि बिधिहिं मनोवै - १० - ७४।
चलने की धूमधाम या तैयारी।
लेन-देन या व्यवहार में लाना।
प्रचलित करना, प्रचार करना।
लाठी (आदि) का उपयोग करना।
अपराधी का न्यायालय भेजा जाना।
एक स्थान से दूसरे को भेजा जानेवाला माल।
चलने को प्रेरित करना, चलने में लगाना।
किसी की चलाना :- किसी की चर्चा करना।
पेट चलाना :- निर्वाह करना।
मन (दिल) चलाना :- पाने की इच्छा होना, मन विचलित होना।
मुँह चलाना :- (१) खाते रहना।
(२) बहुत बातें करना या बनाना।
हाथ चलाना :- मारना-पीटना।
काम को जारी रखना या पूरा करना।
चलाया, चलने के लिए प्रेरित किया।
जित - जित मन अर्जुन कौ तितहिं रथ चलायौ - १ - २३।
हिलाते-डुलाते हैं, गति देते हैं।
मनहूँ तें अति बेग अधिक करि, हरिजू चरन चलावत - ८ - ४।
प्रारंभ करते हैं, छेड़ते हैं।
(क) फिरि फिरि नृपति चलावत बात। कहु री सुमति कहा तोहि पलटी, प्रान - जिवन कैसे बन जात - ९ - ३८।
(ख) निकट नगर जिय जानि धँसे घर, जन्मभूमि की कथा चलावत - ९ - १६७।
(ग) कहुँ पांडव की कथा चलावत चिंता करत अपार - सारा.६७५।
(तीर गोली आदि) छोड़ते हैं।
तीर चलावत सिष्य सिखावत घर निसान देखरावत - सारा, १९०।
(धार, पानी आदि) चलाते या फेकते हैं।
इत चितवत उत धार चलावत यहै सिखायौ मैया - ७३४।
चलाने के लिए, प्रचलित करने को, प्रचार करने को।
दैहौं राज बिभीषन जन कौं, लंकापुर रघु - आन चलावन - ९ - १३१।
गौना, मुकलावा, द्विरागमन।
(खाने के लिए) मुँह हिलाये, खाने का प्रयत्न करे।
हौं यहि जानति बानि स्याम की अँखियाँ मचे बदन चलावै - १० - २३१।
आँखें या भौहें) मटकावे, चमकावे या भाव बतावे |
(क) सखियन बीच भरयो घट सिर पर तापर नैन चलावै - ८७५।
(ख) ठठकति चलै मटकि मुँह मोरे बंकट भौंह चलावें - ८७६।
(प्रसंग) छेड़े, (चर्चा) करे।
(क) रे मन, निपट निलज अनीति। जियत की कहि को चलावै, मरत विषयनि प्रीति - १ - ३२१।
(ख) इद्रादिक की कौन चलावै संकर करत खवासी - ३०८६।
निर्वाह करे, वंश-परि-वार का क्रम या परंपरा बनाये रखे।
सो सपूत परिवार चलावै एतौ लोभी धृत इनही - पृ. ३२२।
चलि आयो :- प्रसिद्ध है, प्रचलित है।
उ - (क) जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भक्तनिहाथ बिकानौ - १ - ११।
(ख) जुग जुग विरद यहै। चलि आयौ, टेरि कहत हौं यातै - १ - १३७।
(ग) जुग जुग यह घलि यौ - ९ - ५०।
चलित - कुंडल गंड - मंडल, मनहुँ निर्तत मैन - १ - ३०७।
धर्मपुत्र कौं दै हरि राज। निज पुर चैलिचे कौं कियौ साज - १ - २८१।
सूर सकल सुख छाँड़ि आपनौ, बनबिपदा - सँग चलिहौं - ९ - ३५।
भारतादि कुरुपति की जथा, चली पांडवनि की जब कथा - १ - २८४।
सूर स्याम सनमुस्व जे आये ते सब स्वर्ग चलैया - २३७४।
बचन बाह लै चलौं गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी - १ - १४६।
सूरदास प्रभु इहिं औसर भजि उतरि चलौ भवसागर - १ - ६१।
व्यवहार या आचरण करो, ढंग रखो।
हम अहीर ब्रजबासी लोग। ऐसे चलौ हँसै नहिं कोऊ घर में बैठि करौ सुख भोग - १४९७।
रोर के जोर तें सोर घरनी कियों, चल्यौ द्विज द्वारिका द्वार ठाढ़ौ - १ - ५।
प्रस्थान या गमन किया, जाने लगे।
प्रस्तुत हुए, कटिबद्ध हुए, तैयार हुए।
कौरव - काज चले रिषि - सापन, साक पत्र सु अघाए - १ - १३।
रंक चलै सिर छत्र धराइ - १ - २।
उ. - जाकी जग मैं चलै कहानी - १ २२६।
(एक की) कहा चलै :- (एक का) क्या वश चल सकता है, क्या सफलता मिल सकती है।
उ. - अंग निरखि अनंग लज्जित सकै नहिं ठहराय। एक की कहा चलै शत कोटि रहत लजाय।
प्रचलित होगी, प्रसिद्ध रहेगी।
यह तौ कथा चलैगी आगैं, सबअ पतितनि मैं हाँसी - १ - १९२।
प्रचलित होगा, प्रचार बढ़ेगा।
सूर सुमारग फेरि चलैगौ, बेदबचन उर धारौ - १ - १९२।
(क) सिर पर धरि न चलैगौ कोऊ, जो जतननि करि माया जोरी - १ - ३०३।
(ख) धोखें ही धोखें बहुत बह्यौ। मैं जान्यौ सब संग चलेगौ, जहँ। को तहाँ रहैगौ - १ - १३७।
(आटा आदि) माड़ना, मलना या मसलना।
(माला आदि) गूँथना या पिरोना।
(चोटी आदि) करना।
एक गोंद जो सुगंध के लिये जलाया जाता है।
गोरस बेचनहारि गुजरी अति इतराती - १०६५।
गूझा बहु पूरन पूरे। भरि भरि कपूर रस चूरे - १० - १८३।
[सं. गुह्यक, प्रा. गुज्झा]
[सं. गुह्यक, प्रा. गुज्झा]
च से अ तक पाँच अक्षरों का समूह जिसका उच्चारण तालु से होता है।
सब दिशाओं से एक साथ चलनेवाली हवा।
बदनामी की चर्चा फैलानेवाला, निंदा करनेवाला।
घातक कुटिल चवाई कपटी महाक्रूर संतापी।
झूठी बात कहने वाला, चुगली खानेवाला।
सुनहु स्याम बलभद्र चवाई (चबाई) जनमत हो कौ धूत - १० - २१५।
(क) गोरी इहै करति चवाउ। देखौं धौ चतुराई वाकी इमहि कियौं दुराउ - १२८३।
(ख) नैनन तें यह भई बड़ाई। घर घर यई चवाव चलावत हम सौं भेंट न माई - २८८०।
[हिं. चष=आँख+चोल = वस्त्र]
झूठी बात कहनेवाला, चुगलखोर।
उनै उनै घन बरषत चष उर सरिता सलिन भरी - २८१४।
प्रान ये मन रसिक ललित घी लोचन चषक विवति मकरंद सुख रासि अंतर सची।
सट गयी, लगी, जुड़ी, चिपकी।
ज्यों नाभी सर एक नाल नव कनक बिख रहे चसी री।
पंच सब्द ध्वनि बाजत नाचत गावत मंगलचार चहर की - १० - ३०।
हँसी-दिल्लगी, ठट्टा, चुहलबाजी।
अजहुँ सँग रहत, प्रथम लाज गहेउ संतत सुभ चहत, प्रिय जन जानि - १ - ७७।
उमँगी ब्रजनारि सुभग, कान्ह बरष - गाँठ उमँग, चहतिं बरष बरषनि - १० - ९६।
उमंग या प्रसन्नता से बोलना।
(क) मथति दधि जसुमति मथानी, धुनि रही घर घहरि। खवन सुनति न महर - बातें, जहाँ - तहँ गह चहरि - १० - ६७।
(ख) तनु बिष रहयौ है छहरि।…..। गए अवसान, भीर नहिं भावै, भावै नहीं चहरि। ल्यावौ गुनी जाइ गोबिंद कौं बाढ़ी अतिहिं लहरि - ७५०।
(ग) नेकहूँ नहिं सुनति स्रवननि करति हैं हम चहरि - ८६०।
सुत को बरजि राखौ महरि।…...। सूर स्यामहिं नेक बरजौ करत हैं अति चहरि - २०३९।
अनंद की धूम, रौनक।
बहुत से लोगों का आना-जाद।
(१) आनंद की धूम, रौनक।
(२) बहुत से लोगों का आना - जाना।
बिबिध खिलौना | भाँति के (बहु) गजमुक्ता चहुँधार - १० - ४२।
[हिं. चार (चहुँ =चार)]+धार= ओर, दिशा]
सूरदास भगवंत भजत जे, तिनकी लीक चहूँ जुग खाँची - १ - १
उपवन बन्यौ चहूँघा पुर के अति ही मोकों भावत - २५५९।
[हिं. चाहना+एता (प्रत्य.)]
तब न कियो प्रहार प्राननि को फिरि फिरि क्यों चहिबो - ३३१४।
एक जु हरि दरसन की आसा ता लगि यह दुख सहियत। मन क्रम बचन सपथ सुन सूरज और नहीं कछु चहियत - ३३००।
(क) कहत नारि सब जनक नगर की बिघि सों गोद पसारि। सीता जू को बर यह चहिये है जोरी सुकुमार - सारा, २११।
(ख) सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि रसिकहिं सब सुन चहिये जू - २०१५।
रिषि कयौ, रानी पुत्री चही। मेरे मन मैं सोई। रही - ९ - २।
(क) दावानल ब्रजजन पर धायौ। गोकुल ब्रज बृंदाबन तृन द्रुम, चहुँघा चहत जरायौ - ५९२।
(ख) बारि बाँधे बीर चहुँघा देखत ही बज्र सम थाप गल कुंभ दीन्हो - २५९०।
[हिं. चहुँ= चार+घा = ओर, तरफ]
गुप्त रीति से जीविका प्राप्त करनेवाला।
गुप्त रीति से जीविका प्राप्त करनेवाला।
गुप्त कार्य (जैसे चोरी) करके निर्वाह करनेवाला।
गूढ़ोत्तर अस कहत ग्वालिनी मोहि गेह रखवारी - सा, ८०।
(माला आदि) गूँधना या पिरोना।
होली, फाग या बसंत को राग या गीत।
होली, फाग या बसंत का राग या गीत।
बकासुर रचि रूप माया रह्यो छल करि आइ। चाँचु पकरि पुहुमी लगाई इक अकास समाइ।
(क) उरझयौ बिबस कर्म - निरअंतर, समि सुख - सरनि चहयौ - १ - १६२।
(ख) एकै चीर हुतौ मेरे पर, सो इन इरन चढ्यौ - १ - २४७।
अन्न की राशि पर ठप्पा लगाने की थापी।
अन्नराशि पर लगाया हुआ ठप्पा या चिह्न।
टोटके के लिए शरीर पर खींचा गया घेरा।
अन्न की राशि पर ठप्पा लगाना।
कइयौ, यहै हम तुम सौं चहैं। पाँच बरस के नितहीं रहैं - ३ - ६।
चाहता या इच्छा करता है, अभिलाषा रखता है।
पारथ तिय कुरुराज सभा में बोलि करन चहै नंगी - १ - २१।
जों चहै मोहिं मैं ताहि नाही चहौं - ८८।
आयसु दियौ, जाउ बदरीबन, कहैं, सो कियौ चहौं - ३ - २।
जो चहै। मोहिं मैं ताहिं नाहीं चहौं - ८८।
बहुत आवश्यकता, गहरी चाह, भारी लालसा।
चाँड़ सरना :- इच्छा या लालसा पूरी होना।
चाँड़ सराना :- इच्छा या लालसा पूरी करना।
चाँड़ सरायौ :- इच्छा पूरी की।
उ. - पुरुष भँवर दिन चारि आपने अपनो चाँड़ सरायौ।
प्रचंड, उग्र, उद्धत, नटखट।
नंद सुत लाड़ले प्रेम के चौंड़िले सौंहु दै कहत है बारि आगे।
हरि बिन अपनौ को संसार। मायालोभ - मोह हैं चाँड़े काल - नदी की धार - १ - ८४।
धीर धरहु फल पावहुगे। अपने ही प्रिय के सुख चाँड़े कबहूँ तो बस आवहुगे।
चाँद का कुंडल (मंडल) बैठना :- हलकी बदली में चंद्रमा के चारो ओर घेरा बन जाना।
चाँद का टुकड़ा :- बहुत सुंदर व्यक्ति।
चाँद चढ़ना :- चाँद का ऊपर उठना।
चाँद दीखे :- शुक्लपक्ष की द्वितीया के बाद।
चाँद पर थूकना :- महात्मा पर कलंक लगाना जिससे स्वयं अपमानित होना पड़े।
चाँद पर धूल डालना :- निर्दोष या साधु को दोष लगाना।
चाँद सा :- बहुत सुंदर।
किधर चाँद निकला है :- कैसे दिखायी दिये, बहुत दिन बाद दिखायी दिये।
द्वितीया के चंद्रमा के आकार का एक आभूषण।
चाँद पर बाल न छोड़ना :- बहुत मारना-पीटना।
सब कुछ हर लेना, खूब मूड़ना।
चंद्रमा का प्रकाश या उजाला, चंद्रिका।
चार दिन की चाँदनी :- थोड़े दिन का सुख।
चाँपति कर भुज दंड रेष गुन अंतर बीच कसी - सा. उ. २५।
कहौ तौ परबत चाँपि चरन तर, नीर - खार मैं गारौ - ९ - १०७।
(क) नीलावती चाँवर दिवि - दुर्लभ। भात परौस्यौ माता सुरलभ - ३९६।
(ख) तिल चाँवरी, बतासे, मेवा, दियौ कुँवरि की गोद। सूर स्याम राधा - तनु चितवत, जसुमति मन - मन, मोद - ७०४।
(क) अबकी बार मनुष्यदेह धरि, कियौ न कछू उपाइ। भटकत फिरथौ स्वान की नाई', नैकु जूठ के चाइ - १ - १५५।
(ख) कहा करौं चित चरन अटक्यौ सुधा - रस के चाइ - ३ - ३।
(ग) बिष्णु - भक्ति कौ ता मान चाई - १० उं. ७।
गए ग्रीषम पावस रितु आई सब काहू चित चाइ - २८४४।
(क) चित्रकेतु पृथ्वीपति राउ। सुबन हित भयौ तास चित चाउ - ६ - ५।
(ख) मैन - बचकर्म और नहिं दूजौ, विन रघुनंदन राउ। उनकै क्रोध भस्म है जैहौं, करौ न सीता चाउ - ९ - ७८।
चाउ सरना :- इच्छा पूरी होना।
चाउ सरै :- इच्छा पूरी होने पर।
उ - चाउ सरै पहिचानत नाहिंन प्रीतम करत नये - २९९३।
चाँदी का जूता :- घूस में दिया जाने वाला धन।
चाँदी काटना :- खूब माल मारना।
चाँदी का पहरा :- सुख - समृद्धि को समय।
चाँदी होना :- खूब लाभ होना।
वह काल (या महीना) जो चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करने में लगाता है।
वह वर्ष जो चंद्रमा की गति के अनुसार निश्चित किया जाता है।
महीने भर का एक व्रत जिसमें चंद्रमा के घटने-बढ़ने के अनुसार आहार घटाया-बढ़ाया जाता है।
एक छंद।
चंद्रमा संबंधी, चंद्रमा का।
अन्न-राशि पर छापा लगाने का थापा।
गोल चिन्ह की रेखा, गोंडला।
चाक करना (देना) :- चीरना, फाड़ना।
चाक होना :- चिरना, फटना।
गहरा, चिह्न, निशान या दाग।
[हिं. गूथना= मोटी सिलाई, करना]
खोपड़ी का सार भाग, भेजा, मगज।
फल या तरकारी आदि काटने का छुरीनुमा औजार।
ब्यंजन सकल मँगाइ सखनि के आगैं राखे। खाटे - मीठे स्वाद, सबै रस लै - लै चाखे - ४९१।
आँव आदि दै सबै सँधाने। सब चाखे गोबर्धन - राने - ३९६।
(क) जिहिं मधुकर अंबुज - रस चाख्यौ, क्यों करील - फल भावें - १ - १६८।
(ख) सद माखन अति हित मैं राख्यौ। आज नहीं नैंकहुँ तुम चाख्यौ - ५४७।
होली का स्वाँग और हुल्लड़।
स्वाद लेने की। प्रबल इच्छा
जिसका ज्ञान या बोध नेत्रों से हो, देखने का।
यह जग - प्रीति सुवा - सेमर ज्यौं, चाखत ही उड़ि जात - १ - ३१३।
यह संसार सुवा - सेमर ज्यों, सुंदर देखि लुभायो। चाखन लाग्यौ रुई गई उड़ि, हाथ कछू नहिं आयौ - १ - ३३५।
मनु सुक सुसँग बिलोकि बिंब फल चाखन कारन चोंच चलाई - ६१६
चखनेवाला, स्वाद लेनेवाला।
इनहिं स्वाद जो लुब्ध सूर सोइ जानत चाखनहारौ री - १० - १३५।
[हिं. चखना + हार (प्रत्य.)]
सबरी कटुक बेर तजि, मीठे चाखि गोद भरि ल्याई - १ - १३।
(क) मनौ भुजंक अमी - रस - लालच, फिरि फिर चाटत सुभग सुचंदहि - १० - १०७।
(ख) जैसे धेनु बच्छ कौ चाटत तैसे मैं अनुरागूँ - सारा.१३३।
(प्यार से किसी वस्तु पर) जीभ चलाती हैं।
ब्यानी गाइ बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतखिनि लैया - १० - ३३५।
जीभ लगाकर खाना या स्वाद लेना।
[अनु. चटचट = जीभ चलाने का शब्द]
[अनु. चटचट = जीभ चलाने का शब्द]
जज्ञ - पुरुष तजि करत जज्ञे - ब्रिधि, तातै कहि कह चाढ़ सरी - ८०६।
चाहनेवाला, प्रेमी, आसक्त।
देखी हरि मथति ग्वालि दधि ठाढ़ी। जोबन मदमाती इतराती, बेनि ठरति कटि लौं, छबि बाढ़ी। दिन थोरी, भोरी, अति गोरी, देखत ही जु स्याम भए चाढ़ी। - १० - ३००।
धन्य धन्य भक्तत के चाढ़े - १०३५।
(क) तुम हम पर रिस करति हौ। हम हैं तुव चाढ़े। निठुर भई हौ लाड़ली कब के हम ठाढ़े।
(ख) दिन थोरी भोरी अति को देखत ही जु स्याम भए चाढे (चाढ़ी) - १० - ३००।
चंद्रगुप्त मौर्य का मंत्री।
[अनु. चटचट = जीभ चलाने का शब्द]
कीड़ों का किसी वस्तु को खा जाना।
[अनु. चटचट = जीभ चलाने का शब्द]
मीठी या प्रिय लगनेवाली बात।
झूठी प्रशंसा, खुशामद, चापलूसी।
झूठी प्रशंसा या खुशामद, चापलूसी।
[सं. चाटुकार+ई (प्रत्य.)]
झूठी प्रशंसा या चापलूसी करने में बहुत कुशल।
दूध - दही के भोजन चाटे नेकहुँ लाज न आई - सारा, ७४९।
हौं अपने गोपाल खड़े हौं, भौन - चाँङ सब रहौ धरी। पाऊँ कहाँ खिलावन कौ सुख, मैं दुखिया, दुख कोखि जरी - १० - ८०।
कंस का एक पहलवान जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
वर्षाकाल में बोलनेवाला एक पक्षी जिसके संबंध में कवियों का विश्वास है कि यह नदी-सरोवर का संचित जल न पीकर केवल स्वाती नक्षत्र की बूँदों से अपनी प्यास बुझाता है।
खुशामदी, चापलूस. चाटुकार।
रोचन भरि लै देत सीक सौं, स्रवन निकट अतिहीं चातुर की - १० - १८०।
जे जे प्रेम छके मैं देखे तिनहिं न चातुरताई - २२७५।
नारि गई फिरि भवन आतुरी। नंद - घरनि अब भई चातुरी - ३९१।
चार महीनों में होनेवाला, चार महीने का।
चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
इनका धर्म।
चादर उतारना :- स्त्री का अपमान करना।
चादर रहना :- इज्जत बनी रहना।
चादर से बाहर पैर फैलाना :- हैसियत से ज्यादा खर्च करना।
पानी की ऊपर से गिरने वाली धार।
पानी का फैलाव जिसमें लहरें या भँवर न हों।
देवता या पूज्य स्थान पर चढ़ाई जानेवाली फूलों की राशि।
पाटंबर - अंबर तजि गूदरि पहराऊँ - १.१६६।
चोटी आदि में फूल, मोती आदि) गूँथे या पिरोये।
जिहि सिर केस कुसुम भरि गूदे तेहि कैसे भसम चढ़ैए - ३१२४।
एक बड़ा पेड़ जिसके फल में बहुत से भुनगे रहते हैं।
मैं ब्रह्मा इक लोक कौ, ज्यौं गूलर - फल जीव। प्रभु तुम्हरे इक रोम प्रति, कोटिक ब्रह्मा सींव - ४९२।
गूलर का कीड़ा :- अनुभवहीन व्यक्ति, कूपमंडूक |
गूलर का फूल :- वह (वस्तु, पात्र आदि) जो कभी देखने में न आवे।
गूलर का फूल होना :- कभी दिखायी न देना।
गूलर का पेट फड़वाना (पेट फाड़कर जीव उड़ाना) :- गुप्त भेद प्रकट कराना, भंडा फुड़वाना।
कंस का एक मल्ल जिसे धनुष-यज्ञ के समय श्रीकृष्ण ने मारा था।
भुज चापति चुमति बलि जाई - १० - ७१।
चापि ग्रीव हरि प्रान हरे, दृग - रकत - प्रवाह चल्यौ अधिकानी - १० - ७८।
जब मुख गए समाइ, असुर तब चाब सकोरथौ - ४३१।
बच्चे के जन्मोत्सव की एक रीति।
बात जिससे काम करने की उत्तेजना मिले।
आमिष - रुधिर अस्थि अँग जौ कौं, तौ लौ कोमल चाम - १ - ७६।
चाम के दाम :- चमड़े का सिक्का।
चाम के दाम चलाना :- अन्याय या अंधेर करना।
चाम के दाम चलाबै :- अन्याय या अंधेर करता है।
उ. - ऊधौ अब कछु कहत ने अवै। सिर पै सौति हमारे कुबिजा चाम के दाम चलावै - ४२५७।
एक पौधा जिसकी पत्तियाँ उबाल कर पी जाती हैं।
भरि भरि सकट चले गिरि सनमुख अपने अपने चाय - ९१८।
चित में यह अनुरक्त बिचारत हरि दरसन की चाय - सारा. ८४८।
चार आँखें करना :- सामने आना।
चार आँखें होना :- देखा देखी होना।
चार चाँद लगना :- मान, प्रतिष्ठा या सौंदर्य बढ़ना।
चार कंधे चढ़ना (चलना) :- मरना।
चार-पाँच करना :- (१) हीला - हवाला करना।
(२) झगड़ा करना।
चारों फूटना :- न देख सकना और न विचार कर सकना।
चारों खाने चित्त होना :- (१) बिलकुल हार जाना।
(२) सकपका जाना।
चार दिन :- थोड़े दिन।
चार पैसे :- थोड़ा धन।
बिद्याधर गंधर्व अपसरा गान करत सब ठाढ़े। चारण (चारन) सिद्ध पढ़त बिरुदावलि लै फगुवा सुख बाढ़े - सारा. २८।
गोपी ग्वाल गाइ बन चारण (चारन) अति दुख पायौ त्यागत - २९१५।
बन - बन फिरत चारत धेनु - ४२७।
[हिं. चार + दा (प्रत्य.)]
वंश की कीर्ति गाने वाला, बंदीजन।
(क) बिप्र - सुजन - चारन - बंदी - जन सकल नंद - गृह आए - १० - ८७।
(ख) चारन सिद्ध पढ़त बिरुदावलि लै फगुवा सब ठाढे - सारा, २८।
(क) धन्य गाइ, धनि द्रुम - बन चारन। धनि जमुना हरि करत बिहारन - ३९१। (ख) प्रात जात गैया ले चारन घर आवत है साँझ - ४११।
चारपाई पर पड़ना :- बीमार होना।
चारपाई धरना (पकड़ना, लेना) :- (१) बहुत बीमार होना।
(२) लेट जाना।
चारपाई से पीठ लगना :- बीमारी से बहुत दुबले हो जाना।
लोचन भए पखेरू माइ। लुब्धे' स्याम रूप चारा को अकल फंद परे जाइ - पृ.३२५।
मछलियों को फँसाने का आटा या अन्य वस्तु जो कँटिया पर लगायी जाती है।
चौपरि जगत मड़े जुग बीते। गुन पाँसे, क्रम अक, चारि गति सारि, न कबहूँ जीते - १६०।
चार दिवस :- थोड़े दिन, कुछ दिन।
उ. - सब वे दिवस चारि मन रंजन, अंत काल बिगरै गो - १.७५।
जटायु, संपाती आदि पक्षी जिनकी पौराणिक कथाएँ प्रसिद्ध हैं।
गृहस्थाश्रम जिसमें मनुष्य बाल बच्चों के साथ रहता है।
गृहस्रम है अति सुखदाई। तप तजि कै गृहआस्रम करौं - ९.८।
व्यवहार या आचरण करनेवाला।
महामुक्ति कोऊ नहिं बाँछै जदपि पदारथ चारी - ३३१६।
सूरदास प्रभु नाँगे पाँयन दिन प्रति गैयाँ चारी - ३४१२।
चारु मोहिनी आइ आँध कियौ, तब नख - सिख तैं रोयौ - १ - ४३।
सूरप्रभु कर गहत ग्वालिनी, चारु चुंबन हेत - १० - १८४।
रुक्मिणी से उत्पन्न श्रीकृष्ण का एक पुत्र।
सुंदरता, मनोहरता, सुहावनापन।
टेरि उठे बलराम स्याम कौं आवहु जाहिं धेनु बन चारे - ४२३।
दुखित देखि बसुदेवदेवकी, प्रगट भए धारि कै भुज चारै - १० - १०।
चारों बेद चतुर्मुख। ब्रह्मा जस गावत हैं ताको - १ - ११३।
कियो गीध कौ चारौ :- मार डाला।
उ. - नवग्रह परे रहैं पाटीतर, कूपहिं काल उसारौ। सो रावन रघुनाथ छिनक मैं कियौ गीध कौ चारौ - ६ - १५७।
दीनदयाल, पतितपावन, जस बेद बखानत चारौ - १ - १५७।
ब्रह्म, सनक, सिव, ध्यान न अवत, सो ब्रज गैयनि चारौ - १० - ३७८।
चारयो (चारों) फूटना :- चर्मचक्षु और ज्ञानचक्षु नष्ट होना, दृष्टि और बुद्धि का नाश होना।
उ. - निसि दिन बिषय-बिलासनि बिलसत, फूटि गई तव चारयौ - १ - १०१।
गति, गमग, चलने की क्रिया।
(क) इंद्री अजित, बुद्धि बिषयारत, मन की दिन दिन उलटी चाल - १ - १२७।
(ख) टेढ़ी चाल, पाग सिर टेढ़ी, टेढ़ै टेढ़ै धायो - १ - ३१०।
(क) महामोह के नूपुर बाजत, निंदा - सब्द रसाल। भ्रम - भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल - १ - १५३।
(ख) अब कछु औरहि चाल चाली - २७३४।
(ग) अब समीर पावक सम लागत सब ब्रज उलटी चाल - ३१५५।
(घ) कहा वह प्रीति रीति राधा सौ। कहाँ यह करनी उलटी चाल - ३४५।
चलन, रीति-रिवाज, प्रथा, परिपाटी।
सूर स्याम कौ कहा निहोरौ, चलत बेद की चाल - १ - १५९।
(ङ) अपने सुत की चाल न देखत उलटी तू हमपै रिस ठीनति।
चलने का ढंग, ढब या प्रकार।
(क) हौं वारी नान्हें पाइनि की दौरि दिखावहु चाल - १० - २२३।
(ख) धूरि घौत तन अंजन नैननि, चलत लटपटी चाल - १० - ११४।
(ग) सूरदास गोरी अति राजत ब्रज कौं आवत सुंदर चाल - ४७३।
(अ) वह चितवन वह चाल मनोहर वह मुसुक्यानि जो मंद धुनि गावन–३३०७।
आकार, प्रकार, बनावट, गदन |
गमन-मुहूर्त, चलने की सायत, चला।
कार्य करने की युक्ति, उपाय या ढंग।
धोखा देने की युक्ति, छल-कपट, धूर्तता।
चाल चलना (अक.) :- धोखा देने की युक्ति या कार्य सफल होना
चाल चलना (सक.) :- धोखा देना, चालाकी करना
चाल में आना :- धोखे में पड़ना
शतरंज या ताश में मोहरा या पत्ता चलना।
[हिं. चालन+हार (प्रत्य.)]
एक स्थान से दूसरे को ले जाना।
विदा होकर आना, चाला होना।
कनक - कामिनी सौं मन बाँध्यौ, ह्वै गज चल्यौ स्वान की चालईि - १ - ७४।
[हिं. चाल + हिं.(प्रत्य.)]
जो क्रम में उनतालीस के आगे पड़ता है।
जिसका चलन रोका न गया हो, चलता हुआ
साधु - संग, भक्ति बिना, तन अकार्थ जाई। जारी ज्यौं हाथ झारि चालै छुट काई - १ - ३३०।
चलावे, बखान करे, प्रशंसा करे।
अपनी को चालै सुनि सूरज पिता जननि बिसराई।
चित्रकेतु पृथ्वीपति राव। सुतहित भयो तासु हिय चाव।
चाव निकलना :- लालसा पूरी होना।
ब्रह्मचर्य के बाद के आश्रम का धर्म निबाहनेवाला व्यक्ति।
माल लाने या लेजाने का आज्ञापत्र।
अपराधियोंका अदालतमें भेजा जाना।
[हिं. चाल +इया (प्रत्य.)]
चल दीं, प्रस्थान कर दिया।
बेनु स्रवन सुनि, गोबर्धन तैं तृन दंतनि धरि चालीं - ६१३।
प्रसंग चलाया, बात शुरू की।
(क) ऊधौ कत ए बातैं चालीं - ३२२८।
(ख) बहुरयो ब्रज बात न चाली। १० उ. - ७९।
चाल चाली :- धोखा देने का प्रयोजन किया, चालाकी की।
उ. - अब कछु ओरहि चाल चाली - २७३४।
[सं. चत्वारिंशत्, प्रा. चत्तालीस]
सूरदास प्रभु पथिक न चालहिं कासौं कहाँ सँदेसनि।
नयी बधू को पहले पहल ससुराल या मायके जाना।
यात्रा का मुहूर्त या शुभ सायत।
भेजे हुए माल का बीजक या हिसाब।
छोटे छोटे बीज के दाने जो खाये जायँ।
चावल भर :- रत्ती केआठवें भाग के बराबर।
चीनी या गुड़ का रस जो आँच पर चढ़ाकर गाढ़ा किया गया हो।
किसी पदार्थ में मीठेकी मिलावट।
नीलकंठ पक्षी। चाहा पक्षी।
(क) भक्ति भाव की जो तोहिं चाह। तो सौं नहिं ह्वै है निर्वाह - ४ - ९।
(ख) तुम कह्यौ मरिबे की तोहि चाइ। सव काहू कौं है यई राइ - ५ - ३।
[सं. इच्छा, पु. हिं. चाहि अथवा सं.उत्साह, प्रा. उच्छाह]
[सं. इच्छा, पु. हिं. चाहि अथवा सं.उत्साह, प्रा. उच्छाह]
[सं. इच्छा, पु. हिं. चाहि अथवा सं.उत्साह, प्रा. उच्छाह]
[सं. इच्छा, पु. हिं. चाहि अथवा सं.उत्साह, प्रा. उच्छाह]
खबर, सूचना, समाचार, भेद की बात।
(क) हौं सखि नई चाइ इक पाई। ऐसे दिननि नंद कैं सुनियत उपज्यौ पूत कन्हाई - १० - २२।
(ख) चकित भयौ ब्रज चाह सुनाई - १५६१।
इच्छा करता है, हता है, अभिलाषा करता है।
(क) बोवत बबुर, दाख फल चाइत, जोवत है फल लागे - १ - ६१।
(ख) सुरतरु सदन सुभाव छाँड़ि कह चाहत है द्रुम भूम भँडारौ - सा. १११।
चाहि रही-देखती, ताकती या निहारती। रही।
रही ग्वाति हरि कौ मुख चाहि - १० - ३१६।
अपेक्षाकृत (अधिक), से बढ़कर, बनिस्बत।
(वह भूमि) जो कुएँ के जज से सींची जाय।
सूर नप नारि हरि बचन मान्यौ सत्य हरष है स्याम मुख संबनि चाहे - १६१८ |
चाहते हैं, इच्छा करते हैं।
लियें दियौ चाहैं सब कोऊ, सुनि समरथ जदुराई - १ - १६५।
इच्छा करते ही, इच्छा होते ही।
रीत भरे, भरें पुनि ढारे, चाहै फेरि भरे - १ - १०५।
मिल्यौ न चाहै-मिल नहीं पाती, प्राप्त नहीं होती।
घर मैं गथ नहिं भजन तिहारौ, जौन दिऐ मैं छुटौं। धर्म - जमानत मिल्यौ न चाहै, तातें ठाकुर लूटौ - १ - १८५।
(क) हरि की भक्ति करो सुख नीके जो चाहो सुख पायौ - सारा, ७३।
(ख) करो उपाव बचो जो चाहो मेरो बचन प्रमानो - सारा, ४८७।
कोउ नयनन सों नयन जोरि कै कहति न मो तनचाहो - २४२७।
चाहता हूँ, इच्छा करता हूँ।
कळू चाहीँ कहौं, सकुचि मन मैं रहौं, अपने कर्म लखि त्रास अवै - १ - ११०।
(क) नाग - नर - पसु सबनि चाह्यौ सुरसरी कौ छंद - ६ - १०।
(ख) जल ते बिछुरि तुरत तनु त्याग्यौ तउ कुल जल को चाह्यौ - ३१४६।
इच्छा करती है, अभिलाषती है।
(क) चरन - कमल नित रमापलोवै। चाहति नैंकु नैन भरि जोवै - १० - ३।
(ख) कासौं कहाँ सवी कोउ नाहिंन, चाहति गर्भ दुरायौ - १० - ४।
पाने की इच्छा जताना, माँगना।
गुड़ चींटा होना :- परस्पर चिमट जाना।
चिउँटे के पूर निकलना :- मरने को होना, इतराकर ऐसा काम करना जिससे हानि की संभावना हो।
बहुत धीमी या सुस्त चाल या क्रिया।
चिउँटी की चाल :- सुस्त चाल, मंदगति।
चीखने-चिल्लाने का घोर शब्द।
चीखने-चिल्लाने का घोर शब्द।
चिंता, चिंतन, ध्यान, याद, फिक्र।
राघौ जु, कितिक बात, तजि चिंत - ६:१०७।
ध्यान लगाते हैं, स्मरण करते हैं।
सनक - संकर ध्यान धारत, निगम अगम बरन। सेस, सारद, रिषय नारद, संत चिंतत सरन - १ - ३०८।
चित्त चिंतन करत जा - अघ हरत, तारन - तरन| १ - ३०८।
ब्रह्मचर्य के पश्चात का आश्रम जिसमें स्त्री और संतान के साथ व्यक्ति रहता और उनके प्रति स्वकर्तव्य निबाहता है।
[सं, गृहस्थ+हिं. ई (प्रत्य.)]
[सं, गृहस्थ+हिं. ई (प्रत्य.)]
[सं, गृहस्थ+हिं. ई (प्रत्य.)]
[सं, गृहस्थ+हिं. ई (प्रत्य.)]
तपसी तुमको तप करि पावै। सुनि भागवत गृही गुन गावै - १० उ. - १२७।
चिंता या फिक्र करने लायक।
चिंता मानि, , चितै अंतर - गति, नाग - लोक को ध्याए - १ - २६।
चिंता लगना :- बराबर फिक्र रहना।
कुछ चिंता नहीं :- कोई परवाह या फिक्र की बात नही।
परमें उदार चतुर चिंतामनि कोटि कुबेर निधन कौं - १ - ६।
एक कल्पित रत्न जो सभी तरह की इच्छा पूरी करता है।
सरस्वती देवी का एक मंत्र।
चिंति चरन मृदु - चंद - नख, चलत चिन्ह चहुँ दिसि सोभा - १ - ६६।
हिंदी की चिंदी निकालना :- बहुत छोटी छोटी भूलें दिखाना।
श्रीफ त मधुर, चिरौंजी अनी। सफरी चिउरा, अरुन खुबानी १० - २११।
[सं. चिविट, प्रा. चित्रिड, चिउड़ा]
महुए की जाति का एक जंगली पेड़।
[सं. चिपिट, प्रा. चिवड, चिविल]
बाँस आदि की तीलियों का परदा।
जो खुरदुरा या ऊबड़ खाबड़ न हो।
चिकना देखकर फिसल पड़ना :- ऊपरी धन, रूप की चमक-दमक पर लुभा जाना।
जो रूख-सूखा न हो, स्निग्ध।
[हिं. चिकना+ वट, हट (प्रत्य.)]
बनाठना, छैल छबीला, शौकीन।
(क) सब हीं ब्रज के लोग चिकनियाँ मेरे भाएँ घास।
(ख) बहुरि गोकु काहे को आवत भावत नवजोबनियाँ। सूरदास प्रभु वाके बस परि अब हरि भये चिकनियाँ - ३८७।
[सं. चीत्कार प्रा. चीक्कार, चिक्कार]
(क) मरत असुर चिकार पारयौ मारयौ नंदकुमार।
(ख) गर्जनि पणव निसान संख हय गय हींस चिकार - १० उ. २।
[सं. चीत्कार, प्रा. चिक्कार]
चिकना घड़ा :- निर्लज या बेहया।
चिकने घड़े पर पानी पड़ना (न ठहरना) :- अच्छी बात या उपदेश का कुछ असर न होना।
चिकना चुपड़ा :- बना-ठना, छैला।
चुपड़ी (बातें) :- बनावटी स्नेह की मीठी मीठी बातें जो फुसलाने या धोखा देने के लिए की जाय।
चिकना मुँह :- (१) सजा-सजाया।
(२) धन या पदवाला।
चिकने मुँह का ठग :- वह धूर्त जो देखने में भला जान पड़े।
चिकने मुँह को चूमना :- धनी-मानी का आदर करना।
चिकनी चुपड़ी या मीठी-मीठी बातें कहने वाला।
चित महिं और कपट अंतर गति ज्यौं फज, नीर खोर चिकनाई - ३३१०।
घी तेल जैसे चिकने पदार्थ।
[हिं. चिकना + ना (प्रत्य.)]
[हिं. चिकना + ना (प्रत्य.)]
[हिं. चिकना + ना (प्रत्य.)]
स्नेह पूर्ण या प्रेमयुक्त होना।
[हिं चिकना + पन (प्रत्य.)]
सारंगी की तरह का एक बाजा।
रोग दूर करने का उपाय करनेवाला, वैद्य।
रोग दूर करने की युक्ति या क्रिया।
वैद्य का व्यवसाय या कार्य।
वैद्य के बैठने का स्थान, दवाखाना, अस्पताल।
खेत जोतने पर निकाली हुई घास।
खेत जोतते समय घास निकालना।
चिखुरने की क्रिया या मजदूरी।
चिचिंगा, चिचिंड, चिबिंडा, चिविंडी, चिचेंडा
एक बेज जिसके फज्ञों की तर कारी होती है।
वनकौरा पिंडीके चिचिंडी। सीप पिंडारू कोमल भिंडी - ३६६।
रेंगने वाले जंतु, सरीसृप।
गोदने का काम कराना या गोदने की प्रेरणा देना।
हद बाँधना, पतली . दीवार से घेरना।
जमा-खर्च या लेनदेन की बही, खाता या लेखा।
प्रति सप्ताह था मास की मजदूरी में बटनेवाला धन।
कच्चा चिट्ठा :- पूरा पूरा और ठीक ठीक भेद।
कच्चा चिट्ठा खोलना :- भेद को ब्योरे के साथ प्रकट करना।
कपड़े-कागज आदि का छोटा टुकड़ा।
सूखने पर जगह जगह फटना या दरकना।
चिढ़ने या चिड़चिड़ाने का भाव।
चिड़िया का दूध :- अप्राप्य वस्तु।
चिड़िया चोथन (नोचन) :- चारो तरफ का तकाजा या झंझट।
चिड़िया फँसना :- किसी मालदार को अपने पक्ष में करना।
सोने की चिड़िया :- (१) धनी असामी।
(२) सुंदर या प्रिय पात्र।
चिड़ियाँ पकड़नेवाला, बहेलिया।
[हिं. चिड़िया + हार (प्रत्य.)=मारना]
चिढ़ निकालना (पकड़ना) :- कुढ़ाना, खिझाना, चिढ़ाने की बात पकड़ना।
खिझाने की लिए भद्दी नकल बनाना।
अजित करने के लिए हँसी उड़ाना।
चित उचटना :- जी न लगना।
चित करना :- इच्छा होना।
चित कीन्हो :- इच्छा हुई।
उ. - द्वादस बन अवलोक मधुपुरी तीरथ कौं चित कीन्हौ-सारा ८२७।
चित चढ़ना :- ध्यान रहना, याद आना।
चित चुराना :- मन हरना।
चित चोरै :- मन हरता या मोहित करता है।
उ. - रमकत झमकत जनकसुता सँग हाव - भाव चित चोरैसारा. ३१०।
चितहिं चुरावति :- मन हरती है।
उ. - नैन सैन दै चितहिं चुरावति यहै मंत्र टोना सिर डारि।
चित देना :- ध्यान देना, मन लगना।
चित दे :- ध्यान देकर।
उ. - (क) चित दै सुनौ हमारी बात।
(ख) बिनती सुनौ दीन की चित दै कैसे तुव गुन गावै - १ - ४२।
चित धरना :- (१) मन लगाना।
(२) मन में लाना।
चित धार (सुनौ) :- ध्यान से (सुनो)।
उ. - कहौं सो कथा सुनौ चित धार।
चित न धरौ :- ध्यान मत दो, मन में न लाओ।
उ. - हमारे प्रभु औगुन चित न धरौ - १ - २२०।
चित धरि राखे :- स्मरण रखे, ध्यान में रखे।
उ. - जब वह बिप्र पढ़ावै कुछ कुछ सुन कै चित धरि राखै - सारा. ११०।
चित पर चढ़ना :- (१) बार बार ध्यान में आना।
(२) याद होना।
चित बँटना :- ध्यान इधर - उधर होना।
चित बँटाना :- ध्यान एक ओर न रहने देना।
चित में बैठना :- जी में पैठ जाना, मन में दृढ़ होना।
चित बैठयौ :- हृदय में (यह विचार) दृढ़ हो गया है।
उ. - अब हमरे चित बैठ्यो यह पद होनी होउ सो होउ।
चित में आना (होना, में होना) :- इच्छा होना, जो चाहना।
चित में आई :- इच्छा हुई, जी चाहा।
उ. - खेलत खेलत चित में आई सृष्टि करन विस्तार - सारा, ५।
चित होत :- ईच्छा होती है।
उ. - यह चित होत जाउँ मैं अबही यहाँ नहीं मन लागत।
चित न रहना :- जी उचाट होना।
चित न रहै :- जी घबराता है, मन नहीं लगता।
उ. - तब ही तैं ब्याकुल भइ डोलति चित न रहै कितनों समझाऊँ - १६५४।
चित लगना :- (१) जी न घबराना।
(२) ध्यान बना रहना।
चित लाग्यौ :- ध्यान बना रहता है।
उ. - (क) गुरु दच्छिना देन जब लागे गुरुपत्नीं यह मौंग्यौ। बालक बहेउ सिंधु में हमरो सो नित प्रति चित लाग्यौ - सारा, ५३६।
(ख) उफनत तक्र चहूँ दिति चितवति चित लाग्यौ नंदलालहिं - ११८१।
चित लेना :- जी चाहना।
चित से उतरना :- (१) भूल जाना।
(२) प्रेम या आदर का पात्र न रहना।
चित से नहिं उतरत :- ध्यान नहीं भूलता, याद बनी रहती है।
उ. - सूर स्याम चित तें नहिं उतरत वह बन कुज थली।
चित से न टलना :- न भूलना।
चित तें टरत नहीं ध्यान से नहीं हटती, कभी भूलती नहीं, बराबर याद आती है।
उ. - सूर चित तैं टरत नाहीं राधिका की प्रीति।
पीठ के बल गिरा या पडा हुआ।
पीठ के बल गिरा या पड़ा हुआ।
चित करना :- कुश्ती में हराना।
चारो खाने चित :- (१). हाथ पैर फैलाये पीठ के बल गिरा हुआ।
(२) हक्का - बक्का।
चित् होना :- बेहोश होना।
देखी जाइ मथति दधि ठाढ़ी, आपु लगे खेलन द्वारे पर। फिरि चितई, हरि दृष्टि गए परि, बोलि लए हरुऐ सूनैं घर - १० - ३०१।
(कसू' रघुराइ चिते हनुमान दिसि, आइ तन तुरत ही सीस नाया - ९ - १०६।
(ख) देखत नारि चित्र सी ढाढ़ी चितए कुँ अर कन्हाई - २५३३।
एक यमराज जो पाप-पुण्य का लेखा रखते हैं।
सूरदास चातक भई गोपी कहाँ गए चितचोर - ३०८४।
(क) कमल खंजन मीन मधुकर होत है चितभंग।
(ख) मेरौ मन हरि चितवन अरुझानौ। -। सूरदास चितभंग होत क्यों जो जिहिं रूप समानौ - २२८५।
होश ठिकाने न रहना, भौचक्कापन, मतिभ्रम।
[हिं. चितरना + हार (प्रत्य.)]
देखता (है), अवलोक कर, देखते देखते।
(क) सिर पर मीच, नीच नहिं चितवत, आयु घटति ज्यौं अंजुलि पानी१ - १४९।
(ख) ज्यों चितवत ससि ओर चकोरी, देखत ही सुख मान - १ - १६९।
कंधनि बाँह धरे चितवति - २५३५।
सचेत या सावधान करना, होशियार करना।
सतर्क, सावधान, या होशियार करने की क्रिया।
ताकने का भाव या ढंग, दृष्टि, कटाक्ष।
(क) चितवन रोके हूँ ने रही - १२७०।
(ख) मेरौ मन हरि चितवन अरुझानौ - २२८५।
चितवन चढ़ाना :- क्रोध से घूरना।
चितवन देत-देखने देना, निगाह डालने देना।
नाहिं चितवन देत सुत - तिय नाम नौका ओर - १ - ९९।
देखने का ढंग, दृष्टि, कटाक्ष।
(क) अंजन रंजित नैन चितवनि चित चोरे, मुख सोभा पर वा अमित असम - सर - १० - १५१।
(ख) बाल सुभाव बिलोल बिलोचन, चोरतिचितहिं चारु चितवनियाँ - १० - १०६।
देखता है, दृष्टि डालता है।
चितवै कहा पानि - पल्लव पुट, प्रान प्रहारौं तेरो - ९ - १३२।
देखता हूँ, ताकता हूँ, अवलोकता हूँ।
हौं पतित अपराध। पूरन, भरयौ कर्म - विकार। काम - क्रोध अरु लोभ चितवौं, नाथ तुमहिं विसार - १ - १२६।
शव-दाह के लिए बिछाथी गयी लकड़ियों को ढेर।
(१) शव - दाह के लिए बिछायी गयी लकड़ियों को ढेर।
वह कौड़ी जिसकी पीठ चिपटी होती है। और जो फेकने पर चित अधिक पड़ती है।
अंतर्यामी वहौ न जानत जो मो उरहिं बिती। ज्यों जुआरि रस बींधि हारि गथ सोचत पटकि चिती - १० उ. - २०३।
[हिं. चित्ती या चित = पीठ के बल पड़ा हुआ]
(क), राधा ये ढंग हैं री तेरे, वैस हाल मथत दधि कीन्हे, हरि मनु लिखे चितेरे - ७१८।
(ख) चकित भई देखें ढिग ठाढ़ी। मनौ चितेरौं लिखि लिखि काढ़ी - ३९१।
(क) नैंकु वितै, मुमक्याइ कै, सबकौ मन हरि लीन्हो (हो) - १ - ४४।
(ख) चितै रघुनाथ बदन की ओर - ९ - २३।
(ग) अति कोमल। तन चितै स्याम कौ बार - बार पछितात - १० - ८१।
रस्सी का मेंडरा, इँडरी, बिड़वा।
काहू की छीनत हौ गेडुरी काहू की फोरत हो गगरी - ८५३।
रबर, चमड़े आदि का छोटा-गोला जिससे लड़के खेलते हैं, कंदुक।
लै कर गेंद गये हैं खेलन लरिकन संग कन्हाई - सा. १०२।
गेंदे के फूल की तरह पीला।
चिंता मानि, चितै अंतरगति, नाग - लोक कौं धाए - १ - २९।
तब से कर तप को निकसे चितै कमलदल नैन - सारा. ६६।
देखना, तकना, निहारना, दृष्टि मिलाना।
चितैबौ छाँड़ि दै री राधा। हिल - मिल खेलि स्यामसुंदर सौं, करति काम कौ बाधा - ८२०।
सावधान करने या चिताने की क्रिया।
अंत:करण का एक भेद या वृत्ति।
वह मानसिक शक्ति जिससे धारणा, भावना आदि की जाती है; जी, मन।
चित्त उचटना :- जी न लगना।
चित करना :- जी चाहना।
चित्त चढ़ना (पर चढ़ना) :- (१) मन में बसना।
(२) याद पड़ना।
चित्त चुराना :- मन मोहना।
चित्त चुराइ :- मुग्ध करके, मोहित करके, आकर्षित करके।
उ. - हरे खल - बल दनुजमानव सुररान सीस चढ़ाई। रचि - बिरुचि - मुख - भौंहछबि, लै चलति चित्त बुराइ - १:५६।
चित्त चोराए :- मन हर लिया।
उ: - सूर नगर नर नारि के मन चित्त चोराए - २५६५।
चित्त देना :- गौर करना, ध्यान देना।
चित्त धरना :- (१) ध्यान देना।
(२) मन में लाना।
चित्त बँटना :- ध्यान इधर-उधर होना।
चित्त बँटाना :- ध्यान इधर-उधर करना।
चित्त में धँसना (जमना, बैठना) :- मन में दृढ़ होना।
चित्त होना (में होना) :- जी चाहना।
चित्त लगना :- (१) जी न ऊबना।
(२) प्रेम होना।
चित्त से उतरना :- (१) भूल जाना।
(२) प्रेम या आदर का पात्र न रहना।
चित्त से न टलना :- बराबर ध्यान बना रहना।
विचित्र या अद्भुत कार्य करनेवाला।
कौड़ी जिसकी पीठ चिपटी हो, टैयाँ।
[हिं. चित = पीठ के बल पड़ा हुआ]
एक प्राचीन नगर जो उदयपुरी महाराणाओं की राजधानी थी।
[सं. चित्रकूर, प्रा. चित्तऊड़, चितउड़]
चंदन अथवा अन्य किसी सुगंधित पदार्थ या भस्म से माथे, छाती या बाहु आदि अंगों पर बनाये हुए चिह्न।
गुहि गुंजा घसि बनमुद्रा, अंगनि चित्र ठए - १० - २४।
विविध रंगों के मेल से बनायी हुई आकृतियाँ, तसवीर।
काव्य का एक अंग जिसमें व्यंग्य की प्रधानता रहती है।
एक अलंकार जिसमें पदों के अक्षर इस क्रम से लिखे जाते हैं कि रथ, कमल अदि के आकार बन जायँ।
चित्र के समान ठीक, दुरुस्त।
चित्रित करना, चित्र बनाना।
चित्र बनाने का कपड़ा, कागज आदि आधार।
वह वस्त्र जिस पर चित्र बने हों।
आँख की पुतली का पिछला भाग जिसपर प्रकाश की किरणें पड़ने पर पदाथों के रूप दिखायी देते हैं।
रंग-बिरंगे या विचित्र पंखवाला।
वाणासुर की कन्या ऊषा की सहेली जो चित्रकला में बहुत निपुण थी।
कुँअर तन स्याम मानो काम है दूसरो सपन में देखि ऊषा लोभाई। चित्ररेखा सकल जगत के नपन की छिन में मुरति तब लिखि देखाई - १० - उ. ३४।
चित्र, चित्र बनाने की कला।
ऐसे कहैं नर नारि बिना भीति चित्रकारि काहे को देखें मैं कान्ह कहा कहौ सहिए - १२७३।
[हिं. चित्रकार+ई (प्रत्य.)]
[हिं. चित्रकार+ई (प्रत्य.)]
काव्य का एक ढंग जिसमें अक्षरों को ऐसे क्रम से रखते हैं कि कमल, रथ आदि के चित्र बन जायें।
बाँदा जिले का एक पर्वत जहाँ वनवास-काल में राम-सीता ने बहुत समय तक वास किया था।
एक राजा जिसके पुत्र को उसकी छोटी रानियों ने जहर देकर मार डाला और पुत्रशोक से जिसे दुखी देख नारद ने मंत्रोपदेश दिया था।
वइ जो चित्रित पताका लिये हो।
चौदह यमराजों में एक जो प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखा रखते हैं।
चित्र या दृश्य अंकित करना, चित्रित करने की क्रिया।
सत्यवती और शांतनु का एक पुत्र।
चित्रवाहन की कन्या जो अर्जुन को ब्याही थी।
चित्रों के संग्रह का स्थान।
चित्रकला सिखाने का स्थान।
वह स्थान जहाँ चित्रों का संग्रह हो अथवा दीवालों पर चित्र बने हों।
सजा हुआ भवन, विलास भवन, रंगमहत्व।
कबहुँ क रत्न महल चित्रसारी सरद निसा उजिंयारी। बैठे जनकसुता सँग बिलसत मधर केलि मनु हारी - सारा, ३१२।
चित्र में अंकित किया हुआ।
चित्र में अंकित व्यक्ति या पात्र के समान।
जिसके अंग पर चित्तियाँ हों।
गेंदे के फूल की तरह पीला रंग।
एक पौधा जिसमें पीले फूल लगते हैं।
(क) कर राजति गेंदुकि नौलासी - २४४१।
(ख) फूलन के गेंदुकि नवला सजि कनक लकुटिया हाथ - २५०२।
(क) तैसेहिं सूर बहुत उपदेसैं सुनि सुनि गे कै बार - १ - ८४।
(ख) बाचर खचर हार गे बनचर - सा, ११५।
बाणासुर की कन्या ऊषा की सखी।
चित्र बनने बिकने का स्थान।
चित्रों के संग्रह का स्थान।
चित्र बनने बिकने का स्थान।
विचित्र या सुंदर नेत्रवाला। |
चित्रयुक्त, जिस पर चित्र बने हों।
चित्रित बाँह, पहुँचिया पहुँचे, साथ मुरलिया बाजे - ४५१।
सांगोपांग वर्णन से युक्त।
जिसपर चित्तियाँ पड़ी हों।
चित्र बनाये, चित्रित किये।
बेनी लसति क छबि ऐसी महलन चित्रे उर्ग - २५६२।
वह बात जो अलंकृत भाषा में कही जाय।
एक अलंकार जिसमें प्रश्न में ही उत्तर हो अथवा कई प्रश्नों का एक ही उत्तर हो।
लज्जित करना, नीचा दिखाना।
चैतन्यस्वरूप ब्रह्म की माया।
[सं. चूण, हिं. चुन+ अंगार]
दहकती आग से उड़नेवाले कण।
[सं. चूण, हिं. चुन+ अंगार]
आँख से चिनगारी छूटना :- क्रोध से आँख लाल होना।
चिनगारी छोड़ना (डालना) :- झगड़े वाली बात करना।
पंजाब की एक नदी जिसका प्राचीन नाम चन्द्रभागा था।
पह चानने का लक्षण, पहचान, संकेत का नाम।
अपनी गाई ग्वाले सब प्रानि करौ इकठौरी। धौरी, धूमरि, राती, रौंछी, बोल बुलाइ चिन्हौरी ४४५।
[सं. चिन्ह, दिं. चिन्हारी]
ल सीली वस्तु से जुड़ना या सटना।
किसी व्यवसाय या काम में लगना।
काम-धंधे या व्यापार में लगाना।
लसीली वस्तु छूने से होने वाला शब्द या अनुभव।
लसदार या चिपचिपा मालूम होना।
चिपचिपाने का भाव, लसीलापन, लस।
मेचक अधर निमेष पिक रुचि सों चिह्न देखि तुम्हारे - २०८८।
पहचान करा देना, पहचनवाना।
चीन्हने की वस्तु, पहचान, लक्षण।
जान पहचान का, जिससे जान-पहचान हो, परिचितं।
सोच लाग्यौ करन, यई धौं जान की, कै कोऊ और, मोहिं नहिं चिन्हारा - ६ - ७६।
वह मनुष्य जिसकी नाक चपटी हों।
छोटा टुकड़ा। लकड़ी की सूखी पपड़ी।
बाँसा, बटेर, लव और सिचान। धूती चिपिका चटक भान।
सयानी लड़की जो पिता के घर रहे।
सूरदास चिर जीवहु जुग जुग दुष्ट दले दोउ नंददुलारे२५६६।
(ख)कबहुँक कुल - देवता मनावति, चिर जीवहु मेरों के वर कन्हैया - १० - ११५।
(ग) चिर जीवहु जसुदा कौ नंदन, सूरदास कौं तरनी - १० - १२३।
(घ) देत असीस सूर, चिरजीवौ रामचंद्र रनधीर ६ - २८।
(च) चिरजीवी सुकुमारं पवन - सुत, गहति - दीन ह्व पाइ - ६ - ८३।
चिड़चिड़ाना, क्रुद्ध होना।
बहुत दिनों.तक जीवित रहनेवाला चिरजीवी।
(क) जब लगि जिय घट - अंतर मेरै, को सरवरि करि पावै ? चिरंजीव तौलौं दुरजोधन, जियत न प करयौ अवै - १ - २७५।
(ख) चिरंजीव रहौ सूर नंदसुत जीजत मुख चितए - ३१४१।
गिराते हैं, नीचे डालते हैं।
ढालते हैं, उँडेलते हैं, मूँदते हैं।
बारंबार जगावति माता, लोचन खोलि पलक पुनि गेरत - ४०५।
पशुओं के गले पर लिपटा हुआ रस्सी का भाग।
गेरू के मटमैले लाल रंग का।
[हिं. गेरू + अ (प्रत्य.)]
गेरू में रंगा हुआ, जोगिया, भगवा।
[हिं. गेरू + अ (प्रत्य.)]
चिराग गुल होना :- (१) दीपक बुझना।
(२) रौनक न रहना।
(३) वंश का नाश होना।
चिराग जले :- संध्या समय।
चिराग ठंडा करना :- दीपक बुझाना।
चिराग तले अँधेरा :- (१) ऐसे स्थान पर बुराई होना जहाँ उसे रोकने का प्रबंध हो।
(२) ऐसे व्यक्ति द्वारा बुराई होना जो उसे रोकने पर नियुक्त हो।
हम तौ तबही हैं जोग लियौ। पहिरि मेखला चीर चिरातन पुनि पुनि फेरि सिआए - ३१२५।
मांस आदि के जलने की दुर्गंध।
बहुत दिनों तक जीवित रहनेवाला।
अश्वत्थामा, बलि, व्यास. हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम जो चिरजीवी माने जाते हैं।
लकीर के रूप में घाव होना।
चीरना, चिरने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
बहुत समय तक। स्मरण रखने योग्य।
चिरने का भाव, क्रिया या मजदूरी।
खरिक, दाख अरु गरी चिरारी। पिंड बदाम लेहु बनवारी - ३६६।
(क) चिरिया कहा समुद्र उलीचे - १ - २३४
(ख) सूरस्याम: कौं जसुमति बोधत गगन चिरैया उड़त दिखावत - १० - १८८।
चिड़ियाँ फँसानेवाला, बहेलिया।
[हिं. चिड़िया + हारे = वाला (प्रत्य)]
पियाले वृक्ष के फलों के बीज की गिरी जो मेवों में समझी जाती है।
श्रीफल मधुर चिरौंजी श्रानी - १० - २११.
मिट्टी की कटोरी जिसका निचला भाग नली की तरह होता है। इस पर आग रखकर तंबाकू पी जाती है।
बाँस की तीलियों से बना परदा, चिक।
चिल्ले का जाड़ा :- चालीस दिन की बहुत अधिक जाड़े का समय।
दर्द का उठना और बंद होना।
चित्त चिहुँटना :- चित्त में चुभना, मन स्पर्श करना।
(क) तरुवर मूल अकेली ठाढ़ी, दुखित राम की घरनी। बसन कुचील, चिहुर लपटाने, बिपति जाति नहिं बरनी–६ - ७३।
(ख) छूटे चिहुर बदन कुम्हि लाने ज्यौं नलिनी हिमकर की मारी - ३४२५।
निशान, संकेत, लक्षण।
दाग।
किसी के विरोध में किया हुआ शब्द या कार्य।
गहने-कपड़े जो भाई द्वारा बहन को इसकी संतान के विवाह में दिये जायें।
[सं. चमत्कृ, प्रा. चाँकि]
चुटकी काटना, चिकोटी लेना।
हेरत चीत :- चित्त हरता है, मन मोहता है।
उ. - संग रहत सिर मेलि उगौरी, हरत अचानक चीत - २७३०।
मटमैलापन लिये हुए एक तरह की लाल मिट्टी।
जैसे कंचन काँच बराबर गेरू काम सिदूर - २६८३।
(क) बिदुर - गेह हरि भोजन पाए - १ - २३६।
(ख) करि दंडवत चली ललिता जो गई राधिका गेह - १.२३६ और सारा. ९२०।
तुम रानी वसुदेव गेहनी हौं गँवारि ब्रजबासी - २७१०।
मुँह की इल भलई मोहू सो करन आये जिय की जासों ताही। सो तुम बिन सूनो वाको गेहरा - २००१।
चित्रित करती है, (चित्र या बेल-बूटे आदि) खीचती है।
द्वार बुहारति फिरति अष्टसिधि | कौरनि सथियो चीततिं नवनिधि - १० - ३२।
चित्रित करना, तसवीर या बेल-बूटे बनाना।
[सं. चीन = देश+ई (प्रत्य.)]
पहचान, पता, लक्षण, संकेत।
छिन में बरषि प्रलय जल पारौ खोजु रहै नहिं चीनौ - ६४५।
श्री भागवत सुनी नहिं स्रवननि, गुरु - गोबिद नहिं चीनौ - १ - ६५
चीन्ह लीन्हौ-क्रि. स.-पहचान लिया।
बहुरि.जब बढ़ि गयौ, सिंधु तब लै गयौ, तहाँ | हरि - रूप नृप चीन्ह लीन्हौ - ८ - १६।
(क) अब तौ घात परे हौ लालन, तुम्हें भले मैं चीन्ही - १० - २६७
(ख) ओछी बुद्धि जसोदो कीन्ही। याकी जाति अबै हम चीन्ही - १० - ३६१।
(ग) जाहु थरहि तुमकौं मैं चीन्ही। तुम्हरी जाति जान मैं लीन्ही १० - ७९६।
(क) अँधियारी आई तहँ भारी। दनुज - सुता तिहि तैन निहारी। बसन सुक्र - तनया के लीन्हें। करत उतावलि परे न चीन्हे - ६ - १७४।
(ख) निसि चिन्ह चीन्हे सूर स्याम रति भीने ताही के सिधारो पिय जाके रंग |राचे - १९०३।
जब भगत भगवंत चीन्है, भरम मन ते जाइ - १ - ७०।
(क) नेकु न राखौ ताको चीन्हो - १०४३।
(ख) कैसे सूर अगोचर लहिए निगम न पावत चीन्हौ - ३०३४।
तिनको कहा परेखो कीजै कुबजा के मीता को। चढ़ि - चढ़ि सेज सातहुँ सिंधू बिसरी जो चीता को - ३३७६।
सोचा हुश्रा, विचार हुआ, अनुमानित।
डोलत ग्वाल मनौ रन जीते। भए सबनि के मन के चीते १० - ३२।
सचेत हुए, सोचा, विचार, (मन में) भावना हुई।
ऐसैहि करते बहुत दिन बीते। प्रभु अंतरजामी मन चीते। एक दिवस आपुन आए तहँ। नव तरुनी। असनान करत जहँ - ७६६।
(क) मेरौ चीत्यौ भयौ नंदरानी, नंद सुवन सुखदाई - १० - १६।
(ख) अपने - अपने मन कौ चीत्यौ, नैननि देख्यौ आइ - १० - २०।
(ग) हमरौ चीत्यौ भयौ तुम्हारें, जो माँग सो पाऊँ - १० - ३७।
किसी पदार्थ को धारदार औजार से फाड़ना।
बड़े देव सब दिन को चीन्हौ १००६।
बहुत जन्म इहि” बहु भ्रम कीन्ह्यौ। पै इन मोकौं - कबहुँ न चीन्ह्यौ - ४ - १२।
चिमड़ा, जो तोड़ने फोड़ने पर टूटे नहीं।
कंजूस. खसीस. जो किसी तरह गाँठ से पैसा न निकाले।
(क) लाज के साज मैं हुती ज्यौं द्रौपदी, बढ्यौ तन - चीर नहिं . अंत पायौ - १ - ५।
(ख) प्रातकाल असनान करन को जमुना गोपि सिधारी। लै कै चीर कदंब चढ़े हरि बिनवत हैं ब्रजनारी।
एक प्रकार का रंगीन कपड़ा जो पगड़ी बनाने के काम में आता है, पगड़ी।
मेरे कहैं विप्रनि बुलाइ, एक सुभ घरी धराइ, बागे चीरे बनाइ, भूषन पहिरावौ - १० - ६५।
गहि तन हिरनकसिप कौं चीरौं, फारि उदर तिहिं रुधिर नहैहौं - ७ - ५।
चीरयौ उदर पुत्र तब निकस्यौ - सारा, ६६४।
जिसकी आँखें छोटी-छोटी हों।
उलटपट कर ग्रंथ का अध्ययन करनेवाला
एक पत्थर जिसमे आकर्षण-शक्ति होती है।
आकर्षण-केंद्र, सुंदर पुरुष जिसके रूप में आकर्षण हो।
हरि चुंबक जहँ मिलहिं सूर प्रभु मो लै जाउ तहीं - २५४२।
चुंबक का गुण, भाव या कार्य।
बाहरी माल पर लगनेवाला महसूल।
आँखों को चौंधियाना या तिलमिलाना।
[हिं चौ= चार + . अंध= अंधा]
पैरि - पैरि प्रति फिरौ बिलोकत गिरि - कंदर - बन गेहु - ९ - ७३।
(क) लटकन सीस, कंठ मनि भ्राजत, मनमथ कोटि बारनैं गै री - १० - ५५।
(ख) सुर सुनि स्रवन तजि भवन करि गवन मन रवन तनु तबहिं कहँ सुगति गै री - १९०४।
हेरि दै - दै ग्वाल - बालक कियौ जमुन - तट गैन - ४२७।
कबहुँक ठाढे होत टेकि कर, चलि न सकते इक गैन - १० - १०३।
चंगुल में फँसना :- हाथ या वश में होना।
कबहुँक माखन रोटी ले के खेल करत पुनि माँगत। मुख चुंबत जननी समुझावत आप कंठ पुनि लागत - सारा. १६७
चूमती है, चुंबन करती हैं।
मुँह, सर और आँखों से लगाती है।
इतनी सुनत कति उठि धाई, बरषत लोचन नीर। पुत्र - कबंध अंक भरि लीन्हौ, धरति न इक छिन धीर। ले लें कौन हृदय लपटावति, चुबति | भुजा गॅभीर - १ - २९।
मावेश में होंठों से दूसरे के हाथ, गाल आदि का स्पश करने की क्रिया, चुम्मा।
(क) सूर प्रभु कर गहति ग्वालिनि चारु चुबन हेतु - १० - १८४।
(ख)कबहुँक मुख भारि बन देत - १५६३।
(ग) दै चुवन हरि सुख लियौ - १८२७।
देखिअत चहुँ दिसि नैं घर धोरे। स्याम सुभग तनु चुअत गंड मद बरबस थोरे थोरे - २८१८।
टपकाने का काम, भाव या मजदूरी।
कछु वै कहती कछू कहि अवित प्रेम पुलकि सम स्वेद चुई - १४३३,
[सं. च्युत्कृत, प्रा. चुक्कि]
[सं. च्युत्कृत, प्रा. चुक्कि]
[सं. च्युत्कृत, प्रा. चुक्कि]
[सं. च्युत्कृत, प्रा. चुक्कि]
व्यर्थ होना. लक्ष्य पर न पहुँचना।
[सं. च्युत्कृत, प्रा. चुक्कि]
समाप्ति सूचक संयोज्य क्रिया।
ऋण का अदा होना, गज की सफाई।
[हिं. दुकाना+ता (प्रत्य.)]
भरि अपने कर कनक कचोरा पिवति प्रियहिं चुखाए १० उ. ३८।
गाय के थन से दूध उतारने के लिए बछड़े को पिलाना।
चिड़ियों का चोंच से दाना बीनना और खाना।
पीठ पीछे निंदा | करने या इधर की उधर लगानेवाला।
पीठ पीछे निंदा या शिकायत करनेवाली।
ब्रजनारी बटपारिनि हैं सब चुगली ... आपुहिं जाइ लगायौ - ११६१।
पीछे पीछे की निंदा या शिकायत।
जैसैं बधिक | चुगाइ कपट कन पीछे करत बुरी - २७१७।
चुगने या चुगाने का भाव, क्रिया या मजदूरी।
[हिं. चुगाना+आई (प्रत्य.)]
(चिड़ियों को) दाना खिलाने से।
कहा होत पय - पान कराएँ, बिष नहिं तजत भुजंग। कागहिं कहा कपूर चुगाएँ, स्वान न्हवाएँ गंग - १ - ३३२।
चुगुल, ज्वारि, निर्दय, अपराधी, झूठौ, खोटौ| खूटा - १ - १८६।
ऐसे डरति रहति हैं वाकौ चुगुली जाइ करैगौ - १६६५।
पुचकारकर, दुलार-प्यार दिखाकर।
मैया बहुत बुरी बलदाऊ। कहन लग्यौ बन बड़ौ तमासौ, सब मौड़ा मिलि आऊ। मोहूँ कौं चुचकारि गयौ लै, जहाँ सघन बन झाऊ। भागि चलौ, कहि, गयौ उहाँ हैं, काटि खाइ रे हाऊ - ४८१।
पुचकारती हैं, चुमकारती है, दुलराती है।
तब गिरत - परत उठि भागै। कहुँ नैंकु निकट नहिं लागै। तव नंद घरनि चुचकारै। वहु बलि जाउँ तुम्हारै - १० - १८३।
अरुन अधर सु स्रमित मुख बोलत पद कछु मुसुकात री। मानहु सुपक विंब ते प्रगटत, रस अनुराग चुचात री२३१३।
बूंद बूंद टपकने, चूने या निचुडने (लगे)।
जसुमति मात उछंग लगाये बल मोहन को आय। बाल - भाव जियमें सुधि आई, अस्तन चले चुचाय - सारा, ७१७।
सुखकर इस तरह सिकुड़ना कि झुर्रियाँ पड जायें।
सूखकर इस तरह सिकुड़ना कि झुर्रियाँ पड़ जायें।
[सं. शुष्क+ना (प्रत्यं, )]
वै देखि निरखि नमित मुँरली पर कर मुख नयन एक भए वारे। मैन सरोज बिधु बैर बिरंचि करि करत नाद बाहन चुचुकारे १३३३।
(साग, फूल आदि); चुटकी से तोड़ना।
चुटकी देना :- चुटकी बजाना।
चुटकी देहि, चुटकी दै दै - चुटकी देकर।
उ. - (क) चुटकी देहिं नचावहीं, सुते जानि नन्हैया - १०११६।
(ख) जो मूरति जल - थल में व्यापक निगम न खोजत पाई। सो मूरति तू अपन आँगन चुटकी दै दै नचाई।
(ग) चुटकी दै - दै ग्वाल नचावत१० - २१५।
चुटकी बजाते :- चटपट।
चुटकी बजाने वाला :- खुशामदी।
चुटकी भर :- बहुत थोड़ा।
चुटकियों में :- बहुत शीघ्र।
चुटकियों में (पर) उड़ाना :- कुछ परवाह न करना।
चुटकी भरना (लेना) :- (१) हँसी उड़ाना।
(२) चुभती हुई बात कहना।
(३) चुटकी से दबाना, कुरेदना या काटना।
उ. - बार बार गहि गहि निरखत घूँवट ओट करौ किन न्यारौ। कबहुँक कर परसत कपोल छुइ चुटकि लेत ह्याँ हमहिं निहारौ।
पैर की उंगलियों का छल्ला।
विनोद और चमत्कार पूर्ण बात।
दवा का नुस्खा जो बहुत सस्ता और कारगर हो।
[हिं. गैन = गमन + ई (प्रत्य.)]
वेणी के ऊपर लगाने का एक गहना।
चोटी, शिखा, बालों की गुंथी हुई लट।
अरस - पस चुटिया गहैं, बरजति है माई - १० - १६२।
(किसी की) चुटिया हाथ में होना :- अपने अधीन, नीचे या वश में होना।
चुटुकि बजवति :- चुटकी बजाती हैं।
उ. - चुटुक बजावति नचावति जसोदा रानी, बाल| केलि गावति मल्हावति सुप्रेम भर - १० - १५१।
चूड़ी बेचने का व्यवसाय करनेवाला।
[हिं. चूड़ी+हार (प्रत्य.)]
[सं. चूड़ा = चोटी+हार (प्रत्य.)]
[सं. चूड़ा = चोटी+हार (प्रत्य.)]
[सं. चूड़ा = चोटी+हार (प्रत्य.)]
एक समय मोतिन के धोखे हंस चुनत है। ज्वारि - पृ. ३४३।
फूल आदि चुटकी से नोच कर अलग करना।
सूरदास मुकुताहल भोगी हंस ज्वारि को चुनही - ३०१३।
चुनने की क्रिया यी मजदूरी।
किसी के पक्ष में मत देने की क्रिया।
छोटी डिबिया जिसमें पान का चूना रखा जाता है।
[हिं. चूना+ औटी (प्रत्य.)]
मदन नृपति को देस महामद बुधिबल बसि न सकत उर चैन। सूरदास प्रभु दूत दिनहि दिन पठवत चरित चुनौत दैन - १३१३।
युद्ध के लिए ललकार या प्रचार।
चुनने का .. काम करनेवाले।
सूर सुगंध चुनावनहारे कैसे दुरत दुराए - १२३३।
[हिं. चुनना+इंदा (प्रत्य.)]
[हिं. चुनना+इंदा (प्रत्य.)]
[हिं. चुनना+इंदा (प्रत्य.)]
ऐसें बसिऐ ब्रज की बीथिनि। ग्वारनि के पनबारे चुनिं - चुनि, उदर भरीजै सीथिनि - १० - ४९०।
हंस उज्वल पंख निर्मल, अंग मलि - मलि न्हाहिं। मुक्ति - मुक्ता अनगिने फल, तहाँ चुनि - चुनि खाहिं - १ - ३३८।
फूले फूले मग धरे कलियाँ चुनि डारे - २०६७।
मरुवेति मानिक चुनी लागी बिच बिच हीरा तरंग - २२८१।
चुपके से :- शांत भाव से, गुप्त रूप से।
चुपकी लगाना :- शांत रहना।
थोड़े पानी से धोकर पोंछनी।
करि मनुहारि कलेऊ दीन्हौ, मुख चुपरयौ अरु चोटी - १० - १६३।
कम बोलनेवाला, जो सदा शांत रहे।
जो मन की बात न कहे, घुज्ञा।
मुँह में रखकर। धीरे धीरे रस या स्वाद लेना।
चमकी या सितारे जो स्त्रियाँ माथे या गाल पर चिपकाती हैं।
चुप करना :- (१) बोलने न देना।
(२) मौन रहना।
चुप मारना, लगाना :- मौन रहना।
पूजा करत नंद रहे बैठे, ध्यान समाधि लगाई। चुपकहिं अनि कान्ह मुख मेल्यौ, देखौ देव - बड़ाई - १० - २६२।
सूखी चीज के टूटने का शब्द।
(क) मुष्टिको गर्द मरदि चार गूर चुरकुट करयौ कंस मनु कंप भयौ भई रंगभूमि अनुराग रागी - २६०६।
(ख) रामदल मारि सो वृक्ष चुरकुट कियो द्विविद सिर फट गयौ लगत ताके - १०.४५ !
चुरचुर शब्द करके टूटनेवाला।
चूर-चूर करना। चुर-चुर शब्द करना।
जो अपने दायित्व का ध्यान न रखे।
जो नित्य नियम के विरुद्ध हो।
टरति न टारे यह छवि मन में चुभी - १४४६।
मुग्ध या अकृष्ट करनेवाला।
मन में खटकना या चोट पहुँचाना।
मन में बस जना या बना रहना।
मन में बसकर या बेनी रहकर।
मन चुभि रही माधुरी मूरति अंग अंग उरझाई-३३१७।
लेन-देन या काम में कमी करना।
महा अक्षय निधि पाइ अचानक आपुहिं सबै चुरावत हैं - पृ. ३३०।
सूर गए हरि रूप चुरावन उन अप बस करि पाए - पृ. ३२४।
घर - घर गोरस सोइ चुरावै - १० - ३।
चूडी का व्यवसाय करनेवाला।
[हिं. चूड़ी + हारों (प्रत्य.)]
(क) फूटी चुरी गोद भरि ल्यावै, फाटे चीर दिखावें गात १० - ३३२।
(ख) किंकिनी करि कुनित कंकन कर चुरी झनकार - पृ.३४४ (२६)।
(क) हँसि जननी चुरू भराए। तब कछु - क्छु मुख पखराए - १० - १८३।
(ख) भरयो चुरू मुख धोइ तुरतही | पीरे पान - बिरी मुख नावति - ५१४।
(ग) धरि तुष्टी झारी जल ल्याई। भरथौ चुरू खरिका लै आई।
यह पर तीति नहीं जिय तेरे सो कहा तोहि चुरेहौं - १२४३।
साधारण या गुप्त बात होना।
कुरकुरी वस्तु टूटने का शब्द।
तबहि निसिचर गयौं छल कंरिं, लई सीय चुराइ - ६ - ६०।
चित्त चुराना :- मन मोहित करना।
छिपाना, दूसरों की दृष्टि से बचना।
आँख चुराना :- सामने मुँह न करना।
चुल्लू भर :- जितना चुल्लू में आ सके।
चुल्लुओं रोना :- बहुत रोना
चुल्लू में समुद्र न समानो :- (१) छोटे पत्र में बहुत वस्तु न आना।
(२) साधारण व्यक्ति से महान कार्य न हो सकना।
(क) बिधु पर सुदंत बिध्वंत अमृत चुवत . सूर बिपरीत रति पीड़ि नारी - १६०३।
(ख) मुरली माहिं बजावत गावत बंगाली अधर चुवत अमृत बनवारी - २३६७।
(ग) देखी मैं लोचन चुवत अचेत - ३४५६।
टप कती हैं, बूंद बूंद करते गिराती हैं।
राँभति गाइ बच्छ हित सुधि करि, प्रेम उमॅगि थन दूध चुवा वत - ४८०।
[हिं. चूना' का प्रे. ‘चुवाना’]
निर्घन या साधनहीन हो जानः।
फुर्तीला, जिसमें आलस्य न हो।
(क) चिरई चुहचुहानी चंद की ज्योति परानी रजनी बिहानी प्राची पियरी प्रवीन की।
(ख) मैं जानी जिय जहँ रति मानी। तुम आए हौ ललना जब चिरियाँ चुहचुहानी।
(क) अजामील तौः बिप्र तिहारौ, हुतौ पुरातन दास। नैकें चूक तै यह गति कीनी, पुनि बैकंठ निवास - १ - १३२।
(ख) कौन करनी घाटि मोसौं, सो करौ फिरि काँधि। न्याई कै नहि खुनुस कीजै, चूक पल्लै बाँधि - १ - १६६।
(ग) घोष बसते की चूक हमारी कछु न चित गहिबो - ३४१५।
खट्टे फल के गाढे़ रस से बना एक पदार्थ।
[सं. च्युतकृत, प्रा. चुकि]
[सं. च्युतकृत, प्रा. चुकि]
चिड़ियों के बोलने का शब्द।
चू करना :- (१) कुछ कहना।
(२) विरोध में कुछ कहना।
वीथ्यो कनक परसि सुक संदर दुनै वीज गहि अँज।
पराया, -अजनबी, जो अपना न हो।
[हिं. चुहल+फ़ा. बाज (प्रत्य.)]
चूहा का स्त्रीलिंग तथा अल्पार्थक रूप।
पहिरे चीर सुहि सुरंग सारी चुडुचुहु चूनरी बहुरंगनो। नील लहँगा लाल चोली कसि उबरि केसरि। सुरंगनो - १२८०।
[सं. चूड़ा = बाहु - भूषण]
वधू की चूड़ियाँ। चूड़ाकरण,
[सं. चूड़ा = बाहु - भूषण]
बच्चे की पहली बार सर मुँडवाकर चोटी रखने का संस्कार, मूड़न।
हाथ में पहनने का एक गहना।
चूड़ियाँ ठंडी करना (तोड़ना) :- विधवा वेश बनाना।
चूड़ियाँ पहनना :- स्त्री-वेश बनाना (व्यंग्य)।
चूड़ियाँ बढ़ाना :- चूड़ियाँ अलग करना।
जिसमें चूडी या छल्ले की तरह घेरे पड़े हों।
(क) सूर स्याम को मिली धून हरदी ज्यौं रंग रजी - ११७३।
(ख) सूर स्याम मन तुमहिं लुभानो हेरद चून रँग रोचन - १५१७।
ओढ़ने का लाल रंगीन बूटियोंदार दुपट्टः।
(क) पहिरे राती चूनरी, सेत उपरना सोहै (हो) - १ - ४४।
(ख) पहिरि चुनि चुनि चीर चुहि चुहि चूनरी बहुरंग - २२७८।
[सं. च्युतकृत, प्रा. चुकि]
सूरदास अवसर के चूके, फिरि पछितैहौ देखि उधारी - १ - २४८।
(क) मुख चूमति अरु नैन निहारति, राखति कंठ लगाई - १० - ५२।
(ख) चूमति कर - पगअधर - भ्र, लटकति लाट चूमति - १० - ७४।
चूमति-चाटति-प्यार करती हुई, चूमचाटकर प्रेम जताती हुई।
लैं आई गृह चूमति चोटति, घर - घर सबनि बधाई मानी - १० - ७८।
महरि मुदित उलटाइ कै, मुख चूमन लागी - १० - ६८।
चूमकर छोड़ देना :- कार्य प्रारम्भ करके या वस्तु को छूकर छोड़ देना, पूरा उपयोग न करना।
चूमना-चाटना :- प्यार दिखाना।
चूम-चाट कर प्रेम जताना या प्यार दिखाना।
चूमकर, प्यार करके, चुम्मा लेकर।
(क) निरखि हरषि मुख चूमि के, मंदिर पग धारी - १० - ६६।
(ख) मुख चूमि हरषि लै आए - १० - १८३।
(क) बड़ौ मंत्र कियौ कुँवर कन्हाई। बार - बार लै कंठ लगायौ, मुख चूम्यौ, दियौ घरहिं पठाई - ७६१। (ख) काहू तुरत इ मुख चुम्यौ कर सौं छुयो कपोल - २४२७।
एक तीक्ष्ण भस्म जो पान में खाने, और औषध के काम आती है।
(छत लोटा आदि में) दराज या छेद होना जिससे पानी टपके।
धन भूषन धन मुकुट जरयौ नग हीरा चुनी सय नाल - पृ.३४२ (३६)।
गए - स्याम ग्वालिनि घर सूनें। माखन खाइ, डारि सबै गोरस, बासन फोरि किए सब चूनै - ६१७।
रंग कापे होते न्यारो हरद चूनो सानि - ८६५।
जरो पर चूनो :- जले पर चूना छिड़कना, जो विपत्ति में हो उसे और दुख देना।
उ. - वैसहिं जाइ जरो पर चूनो दूनो दुख तिहिं काल - ३१५६।
चूरा, बुरादा, भूर, महीन कण।
चूर चूर कर डाला तोड़-फोड़ डाला, नष्ट कर दिया।
उ. - जोगन डेढ़ बिटप बेली सब . चूर चूर कर डाल - सारा, ४१७।
किसी नशे से प्रभावित, मद-मत्त।
घृत मिष्टान्न सबै परिपूरन। मिस्रित करत पाग कौ चूरन - १००६।
तोड़-फोड़ डालना, बरबाद करना।
रोटी-पूरी का घी-शकर में मिलाकर भूना हुआ भोजन।
कड़ा नामक आभूषण जो बच्चों के हाथ-पैर में पहनाया जाता है।
तन अँगुली, सिर लाल चौतनी, चूरा दुहुँ कर पाइ - १० - ८६।
चूर करके, तोड़कर, नष्ट करके।
भंजन - शब्द प्रगट अति अद्भुत, अष्टदिसा नभ - पूरि। स्रवन - हीन सुनि भए अष्टकुल नाग गरबे भयौ चूरि - ९ - २६।
गूझा बहु पूरन पूरे। भरि - भरि कपूर रस चूरे - १० - १८३।
तोड़ा-फोड़ा या नष्ट किया हुआ।
गद्य को एक प्रकार जिसमें सरल शब्द और वाक्य हों।
लकड़ी का पतला सिरा जो दूसरी के छेद में ठोंका जाय।
चूलें ढीली होना :- बहुत थकावट होना।
नाटक का एक अंग जिसमें घटना होने की सूचना नेपथ्य से दी जाती है।
चूल्हा न्योतना :- घर भर को निमंत्रण देना।
चूल्हा जलाना (फेंकना, झोंकना) :- भोजन पकाना।
चूल्हे में जाना (पड़ना) :- नष्ट-भ्रष्ट होना।
चूल्हे में डालना :- नष्ट-भ्रष्ट करना।
चूल्हे से निकल कर भट्टी (भाड़) में पड़ना :- छोटी विपत्ति से बचकर बड़ी में फँसना।
किसी पदार्थ को | दबा-दबा कर रस पीना।
किसी चीज (जैसे धन, स्वास्थ्य, यौवन आदि) का सार भाग खींच लेना।
सूरदास गोपाल छाँड़ि कै चूसै टेटा खारे - ३०४५।
(क) चंद्रमहिं बिसरी नभ की गैल - १८२३।
(ख) मथुरा ते निकसि परे गैल माँझ आइ उहै मुकुट पीतांबर स्याम रूप काछे - २९४९।
गैल जाना :- (१) साथ जाना।
(२) अनुकरण करना।
गैल करना :- साथ कर देना।
गैल लेना :- साथ लेना।
गाड़ी के पहिये की लीक या लकीर।
(क) हेवर गैवर सिंह हंसबर खग मृग कहँ हैं हम लीन्हे - ११३१।
(ख) गैवर भेति चढ़ावत। रस्ता प्रभुता मेटि करत हिनती - १२२८।
चिड़ियों की बोली, चीं चीं।
व्यर्थ की बक-बक या बकवाद।
धीमें स्वर में किया हुआ विरोध।
जादू, इंद्रजाल, मंत्र, टोना।
तब हँसि के मेरो मुख चितयौ, मीठी बात कही। रही ठेगी, चेटक सौ लाग्यौ, परि गई प्रीति सही - १० - २८१।
कौतुक या लीलाएँ करनेवाला, कौतुकी।
परम गुरु रतिनाथ हाथ सिर दियो प्रेम उपदेस। चतुर चेटकी मथुरानाथ सों कहियौ जाइ अदेस-३१२५।
सब चेटुअनि मन ऐसी आई। रहे सबै हरि - पद चित लाई - ७ - २।
[सं. चेटक = दास, हिं. चट्टा चेला]
चेटिका, चेटिकी, चेटिया, चेटी, चेटुई, चेटुवी
सोवत कही चेत रे रोवन, अब क्यों खात दगी - ६ - ११४।
मन सुवा, तन पींजना, तिहिं माँझ राखे चेत१ - ३११।
सतर्क, सावधान या होशियार होने की सूचना।
सचेत हो, होश में आ, सावधान हो।
क्यौं तु गोबिंद नाम बिसारी ? अजहूँ चेति, भजन करि हरि कौ, काल फिरत सिर ऊपर भारी - १ - ८०।
(क) सूरदास प्रभु क्यौं नहिं चेतत, जब लगि काल न आयौ - १ - ३०१।
(ख) चेतत क्यौं नाहिं मूढ़ सुनि सुबात मेरी। अजहूँ नहिं सिंधु बँध्यौ, लंका है तेरी - ९ - ११८।
जिन जड़ तै चेतन कियौ, (रे) रचि गुनि - तत्व - विधान। चरन, चिकुर, कर, नख दए, (रे) नयन, नासिका, कान - १ - ३२५।
सप्तम चेतनता लहै सोइ। अष्टम मास सँपूरन होइ - ३ - १३।
सचेतन, चेतनायुक्त, सज्ञान।
[हिं. चेतना+वान् (प्रत्य.)]
वह जिसने शिक्षा ली हो, छात्र।
[सं. चेटक, प्रा. चेड़छ, चेड़ा]
चित्र या मूर्ति में चेहरे की रंगत या आकृति।
[सं. चेटक, प्रा. चेड़, चेड़ा; हिं. चेला]
[सं. चेटक, प्रा. चेड़, चेड़ा; हिं. चेला]
ऐसे करि मोकों तुम पायौ मनौ इनकी मैं करों चेराई। सूरस्याम वे दिन बिसराये जब बाँधे तुम ऊखल लाई।
सूरदास जसुदा मैं चेरी कहि कहि लेत बलैया - ५१३।
विन दामन की चेरी :- बे मोल की दासी, बहुत नम्र और आज्ञाकारिणी सेविका।
उ. - बहुरि न सूर पाइहैं हमसी बिन दामन की चेरी - २७१६।
(क) तुम प्रताप - बल बदत न काहूँ, निडर भए घर - चेरे - १ - १७०।
(ख) जच्छ, मृतु, बासुकी, नाग, मुनि, गंधर्ब, सकल बसु, जीति मैं किए चेरे६ - १२९।
(ग) इहिं बिधि कहा घटैगौ तेरौ। नँदने करि घरि कौ ठाकुर, पुन ह्व रहु चेरौ - १ - २६६।
(घ) जब मोहिं रिस लागति तब त्रासति, बाँधति, मारति जैसै चेरौ - ३६६।
वह जिसने दीक्षा ली हो, शिष्य।
[सं. चेटक, प्रा. चेड़छ, चेड़ा]
चेता, सचेत या सावधान हुआ।
(क) चेत्यौ नाहिं गयौ टरि औसर, : मीन बिना जल जैसे - १ - २६३।
(ख) लोभ - मोह तें चेत्यौ नाहीं, सुपर्ने ज्यौं डहकातौ - १ - ३२९।
एक प्राचीन देश जिसके अंतर्गत ... वर्तमान बुंदेलखंड का चंदेरी नगर है। शिशुपाल यहाँ का राजा था।
शिशुपाल जो श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में मारा गया था।
चिड़ियों के फँसाने का लासा।
चेहरा उतरना :- लज्जा, निराशा आदि से चेहरा फीका हो जाना।
चेहरा तमतमाना :- गर्मी या क्रोध से चेहरा लाल होना।
सूरदास, अबला हम भोरी गुर पैंटी ज्यौं पागी - ३३३५।
गुद्दी, ल्योंड़ी गरदन के पीछे का भाग।
गुदी चाँपि लै जीभ मैरोरी - १० - ५७।
आँखें गुद्दी में होना :- (१) दिखायी न देना।
(२) समझ में न आना।
गुद्दी नापना :- गुद्दी पर चाँटा (धौल) देना।
गुद्दी से जीभ खींचना :- जबरन खींचना, कड़ा दण्ड देना।
किसी वस्तु या व्यक्ति की विशेषता या धर्म जो उससे अलग न हो सके।
बेद धरत न सुन्न गुन के नखत टारन केर - सा. ६०।
रूप - रेख - गुन - जाति, जुगति बिनु निरालंब कित धावै - १ - २।
तंत्रन चलै, मन्त्र नहिं लागै, चले गुनी गुन हारे - ३२५४।
शील, सद्वृत्ति, सदाचरण, पुण्य कार्य।
(क) तिनुका सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु समान। सकुचि गनत अपराध समुद्रहिं बूँद - तुल्य भगवान - १ - ८।
(ख) ऐसैं कहौ कहाँलगि गुनगन लिखत अन्त नहिं लहिए - १ - ११२।
धोती की लपेट जो कमर पर रहती है, मुर्री।
गुझिया, समोसे आदि गूँ धना।
[सं. गोष्ठ, प्रा. गोठ्ट+ना (प्रत्य.)]
बंग और भुवनेश्वर के बीच का प्रदेश।
चित्रा नक्षत्र संबंधी, चित्रा नक्षत्र का।
रबी की फसल जो चैत में कटे।
गौतम बुद्ध या उनकी मूर्ति।
बौद्ध भिक्षुक या संन्यासी।
दो दो चोंचे होना :- कहा-सुनी होना।
चैन से कटना :- सुख से समय बीतना।
चैयाँ चैयाँ गहौ चैयाँ बैयाँ बैयाँ ऐसे बोल्यौ।
पक्षियों की चंचु या टोंट।
मनु सुक सुरंग बिलोकि बिंब - फल चाखन कारन चोंच चलाई - १६१६।
आटे का अंश जो छानने के बाद चलनी में बचता है।
चोका लगाना :- मुँह लगाकर चूसना।
तेल उबटन लै मैं धरि, लालहिं चोटत - पोटत री - १० - १८६।
विनोदपूर्ण उक्ति, सुभाषित।
हास्य-व्यंग्यपूर्ण उपहास।
आघात, प्रहार, टक्कर, मार।
दौरत कहा, चोट लगिहै कहुँ पुनि खेलिहौं सकारे - १० - २२६।
प्रेम-बान की चोट कठिन है लागी होइ कहो कत ऐसी ३३२९।
गैयनि फै कहुँ चोट लगावहु - ४०१।
चोटी हाथ में होना :- काबू में होना।
स्त्रियों या बालकों के गुंधे हुए सिर के बाल।
करि मनुहार कलेऊ दीन्हौ मुख चुपथौ अरु चोटी - १० - १६३।
करौ चोटी :- बाल गूंध दें, चोटी कर दें।
उ. - महरि केंवरि सौं यहि कहि भाषति, उ करौं तेरी चोटी - १० - ७०३।
ऊन, सूत या रेशम का डोरा जो बाल गूंधने के काम आता है।
चोटी का :- सबसे अच्छा या बढ़िया।
चिकनी-चुपड़ी या खुशामद से भरी (बात)।
झूठी, बनावटी इधरउधर की (बात)।
तुम जानति राधा है छोटी। चतुराई अँग अंग भरी है पूरन ज्ञान न बुधि की मोटी। हम सों सदा दुरावति सो यह बात कहत मुख चोटी-पोटी - १४७६
जब गजेंद्र को पग तू गैहै। हरि जू ताको अनि छुटेहै - ८ - २।
सूरदास ह्वै कुटिल बराती गीत सुमंगल गैहैं। - १० - १९३।
सूर दिना द्वौ ब्रज जन सुखदै आइ चरन पुनि गैहौं - १९२३।
आज्ञा पाय देव रघुवर की छिनक माँझ द्दठ गैहौं - सारा. २२४।
गाओगे, वर्णन करोगे, बखानोगे।
भक्ति बिनु बैल बिराने ह्वैहौ। पाउँ चारि, सिर सृंग, गुंग मुख, तब कैसैं गुन गैहौ - १ - ३३१।
साथ में रहनेवाला मित्र, साथी।
रुहठि करै तासौं को खेलै रहे बैठि सब गोइँयाँ (ग्वैयाँ) - १० - २४५।
नौकर जो सोने-चाँदी से मढ़ा हुआ डंडा लेकर चलता है।
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, ये भए चोर औं साहू - १ - ४०।
चोर पर (के घर) मार पड़ना :- धूर्त के साथ धूर्तता होना।
मन में चोर बैठना :- मन में संदेह या खटका होना।
चोर सबनि चोरी करि जानी :- बुरा सबको बुरा ही समझता है।
उ. - चोर सबनि चोरी करि जानै ज्ञानी मन सबै ज्ञानी–१२८७।
बीस बिरियाँ चोर की तै कबहुँ मिलिहै साहु :- बुरा अपनी धूर्तता से दस-बीस बार भले ही सफलता पा ले, कभी तो चूककर साह के फंदे में पड़ेगा ही।
उ.-कबहुँ तौ हम देखि एक संग राधा कान्ह। भेद हमसों कियौ राधा नठुर भई निदान्ह। बीस बिरियाँ चोर की तौ कबहुँ मिलिहै साहु। सूर सब दिन चोर कौ कहुँ होत है निरबाहु-१२८०।
वह लड़का जिससे दूसरे खेल में दाँव लेते हैं।
जिसके सच्चे रूप का पता न लगे।
चक्र काहु चोरायो, कैधौं भुजनि बल भयो थोर।
चितहिं चोरावत :- मन हरते या मोहते हैं।
उ. - सूर स्याम नागर नारिनि के चंचल चितहिं। चौरावत - १३४३।
नंद - सुत, सँग सखा लीन्हे, चोरि माखन खात - १० - २७३।
चल सखि देखन जाहिं पिया अपने की चोरी - २४०८।
चोरी से, लुक छिप कर, दूसरे की आँख बचाकर।
(क) अंजन रंजित नैन, चितवनि चित चोरै१० - १५१।
(ख) मेरौ माई कौन कौ दधि चोरै १० - ३२१।
दूध दही काहे को चोरयौ काहे कौ बन गाइ चराए - ३४३४।
स्त्रियों की चोली का एक प्रकार।
कैहै कहा चोरटी हमसौं बातें बात उधरिहै१२६४।
चोरटी भई-छिपाकर, चोरोसे। सदा जाहु चोरटी भई, आजु परी सँग मोर-।
चुराता है, चोरी करता हुआ।
(क) घर - घर डोलत माखन चोरत, षटरस मेरे धाम - ३७६।
(ख) कछु दिन करि दधिमाखन - चोरी, अब चोरत मन मोर - ७७६।
मन चोरत :- मोहित करता है।
उ. - पूरदास प्रभु बचन बनावत अब चोरत मनमोर - १९६५।
जो (पशु) थनों में दूध चुरा ले, पूरा न दुहने दे।
(क) माखन चोराइ बैठ्यौ, तौलौं : गोपी आई - १० - २८४।
(ख) प्रभु तबहीं जान्यौ यह बिधि लै गयौ चोराइ - ४३७।
(ग) सोऊ तौ घर ही घर डोलतु माखन खात चोराई - १० - ३२५।
चित्त चोराए :- मन हर लिये।
उ. - सूर ; नगर नर नारि के मन चित्त चोराए - २५१६।
अब मैं नाच्यौ बहुत गोपाल। काम - क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माले - १ - १५३।
बच्चे को पहली बार कपड़े पहनाने की रस्म।
चोली छोड़ना :- प्राण त्यागना।
स्त्रियों को एक पहनावा जो अंगिया से मिलता-जुलता होता है और जिसकी गाँठ पेट के ऊपर बँधती है।
अँगरखे आदि को ऊपरी अंश जिसमें बंद रहते हैं।
एक प्रकार का सुगंधित द्रव पदार्थ।
चोवा - चंदन - अबिर, गलिनि छिर| कावन रे - १० - २८।
चूसना, चूसने की क्रिया। |
भय, आश्चर्य या पीड़ा-जन्य भड़क या झिझक।
[सं. चमत्कृत, प्रा. चर्मक्कि, चाँकि]
चकित या हैरान करना, आश्चर्य में डालना।
(भय के सहसा उप स्थित होने से) चंचल होकर, काँप या झिझककर।
चौंकि परी तन की सुधि आई। आजु कही ब्रज सोर मचायौ, तब जान्यौ दह गिरयौ कन्हाई - ५४८।
जो गिनती में तीस और चार हो।
[सं. चतुस्त्रिंशत्, प्रा. चतुतिंसो, या चउतीसो]
अधिक प्रकाश से दृष्टि की तिलमिलाहट।
अधिक प्रकाश से चकाचौंध होना।
सुझाई न पड़ना।
सुरागाय की पूंछ के बालों का चँवर।
अनाज रखने या संग्रह करने का गड्ढा, गाड़।
चारों तरफ से बहनेवाली हवा।
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
मंगल अवसरों पर देव-पूजन के लिए आटे-अबीर आदि से खींचा गया चौखुटा क्षेत्र जिसमें कई खाने होते हैं।
कदली खंभ, चौक मोतिन के बाँधे बंदनवार - सारा. २३९।
(ख) मंगलचार भए घर घर में मोतिन चौक पुराए - सारा. ५३४।
(ग) दधि अक्षत फल फूले परम रुचि अंगन चंदन चौक पुरावहु - १० उ. - २३।
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
घोड़े की पूँछ के बालों का चँवर।
चोटी या वेणी बाँधने की डोरी।
चौंरी डोरी बिगलित केस झूमत लटकत - मुकुट सुदेस।
जो गिनती में साठ और चार हो।
[सं. चतुष:ष्ठि, प्रा. चउसहि]
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
चौसर खेलने का कपड़ा, बिसात।
राखि संत्रह पुनि अठारह चोर पाँचो मारि। डारि दे तू तीन काने चतुर चौक निहारि।
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
[हिं. चौ =चार + सं. कला = अंग]
चौकड़ी भूल जाना :- भौचक्का होना।
[हिं. चौ =चार + सं. कला = अंग]
[हिं. चौ =चार + सं. कला = अंग]
[हिं. चौ =चार + सं. कला = अंग]
मोट के मुँह पर बँधी लोहे या लकड़ी की गोल छड़।
सामने के चार दाँतों की पंक्ति।
बराबर लंबाईचौड़ाई की ईंट।
चौको लगाना :- (१) लीप-पोत कर बराबर करना।
(२) सत्यानाश करना, चौपट करना।
[हिं. चौ =चार + सं. कला = अंग]
साव धानी, होशियारी, खबरदारी।
मंदिर के निचले खंभों के ऊपर का घेरा।
वह स्थान जहाँ पुलिस रहती हो।
और हार चौकी हमेल अब तेरे कंठ न नैहौं - १५५०।
जिसके चार कोने हों, चौखूटा।
[सं. चतुष्कोण, प्रा. चउकोण, चउकोड़]
जिसके चारो कोने बरा बर हों, चार कोने का।
मंगलकार्यों में देव पूजन के उद्देश्य से छोटे-छोटे खानेदार चौकोर क्षेत्र को जो आटे या अबीर से बनते हैं।
चंदन आँगन लिपाइ, मुतियनि चौके पुराइ, उमॅगि अंगनि आँनद सौं, तूर बजायौ - १० - ६५।
दरवाजे की चार लकड़ियों को ढाँचा।
अंडज, पिंडज, स्वेदज, उभिज आदि चार प्रकार के जीव।
जाके उदर लोकत्रय, जल थल, पंच तत्व चौखानि। सो बालक हूँ झूलत पलनी, जसुमत भवनहिं अनि - ४८७।
[हिं. चौ=चार+खानि=जाति, प्रकार]
एक खेल जिसमें (हाकी या पोलो की तरह) लकड़ी के बल्ले से गेंद मारते हैं। यह खेल घोड़े पर चढ़कर भी खेला जाता है।
श्रीमोहन खेलत चौगान। द्वारावती कोट कंचन मैं रच्यौ रुचिर मैदान। यादव बीर बराइ बटाई इक हलधर इक आपै शोर। निकले सबै कुँवर असवारी उच्चैश्रवा के पोर। लीले सुरंग, कुमैत स्याम तेहि पर है सब मन रंग।
(ख) मनमोहन खेलते चौगान - १० उ.६।
चौगान नामक खेल खेलने की लकड़ी जो आगे की ओर टेढ़ी या झुकी हुई होती है।
(क) बार - बार हरि मातहिं बुझत, कहि चौगान कहाँ है। दधि - मथनी के पाछै देखौ, लै मैं धरयौ तहाँ है - १० - २४३।
(ख) ले चौगान बटा करि आगे प्रभु श्राए जब बाहर। सूर स्याम पूछत सबै ग्वालन खेलेंगे केहि ठाहर।
चौगुन, चौगुना, चौगुने, चौगुनौ, चौगून
चतुर्गुण, चार बार उतना ही।
गोपालहिं माखन खान है। याकौ जाइ चौगुनौ लैहौं, मोहिं जसुमति लौं जान ६ - १० - २७४।
[सं. चतुर्गण, प्रा. चागुण, हिं. चौगुना]
चौगुन, चौगुना, चौगुने, चौगुनौ, चौगून
(क) यह मारग चौगुनौ चलाऊँ, तौ पूरौ ब्यौपारी - १ - १४६।
[सं. चतुर्गण, प्रा. चागुण, हिं. चौगुना]
चौगुन, चौगुना, चौगुने, चौगुनौ, चौगून
मन चौगुना होना :- उत्साह बढ़ना।
चबानेवाले चिपटे या चौड़े दाँत, चौभर।
चारखानेदार डिब्बा या बरतन।
दीवट जिसके दीपक में चार बत्तियाँ जलती हैं।
चार घोड़ों की गाड़ी या रथ।
निदा या बदनामी फैलानेवाली।
[हिं. चौचंद+हाई (प्रत्य.)]
लंब. के दोनों किनारों के बीच का फैलाव।
चार बंदवाली बच्चों की टोपी।
(क) भाल - तिलक मसि बिंदु बिराजत, सोभित सीस लाल चौतनियाँ - १० - १०६।
(ख) करत सिंगार चार भैया मिलि सोभा बरनि न जाई। चित्र बिंचित्र सुभग चौतनियाँ इंद्र - धनुष छवि छाई - सारा, १७२।
[हिं. चौ (=चार)+तनी (=बंद) =चौतानी]
[हिं. चौ (=चार)+तनी (=बंद) =चौतानी]
स्याम बरन पर पीत अँगुलिया, सीस कुलहिया चौतनियाँ - १० - १३२।
चार बंदवाली बच्चों की टोपी।
(क) तन कैंगुली, सिर लाल चौतनी, चूरा दुहुँ कर - पाइ - १० - ८६।
(ख) सिर चौतनी, डिठौना दीन्हौ, आँखि आँजि पहिराइ निचोल - १० - ९४।
हर पक्ष की चौथी तिथि, चतुर्थी।
[सं. चतुर्थी, प्रा. चउत्थि, हिं. चउँथि]
[सं. चतुर्थी, प्रा. चउत्थि, हिं. चउँथि]
एक कर जिसमें आय का चौथाई भाग ले लिया जाय।
[सं. चतुर्थी, प्रा. चउत्थि, हिं. चउँथि]
(क) चंपक लता चौथ दिन जान्यौ मृगमद सीर लगायौ।
(ख) तीजै मास हस्त पग होंहिं। चौथ मास कर - आँगुरि सोहि - ३ - १३।
[सं. चतुर्थ, प्रा. चउत्थ]
मृत्यु के चौथे दिन की एक रीति।
विवाह के चौथे दिन होनेवाली एक रीति।
फसल की बाँट जिसमें।जमींदार उपज का चौथा भाग ले लेता है।
चार दाँतवाला (पशु), उभड़ती जवानी का।
उदंडता। विचार दाँतवाली (मादा पशु)।
किसी पक्ष की चौदहवीं तिथि, चतुर्दशी।
फागुन बदि चौदस को सुभ दिन अरु रविवार सुहायौ। नखत उत्तरी आय बिचारथौ काल कंस कौ आयौ।
[सं. चतुर्दशी, प्रा, चउद्दसि]
[सं. चतुर्दश, प्रा.चउद्दस, अप, प्रा. चउद्दह]
कान की बाली जिसमें चार मोती हों।
[हिं. चौ=चार+दाना +ई (प्रत्य.)]
जिसमें चार पहल हों, वर्गात्मक।
[सं. चतुष्पद, प्रा. चउप्पाव]
निकसि ब्रज के गई गोड़े - १० - ८०।
वृक्षों के तने से निकला हुआ लस जो चिपचिपा होता है।
(क) एक अंस बृच्छनि कौं दीन्हौं। गोंद होइ प्रकास तिन कीन्हौं - ६५।
(ख) बाइ बिरंग बहेरा हरै कहूँ बैल गोंद ब्यापारी - ११०८।
[सं. कुँदुरू या हिं. गूदा]
पँजीरी या पाग जिसमें गोंद मिला हो।
चीनी में पगा हुआ गोंद, गोंद की पपड़ी या कतली।
पेठा पाक, जलेबी, कौरी। गोंदपाक, तिनगरी, गिंदौरी - ३९६।
मखाने के साथ चीनी में पगा हुआ गोंद।
किसी जाति, समाज आदि का मुखिया।
[सं. चतुर=मसनद+धर=धरनेवाला]
चारो तरफ से खुला हुआ, अरक्षित।
[हिं. चौ+पट=किवाड़ा या हिं. चापट]
नष्ट-भ्रष्ट, तबाह, बरबाद।
चौपट चरण-जिस (व्यक्ति) के पहुँचते ही सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाय।
काम बिगाड़ने वाला, सत्यानाशी।
चंचल चपल, चबाइ, चौपटा, लिये मोह की फाँसी - १ - १८६।
[सं. चतुष्पद, प्रा. चउप्पट]
चौसर को बिपात और गोटियाँ।
[सं. चतुष्पद, प्रा. चउप्पट]
चौसर नामक, खेल जो बिसात और गोटियों से खेला जाता है।
सभा रची चौपर क्रीड़ा करि कपट कियो अति भारी - सारा. ७६२।
तह लगाना, कपड़े की परत लगाना।
चंदन चौर सुगंध बतावत कहाँ हमारे पास - ११३०।
खड्ग-प्रहार की एक रोति, तलवार का एक हाथ।
[सं. चतुर्विंशति, प्रा. चउबीसा]
[सं. चतुर्वेदी, प्रा. चउब्बेदी, हिं. चउबे]
रची चौरी आपु ब्रह्मा जरित खंभ लगाइ कै १० उ. २४।
चौलाई लाल्हा अरु पोई - ३६६।
[सं. चतु: पंचाशत, पा, चतुपंचासो, - प्रा. चउवण्ण]
हाथ की चार उँगलियों का समूह या विस्तार।
[सं. चतुश्चत्वारिंशत, पा, चतुच चालीसति, प्रा. चउव्वालीसइ]
(क) चौराई लाल्हा अरु पोई - ३६६।
(ख) साग चना सँग सब चौराई - २३२१।
[सं. चतुर्नवति, प्रा. चउण्णवइ]
[सं. चतुराशीति, प्रा. चउरासीइ]
चौरासी में पड़ना (भरमना) :- बार-बार शरीर धारण करना।
एक खेल जो गोटों और पासों से खेला जाता है।
[हिं. चौ=चार + सर=बाजी अथवा चतुस्सारि]
चार लड़ों का हार, चौलड़ी।
चौसर हार अमोल गरे को देहु न मेरी माई - १५४४।
चार सींग वाला (पशु या चौपाया)।
चौहट, चौहटे, चौहट्ट, चौहट्टा
वह स्थान जिसके चारो ओर-दूकाने हों, चौक।
चौहट, चौहटे, चौहट्ट, चौहट्टा
(क) ज्यौं कपि डोरि बाँधि बाजीगर, कन कन कों चौहटें नचायौ - १ - ३२६।
(ख) यो गोकुल के चौहटे रंग भीगी ग्वालिन - २४०५।
सत्तर से चार अधिक की संख्या।
[सं. चतु:सप्तति, प्रा. चौहत्तरि]
चारो ओर की सीमा, चारदीवारी।
[हिं. चौ=चार+हर (प्रत्य.)]
[हिं. चौ=चार+हर (प्रत्य.)]
एक ऋषि जिनके पिता का नाम भृगु और माता का पुलोमा था। इन्होंने इतने | समय तक तप किया कि इनका सारा शरीर दीमक की मिट्टी से ढक गया, केवल आँखें खुली रहीं। राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने खेल समझ कर इनको चमकती हुई आँखों में काँटा चुभो दिया जिससे उनकी ज्योति जाती रही। पश्चात्, राजा ने क्षमा माँग कर अपनी पुत्री का विवाह वृद्ध ऋषि से कर दिया। सुकन्या के पातिव्रत से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमारों ने वृद्ध ऋषि को युवक बना दिया।
छगुनिया, छगुनी, छ.गुलिया, छ.गुली
छँटा हुआ :- चुना हुआ, बहुत चालाक।
भुने चनों का गूँध हुआ बेसन।
गोंदी सा लदना :- (१) फलों से लद ज्ञाना।
(२) शरीर में बहुत से दाने निकलना।
जिस (वृक्ष) से गोंद निकले।
[हिं. गोंद+ईला (प्रत्य.)]
ल्याए ग्वाल घेरि गौ, गोसुत - ४७१।
च्चै चले-बहने लगे, टपकने लगे।
सुनत तिहारी बातें मोहन वै चले दोऊ नैन - ७४९।
चवर्ग का दूसरा व्यंजन; इसका उच्चारण-स्थान तालु है।
[सं. उत्संग, प्रा. उच्छंग]
ओखली में डालकर अन्न कूटना।
छड़ाते हैं, छीन लेते हैं।
ग्वालन कर तें कौर छँड़ावत मुख लै मेलि सराहत जात - १०८४।
तब कत पानि धरो गोबर्द्धन कत ब्रजपतिहिं छुड़ावै - ३०६८।
(कर्मचारी को) काम से हटाने की क्रिया का भाव।
[हिं. छाँटना+ई (प्रत्य.)]
(कर्मचारी को) काम से हटाने की क्रिया का भाव।
[हिं. छाँटना+ई (प्रत्य.)]
वस्तु आदि का कोई भाग कटवा देना।
छाँटा-छँटाया शेष बेकार अंश।
छुड़ावैगा, मुक्ति दिला येगा।
सूर मोहिं अटक्यौ है नृपवर तुम बिनु कौन छँडै है - ११५४।
वह पशु जो किसी देवता के लिए छोड़ा गया हो।
वेद-वाक्यों का अक्षर गणना के अनुसार किया गया एक भेद।
वह वाक्य जिसमें वर्ण या मात्रा के अनुसार विराम लगे।
वह विद्या जिसमें छंदों के लक्षणों आदि का विचार हो।
(क) घाट धरथौ तुम इहै जानि कै करत ठगन के छेद - ११२१।
(ख) वाके छंद - भेद को जानै मीन कबहिं धौं पीवति पानी - १२८४।
(ग) छंद कपट कछु जानत नाहीं सूधी हैं ब्रज की सब बाल - १३१५।
छल-छंद :- छल कपट, चालबाजी, धोखेबाजी।
बुद्धदेव के सारथी का नाम।
वसु आदि वैदिक देवता जिनकी स्तुति वेदों में है।
सूर दास प्रभु सुजस बखानत नेति नेति स्रति छंदन ४७६।
छंद-रचना में मात्रा-वर्ण आदि के नियम पालन न करने का दोष।
तृप्त, अघाया हुआ, संतुष्ट।
चक्कर या अचंभे में डालना।
वह संख्या, या अंक जो पाँच से एक अधिक हो।
मेरे नैना बिरह की बेल बई। अब कैसे निरवारौं सजनी सब तब पसरि छई - २७७३।
विराज रहे हैं, बस गये हैं।
सूरस्याम सुंदर रस अटके उहँइ छए री - सा. उ. ७ और पृ. ३३३।
खिला-पिला कर तृप्त कीजिए, भोजन से संतुष्ट कीजिए।
हम तौ प्रेम - प्रीति के गहिक, भाज़ी - साक छकइयै १ - २३९।
दुपहिया बैलगाड़ी, लढ़ी, लढ़िया, सग्गड़।
[सं. शकट, प्रा. सगड़ो, छंगडो]
जिसके अंजर-पंजर ढीले हो गये हों।
छः कहारों द्वारा उठायी जानेवाली पालकी।
छः बाँधों से चारपायी बिनने का ढंग।
जिसके छः अंग हों, छः से बना हुआ।
खाकर अघाना या तृप्त होना।
बच्चों के लिए प्यार का एक शब्द।
छगन-मगन, छगना मगना-छोटे-छोटे प्यारे बच्चे।
(क) गिरि गिरि परत घुटुरुवनि टेकत। खेलत हैं दोउ छगन - मगन (छगना मगना)।
(ख) कहा कीज मेरे छगन मगन को नृप मधुपुरी बुलायौ - २९७३।
[सं. छाल, हिं. पं. छगड़ा]
हाथ की सबसे छोटी उँगली, कनीनिका, कानी उँगली।
छाँछ पीने या नापने का पात्र।
चूहे की जाति का एक जंतु जिसके संबंध में प्रसिद्ध है कि यदि साँप इसे पकड़ कर छोड़ दे तो अ. हो जाय और खा ले तो मर जाय।
भई रीति हठि उरग छछूँदरि छाँई बनै न खात - ३१५७।
एक प्रकार का यंत्र या तावीज।
छछूँदर छोड़ना :- झगड़ा कराना।
शोभा. देना, अच्छा लगना, सोहना।
छाजन या छत और कोठे या पाटन का भाग जो दीवार के बाहर निकली रहता है।
छजन तें छूटति पिचकारी। भीग गई सब महल अटारी।
टोपी का निकला हुआ किनारा।
कोठे या छत के दीवार से बाहर या ऊपर निकले हुए भाग।
छज्जे महलन देखि कै मन हरष बढ़ावत - २५६०।
सुनहु सूर रस छकी राधिका बातन बैर बढ़े है - १२६३।
छक्का-पंजा :- दाँव-पेच, चालबाजी।
छक्का पंजा भूलना :- कोई उपाय या चाल न चलना।
ताश जिसमें छः बूटियाँ हों।
छक्के छूटना :- (१) बुद्धि का काम न करना।
(२) हिम्मत हारना।
(३) हैरान करना।
(४) साहस छुड़ाना।
बहुत छोटा और हल्का व्यक्ति।
हाथ न लगना, हत्थे न लगना।
झटका देकर पकड़ या बंधन से छुड़ाना।
झटका दिया, झटका देकर छुड़ाया।
रिसि करि खीझ खझि लट झटकति स्याम भुजनि छटकाये दीन्हो।
बंधन या कष्ट से हाथ-पैर पटकना, तपना।,
छटपटाने या अधीर होने की क्रिया या भाव।
छटाँक भर :- (१) पाव का चौथाई।
(२) थोड़ा।
किलकते हँसते दुरति प्रगटति मनु घन मैं बिजु छटाई - १० - १०८।
मुख की कांति, प्रभा या दीप्ति।
भादों देव छट्ठि को सुभ दिन प्रगट भये बलभाई - सारा.४२२।
काजर रोरी अनहू (मिलि) करौ छठी कौ चार - १० - ४०।
[सं. षष्ठी, प्रा. छुट्टी]
छठी आठे होना :- परस्पर न बनना, आपस में झगड़ा होना।
उ. - छठि आईं मोहिं कान्ह कुँवर सों तिनकौ कहति प्रीति सों है - १२५६।
छठी का दूध निकलना (याद आना) :- बहुत कष्ट या हैरानी होना।
छठी का दूध निकालना :- बहुत हैरान करना।
छठी का राजा :- पुराना रईस।
छठी में न पड़ना :- (१) भाग्य में बदा न होना।
(२) स्वभाव या प्रकृति के विरुद्ध होना।
लई छड़ाइ-छुड़ा ली, छीन ली।
चरन की छबि देखि डरप्यौ अरुन, गगन छपाइ। जानु करभा की सबै छबि, निदरि, लई छड़ाई - १० - २३४।
[हिं. छड़ी+दार (प्रत्य.)]
जदपि अहीर जसोदानंदन कैसें जात छड़े - ३१५१।
बह देवी जिसकी पूजा छठी को होती है।
छठएँ सुक्र तुला के सनि जुत, सत्रु रहन नहिं पैहैं - १० - ८६।
पंचम मास :होड़। बलि पावै। छठे मास इंद्री प्रगटावै - ३ - १३।
पैर में पहनने का एक गहना।
मोतियों की लड़ों का गुच्छा या-छा।
घर का खुला हुआ ऊपरी फर्श।
छत बँधना :- बादलों को घिरकर छाना।
छाती जो पत्तों आदि से बनाया गया हो।
छाता जो पत्तों आदि से बनाया गया हो।
चिता या समाधि पर बना ऊपरी मंडप।
(क) सूरस्याम बिरुझाने सोए लिए लगाई छतियाँ महतारी - २० - १९६।
(ख) चित ? चरनन लाग्यौ, छतियाँ धरकि रही - २२३६।
(ग) छतियाँ लै लाऊँ बालक लीला गाऊँ - २६९९।
(घ) वै बत्तियाँ छतियाँ लिखि राखी जे नंदलाल कहीं२६९९।
कुतिसहुँ हैं कठिन छतियाँ चितै री तेरी, अजहूँ द्रवति जो न देखति दुखारि - ३६२।
दूर बढ़ि गो स्याम सुंदर ब्रज संजीवन मूर - सा. ३८।
जाति पाँति पहिराइ कै समदि छत्तीसौं पौन - १० - ४०।
पटाव जिसके नीचे रास्ता हो।
तीस और छः के जोड़ से बननेवाली संख्या।
[सं. षटत्रिंशाति, प्रा. छत्तीसा]
धूर्त, बहुत चालाक, काँइयाँ।
राजाओं को राजचिह्न-सूचक छाती।
चरन - कमल बंद हरिराइ। रंक चलै सिर छत्र धराइ - १०१।
किसी के छत्र की छाँह में होना (रहना) :- किसी की शरण या रक्षा में होना (रहना)।
हिंदुओं के चार वर्षों में से दूसरा जिसका कर्तव्य देश-रक्षा था। विश्वास है। कि इस वर्ग के लोग युद्ध में वीरों की भाँति मरने, पर स्वर्ग जाते हैं।
इती न करौं सपथ तौ हरि की, छत्रिय - गतिहिं न पाऊँ - १ - २७०।
मारे छत्री इकइस बार - ९ - १३।
ऊँच। अटन पर छत्रन की छबि सीसन मानो फूली - २५६१।
बस किये ब्रह्मन बहुत जोगी छत्रपति केते कहौं - १० उ. २४।
अब तौ हौं तिनक तजि आयौ, सोइ रजायसु दीजै। जाते रहै छत्रपन मेरौ, सोइ मंत्र कछु कीजै - १ - ६।
आभूषण झनकारते फिरते बच्चे।
छनकहि मैं जरि भस्म होइगौ, जब देखे उ जागि जम्हाई - ५५०।
तपे बरतन में पानी आदि किसी द्रव को डालकर छनछनाना।
तपे हुए पात्र में पानी पड़ने से छनछन का शब्द होना।
खौलते हुए घी-तेल में तरकारी आदि पड़ने का शब्द होना।
बरुन - पास हैं ब्रजपतिहिं छन माहिं छुड़ावै १ - ४।
तपी वस्तु पर पानी पड़ने से होनेवाला छन-छन शब्द।
तपी धातु पर पानी की बूंद का गिरकर छनछन करके उड़ जाना।
खौलते घी-तेल में किसी गीली वस्तु के पड़ने पर होनेवाला शब्द।
गहरी छनना :- (१) खूब मेल जोल होना, गाढ़ी मित्रता होना।
(२) आपस में बिगाड़ होना।
खूब तपती धातु पर पानी आदि पड़ने से उत्पन्न छनछनाहट
खौलते हुए घी-तेल में गीली चीज पड़ने पर होनेवाला शब्द।
छन्न होना :- छनछनाकर उड़ जाना।
धातुओं के पत्तों की छनकार।
पानी में किसी वस्तु के जोर से गिरने का शब्द।
छानबीन द्वारा सच्ची-झूठी बात का पता चलना।
छानने का बहुत महीन कपड़ा।
(क) इहि तन छनभंगुर के कारन गरबत कहा गॅवार - १ - ८४।
(ख) सुख - संपति, दारो सुत, हय - गय, झूठ सबै समुदाइ। छनभंगुर यह सबै स्याम बिनु अंत नाहि सँग जाइ - १ - ३१७।
(ग) तनु मिथ्या छनभंगुर जानौ - ५ - ३।
(घ) नर सेवा हैं जौ सुख होइ। छनभंगुर थिर रहै न सोइ - ७ - २।
छानने का काम दूसरे से कराना।
कटारी आदि से काटना या छिन्न करना।
पानी में हाथ-पैर मारने की क्रिया या भाव।
पानी पर हाथ पैर से छपछप शब्द करना।
जदुपति जल क्रीड़त जुवतिन सँग। जल ताकि परस्पर छपत दूर - २४५२।
(क) छपद केज तजि बेलि सों लटि प्रेम न जान्यौ।
(ख) सूर अक्रर छपद के मन में नाहिंन त्रास दई कौ - ३०५५।
छपन कोटि के मध्य राजत हैं जादवराइ - १० उ. ८।
छपाने या मुद्रित करानेवाला।
छपा न छीन होत सुन सजनी भूमि डसन रिपु कहा दुरौनी १० उ. ६३।
मुख छबि कहाँ कहाँ लगि माई। भानु उदै ज्यौं कमल प्रकासित रबि ससि दोऊ जोति छपाई ६३९।
बोल्यौ नहीं, रह्यौ दुरि बानर, द्रुम में देहि छपाइ - ६ - ८३।
महरि तें बड़ी कृपन है माई। दूध दही बेहु बिधि कौ दीनौ, सुत सौं धरति छपाई: - १० - ३२५।
धनि रिषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाई - ५७३।
प्रगटी प्रीति न रही छपाई - ७२०।
छिपाये हुए हैं, आड़ में किये हैं।
नील जलद पर उडगन निरिखत, तजि सुभाव मनु तड़ित छपाए - १० - १०४।
सोलह कला छपाकर की छबि सोभित छत्र सीस सिर तानी - २३८३।
पानी पर जोर से गिरने का शब्द।
छिप गयी, ओट या आड़ में हो गयी।
रहौं छपानी-छिप जाऊँ, आड़ में हो जाऊँ।
बैठें जाइ मथनियाँ कै ढिग, मैं तब रहौं छपानी - १० - २६४।
रहै छपानी-छिपी रहे, प्रगट न हो।
(क) वा मोहन सों प्रीति निरंतर, क्यों अब रहै छपानी - ११६८।
(ख) अब ही जाइ प्रगट करि दैहैं कहो रहै यह बात छपानी - १२६२।
छिप गये, लुक गये, ओट या आड़ में हो गये।
हरि तब अपनी आँख मुँदाई। सखा सहित बलराम छपाने, जहँ - तहँ गए भगाई - १० - २४०।
अदृश्य हो गये, लुप्त हो गये।
इहिं अंतर भिनुसार भयो। तारागन सब गगन छपाने, अरुन उदित, अँधकार, गयौ - ५२०।
(क) खेलत तै उठि भज्यौ सखा यह, इहिं घर आइ छपान्यौ। - १० - २७०।
(ख) कहत। स्याम मैं अतिहिं डरान्यौ। ऊखल तर मैं रह्यौ छपान्यौ - ३९१।
अंधाधुंध भयौ सब गोकुल, जो जहँ रह्यौ सो तहीं छुपायौ - १० - ७७।
सूर स्याम के ललित बदन पर, गोरज छबि कछु चंद कृपावत - ५०६।
[सं. क्षुपि, हिं. छिपाना]
घटाबोर करि गगन छपावहु - १०४६।
चले साजि बरात जादव कोटि छप्पन अति बली - १० उ. २४।
[सं. षट्पंचाशत, प्रा. छप्पणम्, छप्पण]
छप्पर पर रखना :- चर्चा या जिक्र न करना।
छप्पर पर फूस न होना :- बहुत ही निर्धन होना।
छप्पर फाड़ कर देना :- बैठे-बिठाये मिल जाना।
छप्पर रखना :- (१) एहसान लादना।
(२) दोष देना।
छोटा ताल, डाबर, पोखर, तलैया।
(क) इंद्र - सरीर सहस भग पाइ। छप्यौ सो कमल - नाल में जाइ - ६ - ८।
(ख) पौरि सब देखि सो असोक बन मैं गयौ, निरखि सीता छप्यौ। वृच्छ डारा - ६ - ७६।
शरीर की सुंदर गठन, सुंदरता, सजधज।
(क)कछुक अंग तें उड़त पीतपट उन्नत बाहु बिसाल। स्रवत स्रौनकन, तन - सोभा, छबि - धन बरसते मनु लाल - १ - २७३।
(ख) भली बनी छबि जु की क्यों लेते जम्हाई - २०२२।
सुंदर, शोभायुक्त, रूपवान।
[हिं. छवि+धर, मान्, वंत (प्रत्य.)]
सुंदर, सजीधजा, शोभायुक्त, सुहावना।
सुंदर, सजाधजा, शोभायुक्त, सुहावना।
[हिं. छवि+ईला (प्रत्य.), छबीला]
शोभायुक्त, सुहावनी, सुंदर, सजी-धजी।
(क) चंद्र वदन लट लटकि छबीली, मनहुँ अमृत रस ब्यालि चुरावति - १० - १४९।
(ख) छोटी छोटी गोड़ियाँ, अंगुरियाँ छबीली छोटी, नख - ज्योती, मोती शुनौ कमल - दलनि पै - १० - १५१।
(ग) छबि की उपमा कहि न परति है, या छबि की जु छबीली - १०२९६।
(घ) सूर स्याम मुसकान छवीरी अँखियन मैं रहीं तत्र न जानो हो कोही - ८३८।
(ङ) सूरदास प्रभु नवल छबीले नवल छबीली गोरी पृ. ३४३ (२८)
छबीरे, छबीले, छबीलो, छबीलौ
छैल-छबीला, सुहावना, सुंदर।
(क) हौं बलि जाउँ छबीले लाल की। धूसर धूरि घुटुरुवनि रेंगति, बोलनि बेचन रसाल की - १० - १०५।
(ख) सोभा मेरे स्यामहिं पै सोहै। बलि - बलि जाउँ छबीले मुख की, या उपमा कौं को है - १० - १५८
(ग) नटवर रूप अनूप छबीलौ, सबहिनि कै मन भावत - ४७६।
(घ) मोहनलाल, छत्रीलौ गिरिधर, सूरदास बलि नागर नटकनि - ६१८।
बीस और छः के जोड़ वाली संख्या तथा इसका सूचक अंक।
[सं. षड़विंश, प्रा. छब्बीसा]
घुँघरू या गहने हिलाकर छमछम शब्द करना।
नूपुर, पायल या घुँघरू का शब्द।
बहुरि बिधि जाइ, छमुवाइ कै रुद्र कौं बिष्नु, विधि, रुद्र तहँ तुरत आए - ४ - ६।
(क) सूर स्याम अपराध छमहु अब, हम माँगें पति पावें५६६।
(ख) छमहु मोहिं अपराध, न जानें करी ढिठाई - ५८९।
बरुन कुबेरारिक पुनि श्राइ।करी बिनय तिनहूँ बहु भाइ। तैहूँ क्रोध छमा नहिं भयौ - ७ - २।
करौ छमा कियौ असुर सँहार - ७ - २।
जिसके कान गाय की तरह लंबे हों।
अब हम चरन - सरन हैं आए। तब हरि उनके दोष छमाए - ८००।
छमछम के निरंतर शब्द के साथ।
क्षमा आदि सतोगुणी वृत्तियाँ।
दया, धर्म, संतोषहु गयौ। ज्ञान, छमादिक सब लय भयौ - १ - २६०।
पहिलौ पुत्र देवकी जायौ लै बसुदेव दिखायौ। बालक देखि कंस हँस दीन्यौ, सब अपराध छमायौ - १० - ४।
कर जोरति अपराध छमावति - १०१०।
मृत्यु के छः महीने पश्चात् किया जानेवाला श्राद्ध।
रसना द्विज दलि दुखित होति बहु, तउ रिस कहा करे। छमि सब छोभ जु छाँड़ि छवौ रस लै समीप। सँचरै - १ - १०७।
ह्व हैं जज्ञ अब देव मुरारी। छमियै क्रोध सुरनि सुखकारी - ७ - २।
क्षमावान्, क्षमा करने ..ले।
सुर हरि - भक्त, असुर हरि - द्रोही। सुर अति छमी, असुर अति कोही - ३ - ६।
(क) कृपासिंधु, अपराध अपरिमित, छमौ, सूर तें सब - बिगरी - १ - ११५।
(ख) छमौ, प्रलय को समय न भयौ - ७ - २।
बान एक हरि सिव कौं दियौ। तासौं सब असुरनि छय कियौ - ७ - ७।
रविससि - कोटि कला अवलोक्त त्रिविध ताप छ्य जाइ - ४८७।
नित रहत मन्मथ मदहिं छाकी निलज कुच झाँपत नहीं। तब देखि देखि छयल मोहित बिकल ह्वै धावत तहीं - १० उ. २४।
(क) एक अंस जल कौं पुनि दयौ। ह्वै कै काई जल कौं छयौ - ६ - ५।
(ख) ताकौ जस तीनौ। पुर छयौ - ४ - ६।
(क) सँहचरि चतुरातुर लै आई बाँह बोल दै करि कहत वह छर - १८०६।
(ख) तबही सूर निरखि नैनन भरि आयौ उघरि लाल ललिता छर - २२६६।
छरो या कणों के निकलने या गिरने का शब्द, छड़ी से पीटने की ध्वनि।
जब रजु सौं कर गाढ़ै बाँधे, छर - छर मारी साँटी - ३७५।
छरछर करके छिटकना, बिखरना या उछलना।
जो छिया छरद करि सकल संतनि तजी, बिषयबिष खाते नहिं तृप्ति मानी - १ - ११०।
भूत-प्रेत के वशीभूत होना।
कणों या छरों के गिरने का शब्द।
पतली छड़ी मारने से होनेवाला सटसट शब्द।
जब रजु स कर गाढ़ो बाँधे छरछर मारी साँटी - ९९३।
नमक या क्षार लगने से छिले या कटे हुए स्थान में पीड़ा होना।
बँटती है, दूर होती है। रह नहीं जाती।
जब हरि मुरली अधर धरत। थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं। जमुना - जल न बहत। खग मोहैं, मृग - जूथ भुलाही, निरखि मदनछबि छरत - ६२०।
जिसके पास कुछ सामान न हो।
छरीदार बैराग बिनोदी, विकि बाहिरै कीन्हे - १ - ४०।
[हिं. छड़ी+दार (प्रत्य.)]
पानी आदि द्रव-पदार्थों के छलकने की क्रिया या भाव।
कोई द्रव-पदार्थ छलकता है।
छलकत तक्र उफनि अँग आवत नहिं जानति तेहि कालहिं सों - ११८०।
(पानी आदि का) उछल कर भरे पात्र के बाहर गिरना।
पानी आदि द्रवों को उछाल कर पात्र के बाहर गिराना।
उभड़ती है, बाहर प्रकटित होती है, उद्गारित होती है।
तन दुति मोर - चंद जिमि भलकै, उमँगि - उमँगि - अँग अँग छबि छलकै - १० - ११७।
छलता है, भुलावे में डालता है।
जोगी कौन बड़ौ संकर हैं, ताकौ काम छरै - १ - ३५।
दूसरे को धोखा देने के लिए। असली रूप छिपाने का कार्य।
(क) बकी जु गई घोष मैं छल करि, जसुदा की गति दीनी - १ - १२२।
(ख) छल कियौ पांडवनि कौरव, कपट - पास ढरन - १ - २०२।
छल-बल करि :- उचित-अनुचित किसी भी उपाय से।
उ. - (क) छल-बल करि जित-तित हरि पर-धन, धायौ सब दिन-रात्र - १ - २१६।
(ख) जाकी घरनि हरी छल-बल करि - १ - १३३।
युद्ध की नीति के विरुद्ध शत्रु, पर प्रहार या आक्रमण।
पानी का ‘छलछल' शब्द करना।
मार से खून निकलने को होना।
धोखा देने के | लिए, भुलावे में डालने या प्रतारित करने के हेतु।
थे तौ बिप्र होहिं नहिं राजा, आए छलन मुरारी - ८ - १४।
छलनी करना :- (१) बहुत से छेद करना।
(२) फाड़ डालना।
छलनी में डाल छाज में उड़ाना :- जरा सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर झगड़ा करना।
कलेजा छलनी होना :- (१) दुख सहते-सहते ऊब जाना।
(२) दुख या कष्ट की बातें सुनते-सुनते घबरा जाना।
[हिं. छल - छाई (प्रत्य.)]
लेत मन गोइ :- मन चुरा लेते हैं, मन हर लेते हैं।
उ. - नागर नवल कुँवर बर सुंदर, मारग जात लेत मन गोइ - १० - २१०।
मन धरयौ गोइ :- मन चुराकर रख लिया, छिपा लिया।
उ. - कहौ घर हम जाहिं कैसे मन धरयौ तुम गो - इ ११९४।
राखहु गोइ :- छिपाकर या सम्हाल कर रखो।
उ. - हाँसी होन लगी है ब्रज में जो गहु राखहु गोइ - ३०२१।
साथ में रहनेवाला, साथी, सहचर, सखी, सहेली।
सूर बवन सुनि हँसी जसोदा, ग्वालि रही मुख गोई - १० - ३२२।
लै गयो मन गोई :- मन चुरा लिया, हर लिया या मुग्ध कर लिया।
उ. - (क) सूरदास सुख मूरि मनोहर लै जो गयौ मन गोई - २८८१।
(ख) कपट की करि प्रीति ले गयौ मन गोई - ३२०९।
सूरदास जितने रंग काछत जुवती जन - मन के गोऊ हैं।
भूत-प्रेत आदि की कल्पित छाया जो क्षण भर में ही अदृश्य हो जाती है।
प्रकाश जो जंगलों में क्षण भर दिखायी देकर बार-बार लुप्त हो जाता है, अगियाबैताल।
छलावा खेलत :- प्रकाश का क्षण भर इधर-उधर दिखायी देकर बार-बार लुप्त हो जाना।
छलकर, धोखा देकर, भुलावे में डालकर।
(क) जज्ञ करत वैरोचन कौ सुत, वेद - बिदित्त बिधि - कर्मा। सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपानिधि, धर्मा - १ - १०४।
(ख) हरि तुम बलि कौं छलि कहा लीन्यौ - ८.१५।
छला, धोखा दिया, प्रतारित किया।
जिन चरननि छलियौ बलि राजा, नख गंगा जु बहैया - १० - १४१।
मैं यह ज्ञान छली ब्रज बनिता दियौ सु क्यौं न लहौं - ४, ५९८ (२)।
आवन आवन कहिगे ऊवौ करि गए हमसों छलु रे - ३२२६।
धोखा दिया, भुलावे में डाला।
सूरदास प्रभु बोति, छले बलि, धरयौ पीठि पद पावन - ८ - १३।
छाने की क्रिया, मजदूरी या भाव।
कलि मैं नामा प्रगट ताकी छानि छवावै - १ - ४।
छमि सब छोभ जु छाँड़ि, छवौ रस लै समीप सँचरे - १ - ११७।
तनु विष रह्यौ है छहरि - ७५०।
बिखरना, छिटकना, छितर जाना।
[सं. क्षरण, प्रा. खरण, छरण]
बिखरना, गिरकर, इधरउधर फैल जाना।
बिखराना, फैलाना, छितराना।
(क) खेलत फिरत कनकम आँगन पहिरे लाल पनहियाँ। दसरथ - कौसिल्या के प्रागैं, लसत सुमन की छहियाँ - ९ - १९।
(ख) सीतल कुंज कदम की छहियाँ छटक छहूँ रस खैऐ - ४४५।
(ग) सीतल छहियाँ स्याम हैं बैठे, जानि भोजन की बिरियाँ - ४७०।
(के)मेरे लाड़िले हो तुम जाउ न कहूँ। तेरेहीं काजैं गोपाल, सुनहु लाड़िले लाल, राखे हैं भाजन भरि सुरस छहूँ - १० - २९५।
(ख) सीतल कुंज कदम की छहियाँ, छकि छहूँ रस खैऐ - ४४५।
[सं. षट, प्रा. छ, हिं. छ+हूँ (प्रत्य.)]
कुल छह, छह (वस्तुओं) में सब।
छहौं रितु तप करतिं नीकौं गेह - नेह बिसारि - ७६७।
(क) छाँक खाय जूठन ग्वालिन कौं कछु मन मैं नहिं मान्यौ - सारा. ७५०।
(ख) एक ग्वाल मंडली करि बैठेति छाँक बाँटि के देत।
छाँट कर अलग की हुई बेकार चीज
छानफटक कर अनाज से भूसी अलग करना।
बेकार चीजें चुनना या निकालना।
प्रथम ग्वाल गाइन सँग रहते भए छाँछ के दानी - ३३०२।
काटने-कतरने की क्रिया या ढंग।
छल से किसी को दूर या अलग करना।
छोड़ता (है), त्यागता (है)।
निरखि पतंग बानि नहिं छाँड़त, जदपि जोति तनु तावत - १ - २१०।
अलग करता है, (अपने से) दूर हटाता है।
चलनि चहति पग चले न घर कोँ। छाँड़त बनत नहीं कैसेहूँ, मोहन सुंदर बर कोँ - ७३८।
[सं. छर्दन, प्रा. छड्ड्न]
छाँड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ पवन के गवन तें अधिक धायौ - १ - ५।
कह्यौ भगवान सौं कहा यह कियौ तुम छाँड़िबो हुतौ या भलौ मारे - १० उ. २१।
अबै लैहौं, वह दाऊँ, छाँड़िहौं नहिं बिन मारे - ३ - ११।
नीरस करि छाँड़ी सुफलकसुत जैसे दूध बिन साठी - २५३५।
छोड़ते हैं, अलग होते हैं।
बिपति परी तब सव सँग छाँडे, कोउ न आवै नेरे - १ - ७९।
गृह गृह प्रति द्वार फिरयौ तुमकौं प्रभु छाँड़े - १ - १२४।
छोड़ दिये, अलग किये, साथ न लिये।
कहि मुद्रिके, कहाँ तै छाँड़े मेरे जीवन - मूरि - ९ - ८३।
कारौ अपनौ रंग न छाँडै, अनसँग | कबहुँ न होई. - १ - ६३।
त्यागता है, अग्राह्य समझता है।
खाद - अखाद न छाँडै अबल सब मैं साधु कहावै - १ - १८६।
चतुर नाइक सौ काम परयौ है कैसे ह्व छाँडौंगी - १५११।
संधान किया, लक्ष्य पर चलाया।
देख्यौ जब दिव्य बान निसिचर कर तान्यौ। छाँड्यौ तब सूर हनू ब्रह्म - तेज मान्यौ - ९:९६।
पशुओं के पैर बाँधने की रस्सी, नोई।
रस्सी से (पशु के पैर) बाँधना।
हाथ से पैर जकड़ कर पकड़ना।
सामवेद का एक ब्राह्मण।
इस (छांदोग्य) ब्राह्मण का एक उपनिषद।
रसमय जानि सुवा सेमर कौं चौंच घालि पछितायौ। कर्म - धर्म, लीला - जस, हरि - गुन इहिं रस छाँव न आयौ - १ - ५८।
लरिकाईं ते करत अचगरी मैं जाने गुन तबहीं। ८०६।
(ख) कौनैं गुन बन चली बधू तुम, कहि मोंसौं सति भाउ - ९ - ४४।
(ग) सुनहु महरि अपने सुत के गुन - १० - ३०३।
(घ) तुम्हरे गुन सब नीके जाने - ३९१।
(क) इन तौ करी पाछिले की गति गुन तोरयौ बिच धार - १ - १७५।
(ख) तमहर सुत गुन आदि अन्त कवि का मतिवन्त बिचारो - सा. ४०।
एक प्रत्यय जो संख्यावाची शब्दों के अन्त में जुड़कर उतने ही गुण होना सूचित करता है।
गिरिजा पितु पितु पितु ही ते सौ गुन सी दरसावै - सा. १५।
(क) हम पढ़ि गुनकै सब बिसरायौ ८९६।
(ख) गिरिजा - पति - पतनी पति जा सुत गुनगुन गनन उतारै - सा, ५।
गुन अकास को सिद्ध साधना सास्त्र करत बिस्तार - सा.१०४।
सिय रिपु पितु सुत बंधु तात हित जाके चरन - कमल गुनकारी - सा. १०३।
छिपा लिये, अदृश्य कर दिये।
चतुरानन बछरा लै गोए, फिरि मांडव आए तिहि ठाँव - ४३८।
मलबार का वह क्षेत्र जो शिव की उपासना के लिए प्रसिद्ध है।
काश्मीर का एक प्राचीन राजा।
भूसी या कन जो अनाज छाँटने-फटकने पर बचता है।
हरषित भए नँदलाल बैठि तरु - छाँह मैं।
छाँह में होना :- आड़ में होना, छिपना।
उ. - छाता तैं छाँह किये सोभित हरि - छाती - १ - २३।
छाँह न छूने देना :- पास न आने देना।
छाँह बचाना :- पास न जाना।
छाँह छूना :- पास जाना।
छैलनि कै सँग यौं फिरै जैसें तनु सँग छाई (हो) - १ - ४४।
(क) लई बिमान चढ़ाई जानकी, कोटि मदन छबि छाई - ९ - १६२।
(ख) चित्र विचित्र सुभग चौतर्निया इंद्रधनुष छबि छाई - सारा, १७२।
(ग) भीर भई दसरथ के आँगंन सामवेद धुनि छाई - ११७।
अति आनन्द होत गोकुल मैं रतन भूमि सब छाई - १० - २१।
कामधेनु, चिंतामनि, दीन्हीं कल्पवृच्छ - तर छाउँ - १ - १६४।
फैल गये, बिछ गये, भर गये।
आनँद मगन सब अमर गगन छाए पुहुप बिमान चढ़े पहर पहर के - १० - ३०।
डेरा डाले थे, बसे हुए थे, टिके थे।
(क) बंदीजन अरु भिक्षक सुनि - सुनि दूरि दूरि तै छाए। इक पहिलै ही आसा लागे, बहुत दिननि तें छाए - १०३५।
(ख) अंग - अंग प्रति मार निकर मिलि, छबिसमूह लै लै मनु छाए - १० - १०४।
(क) मध्य गोपाल - मंडली मोहन, छाक बाँटि कै लेत - ४१६।
(ख) अहिर लिए मधु - छाक तुरत बृंदाबन आए - ४३७।
(ग) छाक लेन जे ग्वाल पठाए - ४५४।
(घ) जाति - पाँति सबकी हौं जानौं, बाहिर छाक मँगाई। ग्वालनि कैं संग भोजन कीन्हौं, कुल कौं लाग लगाई - १ - २४४।
पदार्थों का जल या शीशे में दिखायी देनेवाला प्रतिबिंब।
मैं कछू करिबे छाँड्यौ, या सरीरहिं पाइ। तऊ मेरो मन न मानत, रह्यौ अघ पर छाइ - १ - १९९।
छाइ रह्यौ- आसक्त हुआ है, रम रहा है।
रावन कह्यौ सो कह्यौ न जाई, रह्यौ क्रोध अति छाइ - ९ - १०४।
तब लौं तुरत एक तौ बाँधौं, द्रुम पाखाननिछाइ। द्वितीय सिंधु सिय - नैन - नीर ह्वै, जब लौं मिलै न आइ - ९ - ११०।
लग्न लै जु बरात साजी उनत मंडप छाइ - १० उ. १३।
खा-पीकर अघाना या तृप्त होना।
नित रहत मदन मद छाकी - १० उ. २४।
धाइ धाइ द्रुम भेटई ऊधौ छाके प्रेम - ३४४३।
(क) घर - घर तैं छाकैं चलीं मानसरोवरतीर। नारायन भोजन करैं, बालक संग अहीर - ४९२।
(ख) छाकै खात खवावत ग्वालन सुंदर जमुना तीर - सारा. ४६६।
छाज सी दाढ़ी :- लंबी दाढ़ी।
छाजों मेंह बरसना :- मूसलाधार पानी बरसना।
गाड़ी के कोचवान के सामने का छज्जा।
ऊँचे अटनि छाज की सोभा सीस ऊँचाइ निहारी - २५६२।
शोभा देता है, भला लगता है, फबता है।
युद्ध को करत छाजत नहीं है तुम्हैं - १० उ. ३१।
सुशोभित होती है शोभा बढ़ाती है।
(क) पीत झँगुलिया की छबि छाजति, बिजुलता सोहति मनु कंदहिं - १० - १०७।
(ख) भृगु - पद - रेख स्याम - उर सजनी, कहा कहौं ज्यौं छाजति - ६३८।
फबना, भला लगना, ठीक जान पड़ना।
(क) ते दिन बिसरि गऐ इहाँ आए। अति उन्मत मोह - मद छाक्यौ, फिरत केस बगराए १ - ३२०।
(२) कछु करि गए तनक चितवनि मैं यातैं रहत प्रेम - मद छाक्यौ - २५४६।
स्त्रियों के पैर का एक धुंघरूदार गहना, झाँझ, झाँझन।
स्त्रियों के पैर का एक घुंघरूदार गहना, झाँझ, झाँझन।
राजनीति जानौ नहीं, गोसुत चरवारे। पीवौ छाछ अघाइकै, कब के रयवारे - १ - २३८।
घी तपने पर नीचे बैठनेवाला मट्ठा।
ऊँचे भवन मनोहर छाजा, मनि कंचन की भीति - १० उ. ६९।
यह गति करत नहीं छाजी - २६६५।
सुंदर लगते हैं, सुशोभित हैं।
गोबर्धन बिंदाधन जमुना सघन कुंज अति छाजै - सारा, ४६२।
जसुमति दधि - माखन करति, बैठी बर धाम अजिर, ठाढ़े हरि हँसते नान्हि दँतियनि छबि छाजै - - १० - १४६।
शोभा देती है, भली लगती है, फबती है, उपयुक्त जान पड़ती है।
(क) चित्रित बाँह पहुँचिया पहुँचै, हाथ मुरलिया छाजै - ४५१।
(ख) पल्लव हस्त मुद्रिका भ्राजै। कौस्तुभ मनि हृद्यस्थल छाजै - ६२५।
छाड़ौ नाहिं स्याम - स्यामा की बृंदावन रजधानी - १ - ८७।
(क) संग लगाइ बीच ही छाँड्यौ, निपट अनाथ - अकेलौ - १ - १७५।
(ख) पांडव सब पुरुषारथ | छाँड्यौ, बाँधे कपट - बचन की बेरी - १ - १५१।
[सं. छादिन्, छादी=आच्छादन करनेवाला]
छाती का जम :- (१) दुखदायी व्यक्ति।
(२) ढीठ आदमी।
छाती पर का पत्थर (पहाड़) :- (१) चितिति करनेवाली वस्तु।
(२) सदा कष्ट देनेवाली वस्तु।
छाती कूटना (पीटना) :- शोक से छाती पर हाथ मारना।
छाती के किवाड़ खुलना :- (१) छाती फटना।
(२) गहरी चीख निकलना।
(३) उन का उदय होना।
छाती तले रखना :- (१) पास ही रखना।
(२) बड़े प्रेम से रखना।
छाती तले रहना - (१) पास रहना।
(२) प्रिय होकर रहना।
छाती दरकना (फटना) :- (१) दुख से मानसिक कष्ट होना।
(२) ईर्ष्या से जलना, कुढ़ना।
छाती निकाल कर चलना :- ऐंठकर चलना।
छाती पत्थर की करना :- अधिक से अधिक कष्ट या हानि सहने को तैयार होना।
छाती पर मूँग (कोदों) दलना :- (१) सामने ही ऐसा काम करना जिससे कोई कुढ़े।
(२) बहुत कष्ट देना।
छाती पर चढ़ना :- कष्ट देने के लिए पास जाना।
छाती पर धर कर ले जाना :- अपने साथ परलोक ले जाना।
छाती पर पत्थर रखना :- दुख सहने को तैयार होना।
छाती पर बाल होना :- उदार और न्यायप्रिय होना।
छाती पर साँप लोटना (फिरना) :- (१) दुख से मानसिक कष्ट मिलना।
(२) ईर्ष्या, डाह या जलन होना।
छाती पीटना :- दुख या शोक से छाती पर हाथ पटकना।
छाती फुलाना :- (१) अकड़ कर चलना।
(२) घमंड करना।
छाती से पत्थर टलना :- चिंता का कारण सरलता से दूर होना।
(२) बेटी का ब्याह हो जाना।
छाती से लगना :- गले लगना |
छाती से लगाना :- प्यार से गले लगाना।
छाती से लगाकर रखना :- (१) पास ही रखना।
(२) प्रेम से रखना।
बज्र की छाती :- ऐसा कठोर हृदय जो बड़े से बड़ा कष्ट सहकर भी न फटे।
उ. - (क) निकसि न जात प्रान ए पापी फाटते नाहिं बज्र की छाती - २८८२।
(ख) बिहरत नाहिं बज्र की छाती हरि बियोग क्यों सहिए - ३४३५।
[सं. छादिन्, छादी=आच्छादन करनेवाला]
छाती उड़ी जाना - दुख या कमजोरी से जी घबड़ाना।
छाती उमड़ आना - प्रेम या दया से जी भर आना।
छाती छलनी होना - दुख सहते - सहते या कुढ़ते - कुढ़ते जी ऊब जाना।
छाती जलना - (१) अजीर्ण आदि के कारण हृदय में जलन जान पड़ना।
(२) बड़े कष्टों के कारण मानसिक संताप होना।
(३) ईर्ष्या या क्रोध से जी जलना या कुढ़ना।
छाती जरत - (१) कष्ट मिलता है।
उ. - काम पावक जरत छाती लोन लायौ अनि - ३३५५।
(२) जी कुढ़ता है, डाह होती है।
उ. - वह पापिनी दाहि कुल आई देखि जरत मोहिं छाती।
छाती जलाना - (१) मानसिक कष्ट पहुँचाना।
(२) कुढ़ाना, जी जलाना।
छाती जारहु - मानसिक कष्ट दो।
उ. - सूर न होई स्याम के मुख को जाहु न जारहु छाती ३१०६।
छाती जुड़ाना - (१) क्रि. अ. - मन की इच्छा पूरी होना।
(२) क्रि. स. - मन की इच्छा पूरी करना।
छाती ठंडी करना - मन की इच्छा पूरी करना।
छाती ठंडी होना - मन की इच्छा पूरी होना।
छाती ठुकना - हिम्मत बँधना।
छाती ठोकना - कठिन काम करने की हिम्मत बाँधना।
छाती धड़कना - भय या आशंका से जी धक धक होना।
छाती थाम कर (पकड़कर) रह (बैठ) जाना - मानसिक कष्ट या गहरी हानि सहने को लाचार हो जाना।
छाती पक जाना - कष्ट सहते सहते जी ऊब जाना।
छाती पत्थर की करना - भारी कष्ट या गहरी हानि सहने को तैयार होना।
छाती पत्थर की होना - जी इतना कठोर करना कि भारी कष्ट या गहरी हानि सह लेना।
छाती पर फिरना - बारबार याद आना।
छाती भर आना - प्रेम या दया से जी गद्गद् होना।
छाती मसोसना - कष्ट या हानि सहने को लाचार होना।
छाती में छेद होना (पड़ना) - कुढ़ते-कुढ़ते कलेजा छलनी हो जाना
छाती से लगाना - आलिंगन करना।
छाती लै लावत - कलेजे से लगाती हैं।
उ. - निरखत अंक स्याम सुंदर के बारबार लावत लै छाती - २९७७।
छाती सों लाई - कलेजे से लगाकर।
उ. - निसि बासर छाती सों लाई बालक लीला गाई - ३४३५।
[सं. छादिन्, छादी=आच्छादन करनेवाला]
छाती उभरना :- किशोरावस्था के पश्चात स्त्रियों के स्तन उठना या उभरना।
छाती देना :- दूध पिलाना।
छाती भर आना :- (१) दूध उतरना
(२) प्रेम या दया उमड़ना, आँख में आँसू आ जाना।
[सं. छादिन्, छादी=आच्छादन करनेवाला]
छाता लौं छाँह किए सोभित हरि छाती - १२३
धन जो विद्यार्थी को अध्ययन के लिए सहायतार्थ दिया जाय।
बाहरी छात्रों के रहने या ठहरने का स्थान।
वह जिससे छाया या ढका जाय।
गाय के खुर का थल पर बना चिन्ह।
एक पीर जो देवताओं के समान पूजा जाता है।
श्राद्ध आदि के प्रारंभ में गाय के लिए निकाला गया भोजन।
पशु के पैर बाँधने की रस्सी, बंधन, नोई।
परम कुबुद्धि, तुच्छ - रस लोभी, कौड़ी लगि मग की रज छानत - १ - ११४।
अतिशय सुकृत - रहति, अघ - ब्याकुल, बृथा स्रमित रज छानत - १ - २०१।
छानने पर बच रहने वाली मोटी चीज जो छन न सके।
[हिं. छानना+ हार (प्रत्य.)]
[हिं. छानना+ हार (प्रत्य.)]
किस पिसी या तरल चीज को महीन कपड़े के पार इसलिए निकालना कि कूड़ा-करकट या मोटा अंश ऊपर ही रह जाय।
मिली-जुली चीजों को अलग करना।
रस्सी से बाँधना या जकड़न।
बिछ जाना, भर जाना, फैलना। डेरा डालना, बसना, रहना, टिकना।
[सं. षण्णवति, प्रा. षण्णवइ या छः+ नब्बे]
टूटी छानि मेघ जल बरसै टूटे पलँग बिछइये - १ - २३९।
[सं. छादन = छाजन, हिं. छान]
मैं अपने मंदिर के कोनै राख्यौ माख छानि - १० - २८० |
छिपे-छिपे, चुपके से, छिपाकर।
मैदा उज्ज्वल करिके छान्यौ - १००४।
खुदे यर उभरे हुए ठप्पे का निशान।
(१) खुदे या उभरे हुए ठप्पे का निशान।
किसी चीज के गड़ने से बननेवाला चिह्न।
कंकन बलय पीठि गड़ि लागे उर पर छाप बनाए हो - २०११।
(क) दान दिए बिनु जान न पैहौ। माँगत छाप कहा दिखरायो को नहिं हमको जानत। सूरस्याम तब कह्यो ग्वारि सौं तुम मोकौं क्यौं मानत।
(ख) अजुहिं दान पहिरि ह्याँ आए कहाँ दिखावहु छाप - १०८८५
वैष्णवों के अंगों पर मुद्रित शंख, चक्र, आदि के चिह्न, मुद्रा।
मेटे क्यों हूँ न मिटति छाप परी टटकी। सूरदास - प्रभु की छबि हिर दय मौं अटकी।
अन्न की राशि पर लगाया जानेवाला चिह्न, चाँक।
अँगूठी जिस पर अक्षर या नाम का ठप्पा रहता है।
टोकरी जिससे पानी उलीचा जाता है।
(आकृति आदि) चिह्नित करना।
(पुस्तक आदि) मुद्रित करना।
उभरा या खुदा हुआ साँचा या ठप्पे।
ठप्पे या मुद्रा का चिह्न।
वैष्णवों के अंगों में गुदे हुए शंख, चक्र आदि के चिह्न।
शुभ कार्यों में हल्दी आदि से लगाया जानेवाला हाथ का चिह्न, थापा।
अन्नं की राशि पर चिह्न डालने का ठप्पा।
असावधान शत्रु पर वार या धावा।
जिसका पेट छोटा (और सुंदर लगनेवाला) हो।
वह स्थान जहाँ सूर्य आदि का प्रकाश न पड़े।
जल, दर्पण आदि में दिखायी देनेवाली वस्तु या व्यक्ति की आकृति।
जनक - तनया धरी अगिनि मैं, छाया - रूप बनाइ - ९ - ६०।
एक राक्षसी जो छाया पकड़ कर जीवों को खींच लिया करती थी।
वह जिसका शरीर छाया से बना हो, निराकार।
आकाश में दृष्टि स्थिर करैने पर दिखायी देनेवाली छायाकृति।
एक सिद्धांत जिसमें लाक्षणिक प्रयोगों के आधार पर अव्यक्त के प्रति प्रणय, विरह आदि के भाव प्रकट किये जाते हैं।
छायावाद-संबंधी।
छायाबाद के सिद्धांत या उसकी पद्धति का समर्थक।
जहँ जड़भरत कृषी मैं छाये - ५ - ३।
(क) गह्यौ गिरि पानि जस जगत छायौ - १ - ५।
(ख) प्रात इंद्र कोपित जलधर लै ब्रज़मण्डल पर छायौ - ३०२१।
(ग)चक्रवात सकल घोष मैं रज धुंधर ह्वै छायौ - सार ४२८।
डेरा डाला, बसे रहे, टिके।
(क) कहा भयो जो लोग कहत हैं कान्ह द्वारका छायौ।
(ख) किहि मातुल कियौ जगत जस कौन मधुपुरी छायौ - ३०७१।
प्रीति जानि हरि गए बिदुर कैं, नामदेव - घर छायौ - १ - २०।
वनस्पतियों या धातुओं की राख का नमक।
(क) जग मैं जीवतं ही कौ नातौ। मन बिछुरै तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ - १ - ३०२।
(ख) धिक धिक जीवन है अब यह तन क्यों न होइ जरि छार - ९ - ८३।
(ग) लंक जाइ छीर जब कीनी - १० - २२१।
छार-खार करना :- भस्म या नष्ट करना।
पेड़ की शाखा, दहनी आदि का ऊपरी बक्कल।
जे पद कमल सुरसरी परसे तिहुँ भुवन जस छाव - २४८४।
वै देखौ रघुपति हैं आवत। दूरिहिं तैं दुतिया के ससि ज्यौं, ब्योम बिमान महा - छवि छावत - ९ - १६२।
पावस बिबिध बरन बर बादर उड़ि नहि अंबर छावत - २८३५।
छाने (के लिए), तानने या फैलाने (के लिए)।
तीनि पैंड़ बसुधा हौं चाहौं परनकुटी कौं छावन - ८ - १३।
हौं इह बात कहा जानौं प्रभु जात मधुपुरी छावन - ३१०१ और ३१९६।
जिसका ज्ञान इंद्रियों द्वारा हो।
बात या विषय जिसका ज्ञान इंद्रियों द्वारा हो।
जलने या रगड़ने से पड़नेवाला फफोला या झलका।
सुर - मुनि देव कोटि तेंतीसौ कौतुक अंबर छाबैं - १० - ४५।
बिखरती है, फैलती है, भेर जाती है।
गंधबास दस जोजन छावै - ५ - २।
(ख) कंचन मुकुट कंठ मुक्तावलि मोर पंख छबि छावै - २५४९।
कंचन के बहु भवन मनोहर राजा रंक न तृन छावै री - १०उ.८४।
साठ में छः जोड़ने से बननेवाली संख्या।
[सं. षट्षष्टि, प्रा. छाछठि]
बिबिध आयुध घरे, सुभट सेवत खरे, छत्र की छाहँ निरभय जनायौ - ९ - १२९।
छाया, समीपवर्ती सुरक्षित स्थान।
जनि डर करहु सबै मिलि आवहु या पर्वत की छाहँ - ९५७।
सूर स्याम ग्वालनि लए, चले बंसीबटछाहि - ४३१।
जलद (बादल) की छाँही :- शीघ्र नष्ट हो जानेवाली वस्तु।
उ. - (क) जौबन - रूप - राज - धन धरती जानि जलद की छाँहीं - २ - २३।
(ख) जगत पिता जगदीस - सरन बिनु, सुख तीनौं पुर नाहीं। और सकल मैं देखे - ढूँढे, बादर की - सी छाहीं। सूरदास भगवंत भजन बिनु, दुख कबहुँ नहिं जाहीं - १ - ३२३।
छिंगुनिया, छिंगुनी, छिंगुलिया, छिंगुली
शोनित छि छि उछरि आकासहिं गज बाजिन सर लागी। मानौ निकरि तरनि - रंध्रनि तें उपजी हैं अति आगि - ९ - १५८।
जबरदस्ती छीन लेना, बल दिखाकर लेना।
(क) बहुत ढीठ यह भई ग्वालिनी मटुकी लेहु छिंड़ाय।
(ख) डरनि तुम्हरे जाति नहीं लेत दहिंउ छिड़ाय।
नाम चढ़ी रकम आदि काटा जाना।
फलों, तरकारियों आदि का ऊपरी आवरण, छिलका।
सबसे छोटी उँगली, कनिष्टिका।
राम सर लागि भनु आगि गिरि पर जरी उछलि छिच्छिनि सरनि भानु छाए।
तन घन सजल सेइ निसि बासर रटि रसना छिजई - ३३०८।
[सं. क्षिप्त, प्रा. खित्त, छित्त+करण]
प्रकाश फैलना, उजाला होना।
[सं. क्षिप्त, प्रा. खित्त, छित्त+करण]
(पानी आदि द्रव पदार्थ) छिड़कने की क्रिया या मजदूरी।
छिड़कने का काम करना, या इसकी प्रेरणा देना।
(पानी आदि द्रव पदार्थ) छिड़कने का काम।
डरनि तुम्हरे जाति नाहीं लेत दह्यौ छिड़ाइ - ११६७।
(क) अधरपान रस करहिं पियारी मुरली लई छिड़ाय - २४४६।
(ख) आरजपंथ छिड़ाय गोपिकन। अपने स्वारथ भोरी - २८६३।
बिखर जाना, तितरबितर होना।
[सं. क्षिप्त+करण, प्रा. छितकरण, छित्तरण]
छिटकी है, बिखरी हुई है, फैल रही है।
ललित लट छिटकाति मुख पर, देहि सोभा दून - १० - १८४।
इधर-उधर फैलकर, चारों ओर बिखरकर, छितराकर।
(क) छिटकि रहीं चहुँ दिसि जु लटुरियाँ, लटकन - लटकनि भाल। की - १० - १०५।
(ख) दुहुँ कर माट गह्यौ नँदनंदन, छिटकि बूँद - दवि परत अवात - १० - १५९।
(ग) छिटकि रही दधि - बूँद हृदय पर, इत - उत चितवत करि मन मैं डर - १० - २८२।
प्रकाश फैलना, उजाला छाना।
लै पौढ़ी आँगन हीं सुत कौं, छिटकि रही आछी उजियरिया - १० - २४६।
इधर-उधर फैल गये, बिखरे, छितरे।
केस सिर बिन बयन के चहुँ दिसा छिटके झारि - १० - १६९।
भिगोने के लिए पानी की बूँदें डालना।
अमल झकास कास कुसुमिन छिति लच्छन स्वाति जनाए - २८५४।
वह स्थान जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले जान पड़ते हैं।
(सहारे के लिए) थामना, पकड़ना।
जो घना न हो, छितराया हुआ।
छेदने को प्रेरित करना, छेदने देना।
छिदि छिदि जात बिरह सर मारे - ३०७५।
मुरली कौन सुकृत - फल पाए।…..। मन कठोर, तन गाँठि प्रगट ही, छिद्र बिसाल बनाए - ६६१।
दूसरे को दोष देखने या नुक्स निकालनेवाला।
दूसरे के दोष या नुक्स ढूँढ़ना।
दूसरे के दोष दूँढ़ने या नुक्स निकालनेवाला।
पुत्र कबंध अंक - भरि लीन्हौ, धरति न इक छिन धीर - १ - २९।
गैयों के रहने का स्थान, गोशाला, खरिक।
एक प्राचीन गाँव जो वर्तमान मथुरा के पूर्व दक्षिण में प्रायः तीन कोस पर जमुना के दूसरे किनारे स्थिति था। अब यह महाबन कहलाता है। श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था यहीं बीती थी। वर्तमान गोकुल इससे भिन्न नये स्थान पर है।
गोकुलवासियों को चंद्रमा के समान सुख-शांति देनेवाले श्रीकृष्ण।
हिंडोरना झूलत गोकुलचंद - २२८१।
गोकुलनाथ, गोकुलपति, गोकुलराइ
गोकुल के स्वामी श्रीकृष्ण।
गोकुलनाथ नाथ सब जनके मोपति तुम्हरे हाथ - सा, ७६४।
वल्लभी गोसाइयों का एक भेद।
तैलंग ब्राह्मणों का एक भेद।
उतनी दूरी जहाँ, तक गाय का रँभाना सुनाई दे, छोटा कोस।
एक क्षण, दम भर, थोड़ी देर।
(क) नरहरि रूप धरयौ करुनाकर, छिनक माहिं उर नखनि बिदारथौ - १ - १४।
(ख) जैसैं सुपनौं सोइ देखियत, तैसैं यह संसार। जात बिलै ह्वै छिनक मात्र मैं उघरत नैन किवार - २ - ३१।
(कै) इंद्र, हाथ तै बज्र छिनाइ - ६ - ५।
(ख) लियौ सुनि सौं अमृत छिनाइ - ७ - ७।
(ग) ग्वारनि पै लै खाते हैं जूठी छाक छिनाइ - ११२९।
(घ) असुर सब अमृत लै गए छिनाई - ८ - ८।
(ङ) सिंधु मथि सुरासुर अमृत बाहर कियौ, बलि असुर लै चल्यौ सो छिनाई - ८ - ९।
द्रौपदि के तुम वस्त्र छिनाए १२८४।
टाँकी या छैन्नी से कटाना।
भयौं आनंद सुर - असुर कौं देखि कै, असुर तब अमृत करि बल छिनायौ - ८ - ८।
मैं बेटी बृषभानु महर की, मैया तुमकौ जानति। जमुना - तट बहु बार मिलन - भयौ, तुम नाहिंन पहिचानतिं। ऐसी कहि वाक मैं जानति, वह तो बड़ी छिनारि - ७०३।
चोरी रही, छिनारौ अब भयौ, जान्यौ ज्ञान तुम्हारौ। औरै गोप - सुतनि नहिं देखौ, सूर स्याम हैं बारौ - ७७३।
[सं. छिन्न+नारी, पू. हिं. छिनारि]
छिनालपन, छिनालपना, छिनाला
जिसका क्रम ठीक न हो, तितर-बितर।
कान में पहनने का एक गहना।
छिपा लिया, ओट में कर लिया।
च्यवन रिषीस्वर बहु तप कियौ।….। बामी ताकौं लियौ छिपाइ। तासौं रिषि नहिं देइ दिखाइ - ९ - ३।
ढँके हुए, आड़ में किये हुए, दृष्टि से ओझल किये हुए।
चत फिरत जो बदन छिपाए, भोजन कहा माँगइयै - - १ - २३९।
प्रकट न करना, गुप्त रखना।
छिपाती है, प्रकट नहीं करती।
राधे हरि - रिपु क्यौं न छिपावति - सा, उ, ११।
प्रकट न हुई, गुप्त है, अथष्ट है।
मो सम कौन कुटिल खल कामी। तुम सौं कहा छिपी करुनामय, सब कैं अंतरजामी - १ - २४८।
सो हत्या तिहि लागी धाइ। छिप्यौ सो कमलनाल मैं जाइ - ६ - ५।
(१) घृणित वस्तु, घिनौनी चीज।
[सं. क्षिम, प्रा. छिव, हिं. छिः]
मल और वमन के समान घृणित समझ कर, घिना कर।
उ. - जन्म तें एक टक लागि आसा रही विषय - बिष खात नहिं तृप्ति मानी। जो छिया छरद करि सकल संतन तजी, तासु तैं मूढ़मति प्रीति ठानी - १ - ११०।
[सं. क्षिम, प्रा. छिव, हिं. छिः]
[सं. षड्चत्वारिंश, हिं. छः+चालीस]
[सं.घडशीति, पा. छासीति, प्रा.छासी]
भरि गंडूष, छिरक दै नैननि, गिरिधर भाजि चले दै कोकै - १० - २८७।
छिड़कते हैं, (हलके) छींटे डालते हैं।
(क) छिरकत हरद दही, हिय हरषत, गिरत अंक भरि लेत उठाई - १० - १९।
(ख) मिलि नाचत करत कलोल, छिरकत हरददही - १० - २४।
(पानी जैसे द्रव पदार्थ) छिड़कने की क्रिया, छींटों से तर करना।
चोवा - चंदन - अबिर, गलिनि छिरकावन रे - १० - २८।
सोवत लरिकनि छिरक मही सोँ, हँसते चले दै कूक - १० - ३१७।
छिड़कते हैं, छींटें फेंकते हैं।
कनक कौ माट लाइ, हरद - दही मिलाइ, छिरकैँ परस्पर छल - बल धाइके - १० - ३१।
पानी छिड़का, छींटों से तर किया।
चकित देखि यह कहैं। नर - नारी। धरनि अकास बराबरि ज्वाला, झपटति लपट करारी। नहिं बरष्यौ, नहिं छिरक्यौ काहू, कैसै गई बुझाइ - ५९८।
(पानी की) उथली या कम गहरी सतह।
देखि नीर जु छिलछिलौ जग, समुझि कछु मन माहिं। सूर क्यौं नहिं चलै उड़ि तहँ बहुरि उड़िबौ नाहिं - १ - ३३८।
[हिं. छूछा+ला (प्रत्य.), छिछला]
नाक-मुँह से सहसा और सवेग निकलनेवाला वायु का स्फोट। हिंदुओं में किसी काम के आरंभ में छींक होना अशभ माना जाता है।
(क) महर पैठत सदन भीतर, छींक बाई धार। सूर नंद कहत महरि सौं, आज कहा बिचार - ५२४।
(ख) छींक सुनत कुसगुन कह्यौ कहा भयौ यह पाप। अजिर चली पछितात छींक कौ दोष निवारन - ५८९।
छींकते नाक काटना :- जरा जरा सी बात पर चिढ़ना या दंड देना।
पतली डोरी का जाल जिसमें कुछ रखा जाता है, सिकहर।
छींकने लगी, छींक दी। (हिंदुओं में किसी काम के समय छींकना अशुभ माना जाता है)।
जसुमति चली रसोई भीतर, तबहिं ग्वालि इक छींकी। ठठकि रही द्वारे पर ठाढी, बात नहीं कछु नीकी - ५४०।
छींके से, सीके से, सिकहर से।
ग्वाल के काँधे चढ़े तब, लिए छींके उतारि - १० - २८९।
राधे छिरकति छींट छबीली। कुच कंकुम कंचुकि बँर टूटे, लटक रही लट गीली।
[सं. क्षिप्त, प्रा. चित्त]
भभकि कै दंत तें रुधिर धारा चली छींट छबि बसन पर भई भारी - २५९५।
[सं. क्षिप्त, प्रा. चित्त]
कपड़ा जिस पर रंगीन बेल-बूटे हों।
[सं. क्षिप्त, प्रा. चित्त]
छींटे देना, छींटों से भिगोना, छोंटे छितरा कर।
गोरस तन छींटि रही, सोभा नहिं जाति कही, मानौ जल - जमुन बिंब उडुगन पथ केरौ - १० - २७६।
आनन रही ललित पय छीटैं, छाजति छबि तृन तोरे - ७३२।
[सं. षट्सप्तति, प्रा. छसत्तति, पा, छसत्तरि, छहत्तरि]
जिसमें बहुत से छेद हों, झाँझरा।
(क) दिन - दिन हीन - छीन भई काया दुख - जंजाल जटी - १ - ९८।
(ख) बुधि, बिबेक, बलहीन, छीन तन सबही हाथ पराए - १ - ३२०।
पूँछ को तजि असुर दौरि के मुख गह्यौ, सुरन तब पूँछ की ओर लीनी। मथत भए छीन तब बहुरि अस्तुति करी श्री महाराज निज सक्ति दीनी - ८ - ८
बहुरि कह्यौ, सुरपुर कछु नाहिं। पुन्य - छीन तिहिं ठौर गिराहिं - १ - २९०।
गैयों के चरने का स्थान, चरने का स्थान, चरी, चरागाह।
छी छी करना :- घृणा प्रकट करना।
वह शब्द जो कपड़ा धोते समय धोबियों के मुँह से निकलता है।
छीका टूटना :- अनायास ऐसी घटना होना जिससे कुछ लाभ हो जाय।
पशुओं के मुख पर पहनाया जानेवाला जाल।
अब कहि देउ कहत किन यौं कहि माँगत दही धरथौ जो है छीके।
क्षीण होता है, घटता है, ह्रास होता है।
(क) अंजलि के जल ज्यौं तन छीजत, खोटे कपट तिलक अरु मालहिं - १ - ७४।
(ख) बायस अजा सब्द की मिलवनि याही दुख तनु छीजतु - ३३०१।
आयु भग्न - घट - जल ज्यौं छीजै - १ - ३४२।
बिच्छू, भिड़ आदि का डंक मारना।
वल्लभाचार्य के शिष्य, अष्टछाप के एक वैण्णव कवि।
तेरो तन धन रूप महा गुन सुंदर स्याम सुनी यह कीर्ति। सो करु सूर जेहि भाँति रहै पति जनि बल बाँधि बढ़ावहु छीति - ३३९३।
फँसी हुई मछली को बाहर फेंकना।
माता - अछत छीर बिन सुत मरे, अजा - कंठ कुच सेइ - १ - २००।
दूसरे की वस्तु जबरदस्ती ले लेना, हरण करना।
छेनी से काटकर खुरदरा करना।
(दूसरे की वस्तु आदि) छीन कर या जबरदस्ती लेकर।
(क) छल करि लई छीनि मही, बामन ह्वै धायौ - ९ - ११८।
(ख) एक जु हुतो मदन मोहन की सो छबि छीनि लियौ - ३१४७।
देह छिन होति छीनी, दृष्टि देखते लोग - १ - ३२१।
लेत कर छीने-छीने-झपटे लेते हैं।
जेंवतऽरु गावत हैं सारँग की तान कान्ह, सखनि के मध्य कान्ह छाक लेत कर छीने - ४६७।
छिन्न किया, काटकर अलग किया।
नीर हू तैं न्यारौ कीनौ चक्र नक्र - सीस छीनौ, देवकी के प्यारे लाल ऐचि लाए थल मैं - ८ - ५।
छीरसमुद्र, छीरसागर, छीरसिंधु
[सं. क्षीर+समुद्र, सागर, सिंधु]
(क) सागर की लहरि छाँड़ि, छीलर कस न्हाऊँ - १ - १६६।
(ख) अब न सुहात बिषय - रस - छीलर, वा समुद्र की आस - १ - ३३७।
[हिं. छिछला अथवा सं. क्षीण]
(क) बहुत दिननि कौ हुतौ पुरातन, हाथ छुअत उठि आयौ - ९ - २८।
(ख) सूर प्रभु छुअत धनु टूटि धरनी परयौ - २५८४।
हाहा करिए लाल कुँअरि के पायँ छुआई - २४१९।
बिन देखे की मया बिरहिनी अति जुर जरति न जात छुई - २४३३।
लज्जावती नामक एक पौधा जो छूने से मुरझा जाता है।
नाक की लौंग की तरह का एक गहना।
जब ते जग जन्म पाय जीव है कहायौ। तब ते छुट अवगुन इक नाम न कहि आयौ।
साधु - संग, भक्ति बिना, तन अकार्थ जाई। ज्वारी ज्यौं हाथ झारि, चाले छुटकाई - १ - ३३०।
मुक्त करना, छुटकारा देना।
छुड़ाया, मुक्त किया, छुटकारा दिलाया।
हा करुनामय कुंजर टेरयौ, रयौ “हीं बल थाकौ। लागि पुकार तुरत छुटकायौ, काट्यौ बंधन ताकौ - १ - ११३।
चिंतत ही चित मैं चिंतामनि, चक्र लिए कर धायौ। अति करुना - कातर करुनामय, गरुड़हु कौ छुटकायौ - ८ ३।
देह छुटत :- प्राण निकलते ही।
उ. - मेरी देह छुटत जम पठए दूत - १ - १५१।
कोउ अपने जिय मान करै माई हो मोहि तौ छुटति - अति कँपनी - १६६२।
भुजा छुड़ाइ, तोरि तृन ज्यौं हित, कियौं प्रभु निठुर हियौ - ९ - ४६।
राज - रवनि सुमिरे पति - कारन, असुर - बंदि तैं दिए छुड़ाई - १ - २४।
कै हौं पतित रहौं पावन हवै, कै तुम बिरद छुड़ाऊँ - १ - १७९।
जहँ जहँ भीर परै भक्तनि कौं, तहँ तहँ जाइ छुड़ाऊँ - १ - २७२।
जब गज गह्यौ ग्राह जल - भीतर, तब हरि कौं उर ध्याए (हो)। गरुड़ छाँड़ि, आतुर हैवै धाए, तो ततकाल छुड़ाए (हो) - १ - ७।
दूसरे के अधिकार से निकालना।
क्रिया या प्रवृत्ति को दूर करना।
गाय-भैंस का दूध देना बंद होना।
(क) तब गज हरि की सरनहिं आयो। सूरदास प्रभु ताहि छुड़ायो।
(ख) ताकौ चरन परसि के माधव दुःखित साप छुटायो - सारा.८२३।
छुड़ाते हैं, साफ करते हैं।
राहु केतु मानहु सुमीड़ि बिधु आँक छुटावत धोयौ - ३४८२।
लोक - लाज सब छुटि गई, उठि धाए सँग लागे हो) - १ - ४४।
सैर जिसमें कच्ची रसोई का स्वयं प्रबंध किया जाय।
सुनहला-रुपहला फीता या गोट।
जब गजेंद्र कौ पग तू गैहै। हरि जू ताकौ अनि छुटै है - ८ - २।
वह दिन जब दैनिक कार्य न करना हो।
मैं मेरी अब रही न मेरैं, छुट्यौ देह अभिमान - २ - ३३।
छुद्र पतित तुम तारि रमापति, अब न करौ जिय गारौ - १ - १३१।
करधनी जिसमें बहुत से धुँघरू लगे हों।
रुद्रपति, छुद्रपति, लोकपति, वाकपति, धेरनिपति गगनपति, अगम बानी - १५२२।
क्षुद्रघंटिका, किंकिणी, करधनी।
अंग - अभूषन जननि उतारति। …..। क्षुद्रावली उतारति कहि सौंंति धरति मनहीं मन वारति - ५१२।
छोड़ने का काम कराना या इसकी प्रेरणा देना।
खंभ औं प्रगट ह्वौ जन छुड़ायौ - १ - ५।
अंत औसर अरध - नाम उच्चार करि सुम्रत गज ग्राह तैं तुम छुड़ायौ - १ - ११९।
(क) दुस्सासन कटि - बसन हुड़ावत, सुमिरत नाम द्रौपदी बाँची - १ - १८।
(ख) इहिं अवसर कह बाँह छुड़ावत, इहिं डर अधिक डरयौ - १ - १५६।
छोड़ो, अलग करो, (अपने पास से) दूर करो।
जहाँ जहाँ तुम देह धरत हौ, तहाँ तहाँ जनि चरन छुड़ावहु - ४५०।
दुस्सासन कटि - बसन छुड़ावै १ - २४६।
देखि छुधा तैं मुख कुम्हिलानौ, अति कोमल तन स्याम - ३६१।
(क) माधौ, नैंकु हटकौ गाइ।….। छुधित अति न अघाति कबहूँ, निगम - द्रुम दलि खाइ - १ - ५६।
(ख) छिन छिन छुधित जान पय - कारन, हँसि हँसि निकट बुलाऊँ - १० - ७५।
खौलते घी-तेल में तली जानेवाली चीज के पड़ने पर होने वाला शब्द
पैर के घुँघरूदार आभूषणों का शब्द।
छुरी चलना :- छुरी से लड़ाई होना।
किसी पर छुरी चलाना :- बहुत कष्ट देना।
छुरी तेज करना :- हानि पहुँचाने की तैयारी करना।
छुरी फेरना :- भारी हानि पहुँचाना।
नल अरु नील बिस्वकर्मा - सुत, छुवत पषान तथौ - ९ - १२२।
छूते हो, दौड़ की बाजी में पकड़ते हो।
ज्ञानिकै मैं रह्यौ ठाढौ, छुवत कहा जु मोहिं - १० - २१३।
अबहिं सिला तैं भई देव - गति जब पग - रेनु छुवाई - ९ - ४०।
ये दससीस ईस - निरमालय, कैसैं चरन छुवाऊँ - ९ १३२।
छुआते हैं, स्पर्श कराते हैं।
षटरस के परकार जहाँ लगि, लै लै अधर छुवावत - १० ८६।
माखन खात अचानक पावै, भुज भरि उरहि छुवावै - १० - २७२।
आरि करत कर चपल चलावत, नंद - नारिआनन छुवै मंदहिं - १० - १०७।
एक प्रकार का खजूर, जिसका फल खाने में मीठा होता है।
ऊधौ, मन माने की बात। दाख छुहारा छाँड़ि कै बिष कीरा बिष खात।
सोबत काम छुयो तन मेरौ - ९ - ८३।
(फँसे, उलझे या झगड़ने वालों को) छुड़ाकर, अलग करके, हटाकर।
मुख - छबि कहा कहाँ बनाइ।...। अमृत अलि मनु पिवन आए, आइ रहे लुभाई। निकसि सर तैं मीन मानौ लरत कीर छुराइ - २५२।
लज्जावती पौधा जिसकी पत्तियाँ छूते ही मुरझा जाती हैं।
वह समय जब धर्मकर्म नहीं किये जाते।
बच्चा पैदा होने पर छः दिन का सूतक काल।
कार्य के अंग-विशेष पर ध्यान न देना।
कार्य या व्यवहार विशेष की स्वतंत्रता।
दूर होते (हैं), नहीं रहते।
(क) मोसौं पतित न और गुसाई। अवगुन मोपैं अजहुँ न छूटत, बहुत पच्यौ अब ताई - १ - १४७।
(ख) ना हरि - भक्ति, न साधु - समागम, रह्यौ बीचहीं लटकौं। ज्यौं बहु कला का छि दिखरावै, लोभ न छूटत नट कैं - १ - १९२।
बिबिध सत्र छूटत पिचकारी चलत रुधिर की धार - सारा, २६।
अलग रहना, मान करना, टकारा पाना, दूर हटना।
सुनि राधे रीझे हरि तोकों अब उनते तुम छूटति हो - पृ. ३१ (८०)।
लगाव या संबंध न रहना, दूर होना
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
शरीर (प्राण) छूटना :- मृत्यु होना।
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. तुच्छ, प्रा. चुच्छ, छुच्छ]
छूँछा हाथ :- (१) पास में धन न होना।
(२) पास में हथियार न होना।
(३) साथ में कोई चीज न लाना।
[सं. तुच्छ, प्रा. चुच्छ, छुच्छ]
[सं. तुच्छ, प्रा. चुच्छ, छुच्छ]
पैठे सखनि सहित घर सूनौं, दधि - माखन सब खाए। छूँछी छाँड़ि मटुकिया दधि की, हँसि सब बाहिर आऐ - १० - २६०।
तो हूँ प्रश्न तुम्हारे छूँछे।
छु बनना (होना) :- उड़ जाना।
छूछू बनाना :- मूर्ख बनाना।
छूमंतर :- जादू या मंत्र की फूँक।
छू मंतर होना :- गायब हो जाना।
अस्पृश्य को न छूने का विचार, भाव या रीति।
गाय या पशु हाँकने की लकड़ी।
गाय या पशु हाँकने की लकड़ी।
(क) गोझा बहु पूरग पूरे। भरि भरि कपूर रस चूरे।
(ख) गोझा गूँदे गाल मसूरी - २३२१
छूटी अलक भुअंगनि कुच तट पैठी त्रिबलि निकेत - १९२३।
तन छूटे :- मृत्यु होने पर।
उ. - जीवत जाँचत कन कन निर्धन, दर-दर रटत बिहाल। तन छूटे हैं धर्म नहीं कछु, जौ दीजै मनि-माल - ११५९।
देखत कपि बाहुदंड तन प्रस्वेद छूटे - ९ - ९ - ७।
बिखर गये, बँधे या कसे न रहे।
छूटे चिहुर बदन कुम्हिलाने ज्यों नलिनी हिमकर की मारी—३४२५।
अलग होता है, छूट सकता है, दूर होता है।
तू तौ बिषया - रंग रँग्यौ है, बिन धोए क्यौं छूटै - १ - ६३।
छुटूँ, मुक्त होऊँ, मुक्ति पाऊँ।
घर मैं गथ नहिं भजन तिहारौ, जौन दियॆ मैं छूटौं - १ - १८५।
मुक्ति पाओगे, बंधनमुक्त होगे।
रामनाम बिनु क्यौं छूटौगे, चंद गहैं ज्यौं केत - १.२९६।
सुमिरते ही अहि डस्थौ पारधी, कर छूट्यौ संधान - १ - ९७।
गंदी या अपवित्र चीज को स्पर्श।
[सं. छुप, प्रा. छुव+ना (प्रत्य.), पू. | हिं. छुवना]
दान देने के लिए किसी चीज का स्पर्श करना।
दौड़ या खेल में किसी को पकड़ना।
बहुत कम व्यवहार में लाना।
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
[सं. हुट=(बंधन आदि) काटना]
छूट गए-छट जाने पर, अलग होने पर
तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान छूटि गऐ कैसे जन जीवत, ज्यौं पानी बिनु पान - १ - १६९।
जानति हौं, बली बालि सौं न छूटि पाई - ९ - ११८।
(युद्ध में शक्ति आदि) चल पड़ी।
इंद्रजीत लीन्ही तब शक्ती, देवनि हहा करयौ। छूटी बिजु - रासि वह मानौ, भूतल बंधु परयौ - ९ - १४४।
(अशुद्धि) काटना या मिटाना।
[सं. क्षिप्त, प्रा. छित्त]
बेन बारानसि मुक्ति - छेत्र है - १ - ३४०।
काटनेछीलने का चिह्न-छल छेव-छल-कपट के दाँव।
जनिति नहीं कहाँ ते सीखे चोरी के छल छेव - ३११४।
छीलने-काटने का काम, आघात या चिह्न।
फाड़े या फटे हुए दूध का खोया, पनीर।
छेम - कुसल अरु दीनता, दंडवत सुनाई। कर जोरे बिनती करी, दुरबल - सुखदाई - १ - २३८।
सूरदास प्रभु - कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै।
काटने-छीलने के लिए किया गया आघात या वार।
जसुदा, नार न छेदन दैहौं। मनिमय जटित हार ग्रीवा कौ, वहै आजु हौंलैहौं - १० - १५।
(क) जारौं लंक, छेदि दस मस्तक, सुरसंकोच निवाडौँ - ९ - १३२।
(ख) दसमुख छेदि सुपक नव फल ज्यौं, संकर - उर दससीस चढ़ावन - ९ - १३१।
रावन के दस मस्तक छेदे, सर गहि सारँगपानि १ - १३५।
बना-ठना, बाँका, सुंदर और रसिक पुरुष।
सुपारी, धनिया इलायची आदि का भुना हुआ मसाला।
कंकड़ पत्थर का छोटा टुकड़ा।
चौपड़, शतरंज आदि का मोहरा
गोटी जमना (बैठना) :- उपाय लग जाना।
गोटी जमाना (बैठाना) :- उपाय लगाना।
गो - सुत गोठ बँधन सब लागे, गो - दोहन की जूनटरी - ४०४।
काटने छीलने का काम, अघात या चिह्न।
यह कहि पारथ हरिपुर गऐ। सुन्यौ, सकल जादव छै भऐ - १ - २८६।
सार बेद चारौ को जोइ। छैऊ सास्त्र - सार पुनि सोइ - ७ - २।
छै जाना :- छेद को फटकर फैलना।
बचाव का स्थान, शरण, संरक्षा।
बसत तुम्हारी छैयाँ :- तुम्हारी ही शरण हैं, तुम्हारे ही अधीन हैं।
उ. - खेलत मैं को काको गुसैयाँ।…..। जाति - पाँति हेमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ - १० - २४५।
(क) बिसकर्मा सूतहार, रच्यौ काम ह्व सुनार, मनिगन लागे अपार, काज महर - छैया - १० - ४१।
(ख) भूतनु के छैपा, आस पास के रखैया और काली नथैया हू ध्यान इतै न चलै।
रँगीले-सजीले युवक, बाँके शौकीन जवान। छैलनि कै संग यौं फिरै, जैसैं तनु संग छाई (हो)--।
ईख को छीलकर फेंकी हुई पत्ती।
गन्ने की गँडेरी का चीफुर।
[सं.शावक, प्रा. छावक+ रा (प्रत्य.)]
छोकड़िया, छोकड़ी, छोकरिया, छोकरी
बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ौ को छोट - १ - २३२।
आकार, डील-डौल या बड़ाई में कम।
पद-प्रतिष्ठा या मान-मर्यादा में कम।
जौ तुम पतितनि के पावन हौ, हौं हूँ पतित न छोटौ - १ - १७९।
संबंध न रहना, नाता छूटना।
किसी पकड़ी हुई वस्तु को पकड़ से अलग करना।
किसी लगी या चिपकी हुई वस्तु का अलग हो जाना।
बंधन से मुक्ति या छुटकारा देना।
अपराध क्षमा करना, दंड न देना।
जो गंभीर या उदार न हो, ओछा।
कोटि द्वैक जलही घरे, यह बिनती इक छोटि - ५८९।
आकार या विस्तार में कम ही, छोटी ही।
छोटौ बदन छोटियै झिगुली, कटि किंकिनी बनाइ - १० - १३३।
जो बड़ी न हो, कम आकार की।
छोटी छोटी गोड़ियाँ, अँगुरियाँ छबीली छोटी, नख - ज्योति मोती मानौ कमल - दलनि पै - १० - १५१।
जे छोटी तेई हैं खोटी साजति भाजति जोरी - १६२१।
पास न रखना, त्यागना, अलग करना।
किसी स्थान आदि से आगे बढ़ जाना।
किसी काम को करते-करते बंद कर देना।
(पिचकारी, आतशबाजी आदि) चलाना।
बाकी रखना, काम में न लाना।
छोपना छापना- ठीक करना, बनाना।
परी पुकार द्वार गृह गृह ते सुनहु सखी इक जोगी आयो। पवन सधावन भवन छोड़ावन नवल रिसाल गोपाल पठायौ - २९९९।
दुख-क्रोध-जनित चित्त की विचलता।
रसना द्विज दलि दुखित होति बहु, तउ रिस कहा करै। छमि सब छोभ जु छाँड़ि छवौ रस लै समीप सँचरै - १ - ११७।
नदी, तालाब आदि का उमड़ना।
चित्त का दुख-क्रोध से विचलित होना।
आजु अति कोपे हैं रन राम।…..। छोभित सिंधु, सेष - सिर कंपित, पवन भयौ गति पंग - १५८।
किसी वस्तु के दोनों ओर का किनारा।
मात पिता बंदि ते छोराए - २६३१।
नोच-खसोट, छीना-झपटी। झगड़ा, बखेड़ा, झंझट।
(क) सूर प्रभु मारि दसकंध, थापि बंधु तिहिं. जानकी छोरि जस जगत लीजै - ९ - १३६।
(ख) नृपन को छोरि सहदेव को राज दियो देव नर सकल जै जै उचारयौ - १० उ. ५१।
जोरि अंजलि मिले, छोरि तंदुल लए, इंद्र के बिभव तैं अधिक बाढ़ौ - १ - ५।
जरासिंधु को जोर उघारौ, फारि कियौ दै फाँकौ। छोरी बंदि बिदा किए राजा, राजा हृ गए राँकौ - १ - ११३।
बीचहिं मार परी अति भारी, राम लछमन तब दरसन पाए। दीन दयालु बिहाल देखिकै, छोरी भुजा, कहाँ तें आए १ - ९ - १२०।
जाके गुननि गुथति माल कबहूँ उर ते नहिं छोरी - १० उ. ११६।
त्रेताजुग इक पत्नी ब्रत किए सोऊ बिलपति छोरी - २८६३।
कोटि छ्यानबे नृप - सेना सब जरासंध बँध छोरे - १ - ३१।
स्त्रियों के पैर का एक गहना।
जलने, कुढ़ने या ईर्ष्या रखनेवाला।
[हिं. गोड़ा+हरा (प्रत्य.)]
बृंदाबन के तृन न भए हम लगत चरन कै छोर।
खोलकर, छुड़ाकर, मुक्त करके।
बंधन छोर पिता माता के अस्तुति करि सिर नायौ - सारा, ५२९।
छोड़ते हैं, बंधन से मुक्त कराते हैं।
(क) आपु बँधावत भक्तनि छोरत, बेद बिदित भई बानी - १० - ३४३।
(ख) ब्रज - प्यारौ, जाकौ मोहिं गारौ, छोरत काहे न ओहि - ३७५।
छोड़ने (के लिए), (बंधन से) मुक्त करने को।
जाहु चली अपनौं अपनौं घर। तुमहीं सबनि मिलि ढीठ करायौ, अब आई छोरन बर - १ - ३४५।
[सं. छोरण = परित्याग, हिं. छोड़ना]
मुक्त करना, छुटकारा देना।
[सं. छोरण = परित्याग, हिं. छोड़ना]
[सं. छोरण = परित्याग, हिं. छोड़ना]
[सं. शावक, हिं. छावक +रा (प्रत्य.)]
बिनवै चतुरानन कर जोरे। तुव प्रताप जान्यौ नहिं प्रभु जू करै अस्तुति लट छोरे - ४८८।
अंग अंग आभूषन छोरैं - ७९९।
छुड़ावे, बंधन से मुक्त कराता है।
(क) बाँधौं आजु कौन तोहिं छोरै - १० - ३४४।
(ख) कोउ छोरै जनि ढीठ कन्हाई। बाँधे दोउ भुज ऊखल लाई - ३९०।
जिय परी ग्रंथ कौन छोरै निकट ननद न सास - पृ. ३४८ (५७)।
छोड़ दिया, बंधन से मुक्त किया।
जब जब बंधन छोरयौ चाहहिं. सूर कहै यह कोवै - ३४७।
कलेजा छोलना :- बहुत व्यथा देना।
छीलने, खुरचने या छेद करने का औजार।
ऊधो मन माने की बात। दाख छोहारा छाँड़ि कै बिष कीरा बिष खात।
पशु का चौकड़ी भरते हुए कूदना या झपटना।
[सं. चतुष्क, प्रा. चउक्क]
मनौ मधुर मरालछौना, किंकिनी कल - राव - १ - ३०७।
[सं. शावक, प्रा. छाव+औना (प्रत्य.)]
छोलि धरे खरबूजा केरा। सीतल बास करत अति घेरा - ३९६।
(क) नंद पुकारत रोइ बुढ़ाई मैं मोहिं छाँड्यौ।….। यह कहिकै धरनी गिरत, ज्यौं तरु कटि गिरि जाइ। नंद - घरिन यह देखिकै कान्हहिं टेरि बुलाई। निठुर भए सुत आजु, तात की छह न आवति - ५८९।
(ख) माई जसुदा देखि तोकौं करति कितनौ छोह - ७०७।
मोसौं कहत तोहिं बिनु देख, रहत न मेरौ ‘प्रान। छोह लगति मोकौ सुनि बानी, महरि तुम्हारी आन - ७२३।
(१) विचलित या क्षुब्ध होना।
प्रेम या दया का व्यवहार करना।
[सं. शावक, प्रा. छावक, छाव+रा (प्रत्य.)]
मो आगे को छोहरा :- मेरे सामने का लड़का, बहुत छोटा या अनजान बालक।
उ. - (क) मो आगे को छोहरा जीत्यौ चाहै मोहिं - ११३१।
(ख) भले रे नंद के छोहरा डर नहीं कहा जो मल्ल मारे बिचारे - २६१२।
प्रेम, प्रीति या स्नेह करना।
मधु - मेवा - पकवान - मिठाई माँगि लेहु मेरे छौना - १० - १९२। .....|
[सं. शावक, प्रा. छाव+औना (प्रत्य.)]
[सं. क्षर = नाश्वान्, नष्ट]
[सं. क्षर = नाश्वान्, नष्ट]
कोटि छ्यानबे मेघ बुलाए अनि कियौ ब्रज डेरौ - ९५९।
[सं. षण्सावति, प्रा. षण्सावइ या छ + नब्बे]
[पू. हिं. छुवना, हिं. छूना]
छवै आवै-छू, लेता है, अपवित्र कर देता है।
पाँडे नहिं भोग लगावन पावै। करि - करि पाक जबै अर्पत है, तबहीं तब छुवै अवै - १० - २४९।
चवर्ग का तीसरा अल्पप्राण व्यंजन; इसका उच्चारण तालु से होता है।
जंगल में मंगल :- सूनसान जगह में चहल-पहल।
दुपट्टे के किनारे की कढ़ाई।
(क) तिन मोकौं आज्ञा करी, रचि सब सृष्टि बनाइ। थावर - जंगम, सुर - असुर, रचे सबै मैं आइ - २ - ३६।
(ख) थावर - जंगम मैं मोहिं जानै। दयासील, सबसौं हित मानौं - ३ - १३।
जो इधर-उधर हटाया या रखा जा सके।
चलने की क्रिया, शक्ति या क्षमता।
मन में निश्चय होना, मन को ठीक लगना।
जँचा-तुला :- सधा हुआ, ठीक-ठीक।
जाँचा जाना, देखाभाला जाना।
सोधि सकल गुन काछि दिखायौ, अंतर हो जो सच्यौ। जौ रीझत नहिं नाथ गुसाई, तौ कह जात जँच्यौ - १ - १७४।
मंद स्वर में जप करनेवाला।
प्रपंच, झंझट, कपट, संकट, कुचक्र।
(क) सूर - प्रभु नंदलाल, मारथौ दनुज ख्याल, मेटि जंजाल ब्रज - जन उबायौ - १० - ६२।
(ख) गाई लेहु मेरे गोपालहिं। नातरु काल - ब्याले' लेतै है, छाँड़ि देहु तुम सब जंजालहिं - १ - ७४
(ग) मुरछि का हैं गिरे धरनी, कहा यह जंजाल। मैं यहाँ जो आइ देखौं, परे सब बेहाल - ५०४।
(घ) कह्यौ। प्रहलाद पढ़त मैं सार। कहा पढ़ावत और जँजार - ७ - २।
(क) जानु - जंघ त्रिभंग सुंदर, कलित कंचन दंड - १ - ३०७।
(ख) कर कपोल भुज धरि जंघा पर लखति माई नखन की रेखनि - २७२२।
(क) निसिदिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम बिगोइसि। गोड़ पसारि परयौ दोउ नीकैं, अब कैसी कह होइसि - १ - ३३३।
(ख) सूर सो मनसा भई पाँगुरी निरखि डगमगे गोड़ - १३५७।
(ग) सैल से मल्ल वै धाइ आये सरन कोऊ भले लागे तब गोड़ पर थरथराने - २५९६।
गोड़ भरना :- (१) पैर में महावर लगाना।
(२) वर के पैर में महावर लगाना।
[हिं. गोइँड़+ऐत (प्रत्य.)]
[हिं. गोइँड़ +ऐत (प्रत्य.)]
चिट्टी ले जानेवाला पुराना कर्मचारी।
[हिं. गोइँड़ +ऐत (प्रत्य.)]
कुछ गहराई तक मिट्टी खोदना, पेड़ की जड़ के पास की मिट्टी खोदना।
(किसी काम को) बिगाड़ देना।
मानमंदिर जहाँ से नक्षत्रों की गति, स्थिति आदि देखी जाती है।
गीत जो चक्की चलाते समय स्त्रियाँ गाया करती हैं।
चक्की गाड़ने या जमाने का स्थान।
[सं. यंत्रशाला, हिं. जाँता]
(क) सबै तजि भजिऐ नंदकुमार। और भजे हैं काम सरै नहिं. मिटै न भव - जंजार - १ - ६८।
(ख) करि तप बिप्र जन्म जब लीन्हो मिल्यौ जन्म जंजाल - सारा, ६१६।
(ग) हृदय की कबहुँ न पीर घटी। दिन दिन हीन छीन भई काया दुख जंजाल जटी।
(घ) भव जंजाल तोरि तरु बन के पल्लव हृदय बिदारयौं।
(च) अंगपरसि मेटे जंजाला - ७९९।
जंजाल में पड़ना (फँसना) :- कठिनता या संकट में पड़ना।
परिहै बहुरि जँजाला :- उलझन में फँसेगा, संकट में पड़ जायगा।
उ. - बार बार मैं तुमहिं कहति हौं परिहै बहुरि जँजाला - १०३८।
बखेड़ा करनेवाला, झगड़ालू, उलझनी।
[हिं. जंजाल+इया, ई (प्रत्य.)]
जंजीर डालना :- बाँधना, बेड़ी डालना।
जंजीर पड़ना :- जंजीर से जकड़ा जाना।
सातौं द्वीप कहे सुक मुनि ने सोइ कहत अब सूर। जंबु, प्लक्ष, क्रौंच, साक, साल्मलि, कुस, पुष्करे भरपूर - सारा, ३४।
(क) सिंह रहै जंबुक सरनागत देखी सुनी न अकथ कहानी - पृ. ३४३।
(ख) कृष्न सिंह बलि धरी तिहारी लेबे को जंबुक अकुलात - १० उ. ११।
पारसियों का प्राचीन धर्म ग्रंथ।
जंदरा ढीला होना :- (१) कल-पुरजे बेकार होना।
(२) थकावट से हाथ पैर सुस्त होना।
साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बेल ये सब डासै धोइ। जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोइ - १ - २६२।
नैन चपलता कहाँ गँवाई।…..। मनौ अरुन अंबुज पर बैठे मत्त भृंग रस आई। उड़ि न सकत ऐसे मतवारे लागत पल्क जँभाई - २००५।
जँभाई लेते हैं, जँभाते हैं।
(क) खीझत जात माखन खात। अरुन लोचन, भौंह टेढ़ी, बार - बार जँभात - १०.१००।
(ख) बदन जँभात, अंग ऐंड़ावत - १० - २४२।
जंबुखंड, जंबुद्वीप, जंबुध्वज, जंबूखंड, जंबूद्वीप
सात पौराणिक द्वीपों में से एक जो पृथ्वी के मध्य में स्थित है और खारे समुद्र से घिरा है।
जंबू वृक्ष कहो क्यों लंपट फलवर अंबु फरै - ३३११।
एक दैत्य जो महिषासुर का पिता था और इंद्र द्वारा मारा गया था।
पौढ़ि गई हरुऐं करि आपुन, अंग मोरि तब हरि जँभुआने - १० - १९७।
कूदना, उछलना, छलाँग मारना।
धन के रक्षक भूत-प्रेत, यक्ष।
हुती जिती जग मैं अधमाई सो मैं सबै री। अर्धम - समूह उधारन - कारन तुम जिय जक पकरी - १ - १३०।
उत होरी पढ़त ग्वार इत गारी गावति ए नंद नहीं जाये तुम महरि गुनन भारी - २४२६।
मोल की बिधु कीजिए, उर बिनु गुनन की माल - सा, ८८।
काहे न निस्तारत प्रभु, गुननि अंगनि - हान - १ - १८२।
सूर राधिका गुनभरी कोउ पार न पावै - १५४५।
[सं. गुण + हि. भरना, भरी]
ज्ञाननमनि, विद्यामनि, गुनमनि, चतुरनमनि चतुराई - १७७०।
लवण का गुण, खारापन, खारा।
सिंधुजा गुन लवन कीन्हो अंत ते पहिचान - सा, ११४।
जिसमें गुण हों, जो गुणवान हो।
[सं, गुण + वंत (प्रत्य.)]
गोड़ी जमना (लगना) :- लाभ या सफलता होना।
गोड़ी हाथ से जाना :- हानि होना।
गोड़ी आना (पड़ना) :- किसी का चरण पड़ना, आना।
(क) राम भक्त - बत्सल निज बानौ। जाति, गोत, कुल, नाम गनत नहिं. रंक होइ कै रानौं - १ - ११।
(ख) तुम बड़े जदुबंस राजा मिले दोसी गोत - २६८२।
(ग) इतनिक दूरि भये कुछ औरे बिसयौ गोकुल गोत - ३३६४।
(क) ज्यों त्रिदोस उपजे जक लागत बोलति बचन न सूधो - ३०१३।
(ख) जागते सोवत स्वप्न दिवस निसि कान्ह कान्ह जक री - ३३६०।
जक बँधना :- रट या धुन लगना।
(अंगों का) हिल-डुल न सकना।
चकित या भौचक्का होना, अचंभे में आना।
जई डालना :- अंकुर निकालने के लिए किसी अन्न को तर स्थान में रखना।
फूलों की बतियाँ जिनमें फूल भी लगा रहता है।
परस परम अनुराग सचि सुख लगी प्रमोद जई - १३००।
इतनी जउ जानत मन मूरख, मानत याही धाम - १ - ७६।
मानसिक दुख का आधात, सदमा।
जग जानत जदुनाथ, जिते जन निज भुज - स्रम - सुख पायौ - १ - १५।
(क) चलिए बिप्र जहाँ जग - बेदी बहुत करी मनुहारी - ८ - १४।
(ख) जग अरंभ करि नृप तहँ गयौ - ९ - ३।
जकड़ कर, अच्छी तरह बाँध कर, कड़ा बंधन करके।
(क) सूरदास प्रभु कौं यौं राखौ, ज्यौं राखिऐ, गजमत्त जकरि कै - १० - ३१८।
(ख) अब मैं याहि जकरि बाँधौंगी, बहुतै मोहिं खिझायौ। साँटिनि मारि करौं पहुँनाई, चितवत कान्ह डरायौ - १० - ३३०।
(ग) कोकौ ब्रज माखन दधि काकौ, बाँधे जकरि कन्हाई - ३७५।
तरु दोउ धरनि गिरे भहराइ।…...। घरिक लौं जकि रहे जहँ तहँ देहगति बिसराइ - ३८७।
हरि - मुख किधौं मोहिनी भाई। ….। सूरदास प्रभु बदन बिलोकते जकित थकित चित अनत न जाई।
संसार के प्राणाधार, ईश्वर।
जे जन सरन भजे बनबारी। ते ते राखि लिए जगजीवन, जहँ जहँ बिपति परी तहँ टारी - १ - २२।
तीन अक्षरों का एक गण जिसमें लघु, गुरु, लघु (जैसे महेश) का क्रम रहता है।
विश्व, संसार। (श्री वल्लभाचार्य और सूर के विचार से ‘जगत' ब्रह्म का सत्-अंश होने के कारण सत्य है और ‘संसार’ अहंता-भ्रमतात्मक माया-जन्य होने के कारण मिथ्या है। ब्रह्म की सत् शक्ति से उत्पन्न सृष्टि जगत है और अध्यास से उत्पन्न सृष्टि संसार है।)
कुएँ के चारो तरफ का ऊँची चबूतरा।
देखौ री जसुमति बौरानी। -। जानत नाहिंजगत - गुरु माधौ, इहिं आए आपदा नसानी - १० - २५८
विश्व की सृष्टि करने वाले, सष्टिकर्ता।
संसार से सबसे श्रेष्ट, परमेश्वर।
जहाँ बसत जदुनाथ जगतमनि बारक तहाँ आउ दै फेरी - २८५२।
जिसकी संसार वंदना करता है, संसार में वंदनीय।
नंदनंदन जगतवंदन धरे नटवर बेस - १० उ.९४।
बहुत धनी और विख्यात महाजन।
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ।…..। अस्तुति करन लग्यौ सहसौ मुख, धन्य धन्य जगतात - ५३७।
तुम्हरौ नाम तजि प्रभु जगदीसर, सु तौ कहौ मेरे और कहा बल - १ - २०४।
शंकराचार्य की गद्दी के महंतों की उपाधि।
मनसा देवी जो नागों की बहन और जरत्कारु ऋषि की स्त्री थी।
ज्योतिरूप जगनाथ जगतगुरु, ज्योति पिता जगदीस - ४८७।
पुरी नामक स्थान में विष्णु की मूर्ति जो सुभद्रा और बलभद्र की मूर्तियों के साथ है।
उड़ीसा में समुद्र के किनारे एक प्रसिद्ध तीर्थ।
गोड़ने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
मंडल में घूमने की क्रिया।
[हिं. गोड़ =पाँव+पाई = ताने का सूत फैलाने का ढाँचा]
किसी स्थान पर बार बार आने की क्रिया।
[हिं. गोड़ =पाँव+पाई = ताने का सूत फैलाने का ढाँचा]
[हिं. गोड़ + आरी (प्रत्य.)]
[हिं. गोड़ + आरी (प्रत्य.)]
छोटी छोटी गोड़ियाँ, अँगुरियाँ छबीली छोटी, नख - ज्योती, मोती मानौ कमल - दलनि पर - १० - १५१।
अब धौं कहौ कौन दर जाउँ। तुम जगपाल, चतुर चिंतामनि, दीनबंधु सुनि नाउँ - १ - १६५।
जगह जगह :- सब जगह, हर जगह।
जगा दिया, नींद त्यागने को प्रेरित किया।
परसुराम उनकौं दियौ सोवत मनौ जगाइ - ९ - १४।
नींद से उठाऊँ, सोते से जगाऊँ।
सकुच होत सुकुमार नींद मैं कैसै प्रभुहिं जगाऊँ - ९ - १७२।
यंत्र या सिद्धि आदि का साधन करूँ।
हरि कारन गोरखहिं जगाऊँ जैसे स्वाँग महेस - २७५४।
जगाया, नींद त्याग कर उठने को प्रेरित किया।
सोवत नृप उरबसी जगाए - ९ - २।
उत्तेजित किया, सुप्त भाव को जाग्रत किया।
(क) दादुर मोर पपीहा बोलत सोवत मदन जगाए - २८८३।
(ख) सूरजस्यानी मिटी दरसन आसा नूतन बिरह जगाए - २९५९।
जगमगाती है, चमकती है, दमकती है।
अरुन चरन नख - जोति जगमगात, रुन - कुन करति पाइँ पैजनियाँ - १० - १०६।
मंत्र द्वारा किसी वस्तु में प्रभाव कराना।
[हिं. जगात या फ़ा. जगाती]
[हिं. जगात या फ़ा. जगाती]
नींद त्यागने की प्रेरणा देना।
सुप्त भाव को जाग्रत करना।
उत्तेजित करना, क्रुद्ध करना।
जगाती है, नींद त्यागने को प्रेरित करती है, सोते से उठाती है।
बद्न उघारि जगावति जननी, जागहु बलि गई आँनंद - कंद - १० - २०४।
जगाते थे, उत्तेजित। करते थे।
इहिं बिरियाँ बन ते ब्रज आवते।….। कबहुँक लै लै नाम मनोहर धवरी धेनु बुलावते। इहिं बिधि बचन सुनाय स्याम घन मुरछे मदन जगावते - २७३५।
जगाने, नींद त्यागने या (सोते से) उठाने को।
दासी कुँवर जगावन आई। देख्यौ कुँवर मृतक की नाई - ६ - ५।
जगाती है, निद्रा दूर करती है।
भरि सोवै सुख - नींद मैं, तहाँ सु जाइ जगावै - १ - ४४।
(देवी, योगिनी आदि) प्रभाव दिखाने लगी।
भूमि अति डगमगी, जोगिनी सुनि जगी, सहर - कनसेस कौ सीस काँप्यौ - ९ - १०६।
कर मीड़ति पछिताति बिचारति इहिं बिधि निसा जगी - २७९०।
नींद न आने के कारण अलसाया हुआ, उनींदा।
मंत्र या सिद्धि की। साधना करना।
जगा दिया, नीं से उठा दिया, क्रुद्ध कर दिया।
(१) जगा दिया, नींद से उठा दिया, क्रुद्ध कर दिया।
सोवत सिंह जगायौ :- बलवान व्यक्ति को अपना शत्रु बना लिया; अपने से शक्तिशाली को छेड़ दिया।
उ. - तुम जनि डरपौ - मेरी माता, राम जोरि दल ल्यायौ। सूरदास रावन कुल खोवन, सोवतसिंह जगायौ - ९ - ८८।
व्याकुल धरनी गिरि परे नंद भए बिनु प्रान। हरि के अग्रज बंधु तुरतहीं पिता जगायौ - ५८९।
तीव्र किया, उत्तेजित किया, सुलगाया।
प्रेम उमँगि कोकिला बोली बिरहिनि बिरह जगायौ - १३९२।
नाम जगाओ :- नाम फैलाया, प्रसिद्ध किया।
उ. - त्रिभुवन मैं अति नाम जगायौ फिरत स्याम सँग ही - पृ. ३२२।
नैना ओछे चोर सखी री। स्याम रूप निधि नोखें पाई देखत गए भरी री।…..। कहा लेहि कह तजैं बिवस भए तैसिय करनि करी री। भोर भए भोर सौ हो गयौ धरे जगार परी री - २९१८।
बंसी री बन कान्ह बजावत।…..। सुर - नर - मुनि बस किए राग रस, अधर - सुधा - रस मदन जगावत - ६४८।
नींद से उठाती है, सोते से जगाती है।
प्रातकाल उठि जननि जगावत - सारा, १७०।
चलता-फिरता, हिलता-डोलता, गतियुक्त।
जोग - जग्य - जप - तप - ब्रत दुर्लभ, सो हरि गोकुल ईस - ४८७।
अस्वत्थामा भय करि भग्यौ। इहाँ लोग सब सोवत जग्यौ - १ - २८९।
कमर के नीचे आगे का भाग, पेड़।
वह स्त्री जिसे बच्चा हुआ हो।
(क) दत्तात्रेयऽरु पृथु बेहुरि, जज्ञ पुरुष - बपु धार। कपिल, मनू, हयग्रीव पुनि, कीन्हौ ध्रुव अवतार - २ - ३६।
(ख) जज्ञपुरुष प्रसन्न जब भए। निकसि कुंड तैं दरसन दए।
यज्ञ का भाग जो देवताओं को दिया जाता है।
जज्ञ - भाग नहिं लियौ हेत सौं रिषिपति पतित बिचारे - १ - २५।
सिर के उलझे हुए लंबे-लंबे बाल।
यक्ष, एक प्रकार के देवता जो प्रचेता की संतान और कुबेर के सेवक माने जाते हैं।
जच्छ, मृतु, बासुकी, नाग, मुनि, गंधरब, सकल बसु, जीति मैं किए चेरे - ९ - १२९।
धर्म-कर्म करने और दान देनेवाला।
ययाति जो राजा नहुष के पुत्र थे और जिनका विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से हुआ था।
एक कर जो हिंदुओं से लिया जाता था।
भारतीयों का प्रसिद्ध वैदिक कर्म जिसमें वेद-मंत्रों के साथ हवन और पूजन होता है।
सुनि यह स्याम बिरह भरे।…..। सखिन तब भुज गहि उठाए कहा बावरे होत। सूर प्रभु तुम चतुर मोहन मिलो अपने गोत - ३४२९।
गोता खाना :- (१) डुबकी लगाना।
(२) धोखे में आना।
गोता खात :- धोखे में आते हैं।
उ. - भवसागर मैं पैरि न लीन्हौ।…….। अति गंभीर, तीर नहिं नियरैं, किहिं बिधि उतरयौ जात १ नहीं अधार नाम अवलोकत जित तित गोता खात - १ - १७५ |
गोता देना :- (१) डुबाना।
(२) धोखा देना।
गोता मारना (लगाना) :- (१) डुबकी लगाना।
(२) काम करते-करते बीच-बीच में नागा करना।
(क) नगनिजटित मनि - खंभ बनाए, पूरन बात सुगंध - ९ - ७५।
(ख) आगर इक लोह जटित लीन्ही बरिबंड। दुहूँ करनि असुर हयौ, भयौ मांस - पिंड - ९ - ९६।
जिसके बाल लंबे और उलझे हुए हों।
रामायण का एक गिद्ध जो सूर्य के सारथी अरुण का, उसकी श्येनी नाम्नी स्त्री से उत्पन्न पुत्र था। सीता जी को हर कर लिगे जाते हुए रावण से युद्ध करके यह घायल हुआ। रामचंद्र ने इसकी अंत्येष्टि क्रिया को।
रामायण का एक गिद्ध जो सूर्य के सारथी अरुण का, उसकी श्येनी नाम्नी स्त्री से उत्पन्न पुत्र था। सीता जी को हर कर लिये जाते हुए रावण से युद्ध करके यह घायल हुआ। रामचंद्र ने इसकी अंत्येष्टि क्रिया की।
जिसके लंबी जटा हो, जटाधारी।
एक राक्षस जो द्रौपदी पर मोहित होकर युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और द्रौपदी को हरकर ले जाते समय भीम के द्वारा मारा गया था।
किंकिनी कलित कटि, हाटक रतन जटि, मृदु कर कमलनि पहुँची रुचिर बर - १० - १५१।
जड़ स्वरूप सौं जहँ. तहँ फिरै।असन - बसन की सुधि नहिं धरै - ५ - ३।
(१) वृक्षों या पौधों की मूल जो जमीन के भीतर रहकर उनका पोषण करती है।
एक ऋषि-कन्या जिसका विवाह सात ऋषि-पुत्रों से हुआ था।
दिन - दिन हीन छीन भइ काया दुख - जंजाल जटी - १ - ९८।
जटा को, साधुओं के उलझे हुए बड़े-बड़े बालों को।
जोगी जोग धरत मेन अपनैं, सिर पर राखि जटै - १ - २६३।
जठर जरै :- पेट की अग्नि में जले, गर्भ में यातना भोगे।
उ. - यह मति-मति जानै नहिं कोऊ, किहिं रस रसिक ढरै। सूरदास भगवंत-भजन बिनु फिरि फिरि जठर जरै - १ - ३५।
पेट की गर्मी जिससे अन्न पचता है।
माता-पिता का संतान से वात्सल्य या प्रेम।
बालभाव अनुसरति भरति दृग अग्र अंसुकन आनै। जनु खंजरीट जुगल जठरातुर लेत सुभष अकुलानै - २०५३।
जड़ने का काम, भाव या ढंग।
कुंडल स्रवन कनक मनि भूषित जड़ित लाल अति लोल मीन तन - २५७३।
जड़ उखाड़ना(खोदना) :- हानि पहुँचाना, नाश करना।
जड़ जमना :- दृढ़ या स्थायी होना, स्थिति सम्हलना।
जड़ पकड़ना :- मजबूत होना।
जड़ पड़ना :- नींव पड़ना।
(क) परम कुबुद्धि अजान ज्ञान तैं हिय जु वसति जड़ताई - १ - १८७।
(ख) कहिए कहीं दोष दीजै किहिं अपनी ही जड़ताई - २७८४।
चेष्टा न करने का भाव, स्तब्धता, अचलता।
स्थिति और गति की इच्छा का अभाव।
एक चीज को दूसरी में ठोंक-पीट कर बैठाना।
किसी वस्तु से प्रहार करना।
चुगली खाना, शिकायत करना, कान भरना।
भरत नामक एक ब्राह्मण राजा का हिरन के बच्चे से इतना प्रेम था कि मरते समय, उन्हें उसी की चिंता बनी रही। दूसरे जन्म में वे हिरन की योनि में जन्मे। पुण्य के प्रभाव से उन्हें पिछले जन्म का ज्ञान था। अतएव अगले जन्म में पुनः ब्राह्मण होने पर सांसारिक माया-मोह से अपने को बचाते रहकर वे जड़वत् रहने लगे। अतएव वे जड़भरत के नाम से विख्यात हो गये।
ऐसी भाँति नृपति बहु भाषी। सुनि जड़ भरत हृदय मैं राखी - ५ - ४।
जनि डरथौ मूढ़मति काहू सौं, भक्ति करौ इकसारि - ७ - ३।
जाड़ा सहा, ठंड या सरदी खाई।
छाँड़हु तुम यह टेक कन्हाई। नीर माहिं हम गई जड़ाई - ७९९।
वह वनस्पति जिसकी जड़ से औषध बनती है।
जड़ी-बूटी-जंगली औषध या वनस्पति।
(क) करौं जतन, न भजौं तुमकौं, कछुक मन उपजाइ - १ - ४५।
(ख) माधौ इतने जतन तब काहे को किए - २७२७।
अगम सिंधु जतननि सजि नौका, हठि क्रम - भार भरत - १ - ५५।
गोद का :- (१) छोटा बच्चा जो गोद में ही रहे।
(२) बहुत पास का।
गोद बैठना :- दत्तक बनना।
गोद लेना :- दत्तक बनाना।
गोद देना :- अपने लड़के को दूसरे को इसलिए देना कि वह उसे अपना दत्तक पुत्र बना ले।
(क) सबरी कटुक बेर तजि, मीठे चाखि, गोद भरि ल्याई। जूठन की कछु संक न मानी, भच्छ किए सत - भाई - ११३।
(ख) तिल चाँवरी गोद भरि दीन्ही फरिया दई फ़ारि नव सारी - ७०८।
गोद पसार कर विनती करना (माँगना) :- बहुत दीनता से प्रार्थना करना।
कई गोद पसारि :- अधीरता से विनती करती हैं।
उ. - खूझा मरुग्रा कुंद सौं कहैं गोद पसारी।……..। बार बार हा हा करैं कहुँ हौ गिरिधारी - १८२२।
गोद भरना :- (१) शुभ या विशेष अवसरों पर सौभाग्यवती स्त्री के अंचल में नारियल अदि पदार्थों के साथ आशीर्वाद देना।
(२) संतान होना।
लेहु गोद पसारि :- श्रद्धा भक्ति के साथ ग्रहण करो।
उ. - दियौ फल यह गिरि गोबर्धन लेहु गोद पसारि - ९५०।
गोदना गोदने का काम करने ... ली।
[हिं. गोदना + हर, हारी (प्रत्य.)]
टीका लगाने या गोदना गोदनेवाला।
[हिं. गोदना + हारा (प्रत्य.)]
नुकीली चीज चुभाना या गड़ाना।
कोई काम करने के लिए बार-बार जोर देना
छेड़छाड़ करन’, ताना मारना।
गले की कमानीदार हड्डी, हँसली।
(क) पावक जथा दहत सबही दल तूल - सुमेरु समान - १ - २६९। (ख) तिन मैं कहौ एक की कथा। नारायन कहि उघयौ जथा - ६ - ३।
जैसा चाहिए. वैसा; उपयुक्त, यथोचित।
जथाजोग भेटे पुरवासी, गए सूल, सुख - सिंधु नहाए - ९ - १६८।
सूर प्रभु - चरित अगनित, न गनि जाहिं. कछु जथा मति आपनी कहि सुनाए - ४ - ११।
यत्न या उपाय में लगा रहनेवाला।
जती, सती, तापस आराधैं, चारौं बेद रटै - १ - २६६३।
छंद के चरणों का वह स्थान जहाँ पढ़ते समय रुका जा सकता है।
राजा यदु की राजधानी मथुरा नगरी।
जदुराइ, जदुराई, जदुराज, जदुराय
मुरली तऊ गुपालहिं भावति। सुन री सखी जदपि नँदलालहिं नाना भाँति नचावति - ६५५।
राजा ययाति का बड़ा पुत्र जो देवयानी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। वृद्ध होने पर ययाति ने इससे कहा-विलास से मेरा मन नहीं भरा है; अतः तुम मेरी वृद्धावस्था से अपनी युवावस्था का विनिमय कर लो जिससे मैं युवक हो जाऊँ। यदु ने यह प्रस्ताव स्वीकार न किया। इस पर पिता ने राज्य नष्ट हो जाने का इसे शाप दिया। इसका राज्य नष्ट तो हुआ; पर बाद में इंद्र की कृपा से इसे पुनः राज्य प्राप्त हुआ। इसके वंशज यादव कहलाते हैं। श्रीकृष्ण इसी के वंश में हुए थे।
बड़े पुत्र जदु स कह्यौ आइ। उन' कह्यौ, बृद्ध भयौ नहिं जाइ - ९ - १७४।
आजु हो बधायौ बाजै नंद गोपराइ कै। जदुकुल जादौराइ जनमें हैं आइ कै - १० - ३१।
सात दिन आइ जदुपति कियौ आप उधार - सा. ११८।
(क) खंभ तैं प्रगट ह्वै जन छुड़ायौ - १ - ५।
(ख) हरि अर्जन निज जन जान। लै गए तहाँ न जहँ ससि भान -
दुर्वासा कौ साप निवारयौ, अंबरीघ - पति राखी। १ - १० ब्रह्मलोकपरजंत फिरयौ तहँ देवमुनीजन साखी - १ - १०।
मिथिला के एक राजवंश की उपाधि। इस वंश के लोग अपने पूर्वज निमि विदेह के नाम पर वैदेह भी कहलाते थे। इसी कुल में उत्पन्न राजा सीरध्वज की पुत्री का नाम सीता था।
उत्पन्न करने का भाव या काम।
मिथिला की प्राचीन राजधानी जो हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है।
जनता के प्रतिनिधियों का शासन।
(क) कपट हेत परसैं बकी जननी गति पावै - १ - ४।
(ख) सूरदास भगवंत भजन बिनु धरनी जननि बोझ कत मारी - १ - ३४।
(ग) हौं यहाँ तेरे ही कारन आयो। तेरी सौं सुन जननि जसोदा हठि गोपाल पठायो।
इंद्रिय जिससे प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
जो सबका प्रिय हो, सर्वप्रिय।
अधिक सुरूप कौन सीता तैं जनम बियोग भरै - १ - ३५।
जन्म गँवाना (बिगोना) :- जीवन व्यर्थ नष्ट करना।
जनम बिगड़ना :- धर्म नष्ट होना।
जीवन के आदि या आरंभ से, जीवन भर का, सारे जन्म का।
(क) प्रभु हौं सब पतितनि कौ टीकौ। और पतित सब दिवस चारि के, हौं तौ जनमत ही कौ - १ - १३८।
(ख) सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई जनमत ही कौ धूत - १० - २१५।
जनता का मत, सर्वसाधारण की सम्मति
[सं. जन = लोक + मत= सम्मति]
वह स्थान जहाँ जन्म हुआ हो।
खेल में हारी या ‘मरी हुई गोटी या गुइयाँ का फिर से खेलने योग्य होना।
जन्म में, शरीर धारण करने पर।
सुजन - बेष - रचना प्रति जनमनि, आयौ पर - धन हरतौ। धर्म - धुजा अंतर कछु नाहीं, लोक दिखावत फिरतौ - १ - २०३।
[सं. जन्म + नि (प्रत्य.)]
वह पत्र जिसमें जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति आदि लिखी जाय।
[हिं. गोता + अ. खोद, हिं. मारना]
अपने गोत्र वाला (व्यक्ति)।
[सं. गोत्र+ इया (प्रत्य.)]
अपने गोत्र का, गोत्रीय, भाई-बंधु।
बिधु आनन पर दीरघ लोचन, नासा लटकत मोती री। मानौ सोम संग करि लीने, जानि आपने गोती री - १० - १३९।
जो ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जाना न जा सके, अगोचर।
बहुत समय तक साथ रहनेवाला मित्र।
जन्म लेकर, शरीर धारण करके।
जग मैं जनमि पाप बहु कीन्हें, आदि - अंत लौं सब बिगरी - १ - ११६।
पैदा हुए, अवतरे, उत्पन्न हुए।
रिषभदेव तब जनमे आइ। राजा कै गृह बजी बधाइ - ५ - २।
[सं. जन्म+ना (प्रत्य) = हिं. जन्मना]
अज, अबिनासी अमर प्रभु जन्मै - मरै न सोइ - २ - ३६।
जन्म लिया, पैदा किया, उत्पन्न किया।
(क) पुनि - पुनि कहत धन्य नँद जसुमति, जिनि इनकौं जनम्यौ सो धनि धनि - ४२९।
(ख) यह कोई नहीं भलो ब्रज जन्मयो। याते बहुत डरात - २३७७।
बरातियों के ठहरने का स्थान।
को न कियौ जन - हित जदुराई - १ - ६।
जो भक्तों की भलाई में लगे रहते हैं।
सात लोकों में से पाँचवाँ लोक।
सत्यलोक, जनलोक, तपलोक और महर निज लोक। जहँ राजत ध्रुवराज महा निधि निसि दिन रहत असोक - सारा, २२।
मनुष्यों का नाश करनेवाला।
उत्पन्न किया हुआ, जन्माया हुआ।
बाबा नंद बुरौ मानेंगे, और जसोदा मैया। सूरजदास जनाइ दियौ है, यह कहिकै बल भैया - ४४५।
विदित हो गया, प्रकट हो गया।
महर-महरि मन गई जनाइ। खन भीतर, खन आँगन ठाढ़े, खन बाहिर देखते हैं जाइ-।
(क) ग्वाल रूप हूँ मिल्यौ निसाचर, हलधर सैन बताई। मनमोहन मन में मुसुक्यानैं, खेलत भलैं जनाई - ६ - ४।
(ख) सूरदास प्रीति हदय की सब मन गए जनाई -
(ग) द्वारावति पैठत हरि सौं सब लोगन खबरि जनाई - १० उ. २७।
बच्चा पैदा कराने वाली दाई।
दाई की क्रिया या मजदूरी।
(क) बालक बछरनि राखिहीं, एक बार लै जाउँ। कछुक जनाऊँ अपुनपौ, अब लौं रहयौ सुभाउँ - ४३१
(ख) अहि कौं लै अब ब्रजहिं दिखाऊँ। कमल - भार याही पर लादौं, याकौं आपन रूप जनाऊँ - ५५३।
अमूल अकास कास कुसुमित छिति लच्छन स्वाति जनाए - २८५४।
घर का वह भाग जहाँ स्त्रियाँ रहती हों, अंतःपुर।
जनता को कष्ट पहुँचानेवाला, दुखदायी।
मालूम कराता है, जताता है, बताता है।
(क) को जानै प्रभु कहाँ चले हैं, काहूँ कछु न जनावत - ८.४।
(ख) अब वहि देस नंदनंदन कहँ कोउ न समो जनावत - २८३५।
इतनी बात जनावति तुमसौं, सकुचति हौं हनुमंत। नाहीं सूर सुन्यौ दुख कबहूँ प्रभु केरुनांमय कंत - १ - ९२।
[हिं. जनावना, जनाना=बताना]
जताती है, बतलाती है, सूचित करती है।
जमुना तोहिं बेहथौ क्यौं भावै।…..। भरि भादौं जो राति अष्टमी, सो दिन क्यों न जनावै - ५६१।
जहँ जहँ गाढ़ि परी भक्तनि कौं, तहँ तहँ आपु जनायौ - १.२०।
तबहीं तैं बाँधे हरि बैठे सो हम तुमकौं अनि जनायौ - ३६९।
उदित बदन, मन मुदित सदन तैं, आरति साजि सुमित्रा ल्याई। जनु सुरभी बन बसति बच्छ बिनु परबस पसुपति की बहराई - ९ - १६९।
तीनि जने सोभा त्रिलोक की, छाँड़ि सकल पुरधाम - ९ - ४४।
हरि हलधर को दियो जनेऊ करि षटरस जेवनार - २६२९।
बाँझ सुत जनै उकठै काठ पल्लवै बिफल तरु फलै बिन मेघ - पानी - २२७३।
झुनक स्याम की पैजनियाँ। जसुमति - सुत कौंचलन सिखावति, अँगुरी गहि - गहि दोउ जनियाँ - १० - १३२।
समूह, समुदाय, (बहुवचन वाचक प्रत्य.)
जाकौ ध्यान धरै सबै, सुर - नर - मुनि जनियाँ - १०. १४५।
मत, नहीं, न (निषेधार्थक)।
गुप्त मते की बात कहौ जनि काहूँ कैं आगे।
लछिमन जनि हौं भई सधूती राज - काज जो आवै - ९ - १५२।
वंश या कुल की संज्ञा जो उसके प्रवर्तक के अनुसार होती है।
विवाह में वर-वधू के वंश, गोत्र अदि का परिचय।
बदले को बदलो लै जाहु। उनकी एक हमारी दोइ तुम बड़े जनैया आहु - ४६१९।
[हिं. जनना+ऐया (प्रत्य.)]
आगै आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहिं न जनैहौं। हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं - १० - १९३।
अस्तित्व प्राप्त करने का भाव, आविर्भाव।
जन्म बिगड़ना :- धर्म नष्ट होना।
जन्म जन्म :- सदा, नित्य।
जन्म में थूकना :- धिक्कारना।
जन्म हारना :- (१) व्यर्थ जन्म खोना।
(२) दूसरे का दास होकर रहना।
भादो, की कृष्णाष्टमी जिस दिन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
वह चक्र जिसमें जन्मकाल के ग्रहों की स्थिति का लेखा हो।
[हिं. जन्म + तुझा (प्रत्य.)]
आविर्भूत होना, अस्तित्व में आना।
वह पत्र जिसमें जन्म-काल के ग्रहों की स्थिति आदि दी गयी हो।
स्थान या देश जहाँ किसी का जन्म हुआ हो।
भादों की कृष्णाष्टमी जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
चौरासी लख जोनि जन्मि जग, जल - थल भ्रमत् फिरैगौ - १ - ७५।
जो पैदा या उत्पन्न हुआ हो।
कुरुवंशी राजा परीक्षित का पुत्र जिसने तक्षक नाग से अपने पिता का बदला लिया था।
कौन ऐसौ बली सुभट जननी जन्यौ, एकहीं बान तकि बालि मारै - ९ - १२९।
मंत्र आदि का बार-बार या निश्चित संख्या में पाठ करना।
दुर्बल दोन - छीन चिंतित अति, जपंत नाइ रघुराइ - ९ - ७५।
बारबार (नाम, मंत्र आदि) जपती या रटती है।
ऐसी कै ब्यापी हौ मनमथ मेरो जी जानै माई स्याम कहि रैनि जपति। - १६५९।
किसी नाम या बात को बार-बार कहना, दोहराना या रटना।
कहत हे, प्रागै जंपिहैं राम - १ - ५७।
जब लौं हौं जीव जीवन भर, सदा नाम तब जपिहौं ९ - १६४।
बिचानारद मुनि तत्व बतायौ जपै मंत्रं चित लाय - सीरा ७४।
मंत्र आदि को निश्चित संख्या में कहना या उच्चारण करना।
जल्दी-जल्दी खा जाना, हड़प लेना।
माला रखने की थैली, गोमुखी।
(क) जबै अवौं साधु - संगति, कछुक मन ठहराइ - १ - ४५।
(ख) सूरस्याम तेबहीं मन माने संगहि रैहौं जाइ जबै - १३००।
भारतीय आर्यों के एक प्रसिद्ध देवता। इन्हें दक्षिण दिशा का दिक्पाल माना जाता है। सूर्य इनके पिता और माता संज्ञा थी। प्राणियों के मरने पर उसके, शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार स्वर्ग-नरक भेजने वाले ये ही हैं। इन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। भैसा इनका बाहन है।
भारतीय आर्यों के एक प्रसिद्ध देवता। इन्हें दक्षिण दिशा का दिक्पाल माना जाता है। सूर्य इनके पिता और माता संज्ञा थी। प्राणियों के मरने पर उसके, शुभ - अशुभ कर्मों के अनुसार स्वर्ग - नरक भेजने वाले ये ही हैं। इन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। भैसा इनका वाहन है।
जमघंट, जमघट, जमघटा, जमघट्ट
धन्य नंद धनि धन्य जसोदा। धनि धनि तुमै खिलावति गोदा - १०७२।
विवाह के पूर्व का एक संस्कार।
दक्षिण भारत की प्रसिद्ध नदी जो नासिक के पास से निकलती और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
[सं. यावत्, प्रा. याव, जाव]
जब जब :- जब कभी।
जब तब :- कभी कभी।
जब होता है तब :- प्रायः।
जब देखो तब :- सदा।
मुँह में ऊपर-नीचे की हड्डियाँ जिनमें डाढ़ें रहती हैं, कल्ला।
इच्छा के विरुद्ध, दबाव से।
जबान खींचना :- कठोर दंड देना।
जबान खुलना :- मुँह से बात निकलना।
जबान चलना :- अनुचित शब्द या कड़ी बात निकलना।
जबान चलाना :- कड़ी या अनुचित बात कहना।
जबान डालना :- (१) माँगना।
(२) प्रश्न करना।
जबान थामना (पकड़ना) :- बोलने न देना।
जबान पर आना :- कहने को होना।
जबान पर रखना :- (१) चखना।
(२) याद रखना।
जबान पर लाना :- मुँह से कहना।
जबान पर होना :- हरदम याद रखना।
जबान बंद करना :- (१) चुप होना।
(२) बोलने न देना।
(३) वाद-विवाद में हराना।
जबान बंद होना :- (१) चुप होना।
(२) विवाद में हारना।
जबान बिगड़ना :- (१) मुँह से अनुचित बात या गाली निकलने की आदत पड़ना।
(२) स्वाद खराब लगना।
(३) जबान चटोरी होना।
जबान में लगाम न होना :- अनुचित बात कहने की आदत पड़ना।
जबान रोकना :- (१) जबान पकड़ना।
(२) चुप करना।
जबान सभाँलना :- सोच-समझ कर बोलना।
जबान से निकलना :- बोला जाना।
जबान हिलाना :- मुँह से शब्द निकालना।
दबी ज़बान से कहना (बोलना) :- बात पर जोर न देना।
मुँह से निकला हुआ शब्द, बात, बोल।
जबान बदलना :- बात से हट जाना।
जबान देना (हारना) :- वादा करना।
किसी काम या बात का खूब प्रभाव पड़ना।
काल - जमनि सौं अनि बनी है, देखि देखि मुख रोइसि - १ - ३३३।
[सं. यम + हिं. नि (प्रत्य.)]
यम के रहने का स्थान, यमलोक। हिंदुओं का विश्वास है कि मरने पर प्रेतात्मा को यम के दूत पहले यहीं लाते हैं और यहाँ यम उसके भले-बुरे कर्मो का विचार करते हैं।
धर्मराज, जो हिंदुओं के विश्वास के अनुसार, प्राणी के कर्मो का दंड या फल देते हैं।
जमलअर्जुन, जमलतरु, जमलद्रुम
गोकुल में दो अर्जुनवृक्ष। पुराणों के अनुसार ये कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे। एक बार मतवाले होकर ये स्त्रियों के साथ नदी में नंगे क्रीड़ा कर रहे थे। इसी पर नारद ने इन्हें जड़ हो जाने का शाप दिया। पेड़ होकर ये दोनों नंद जी के आँगन में जमे। यशोदा ने जब कृष्ण को दंड देने के लिए मूसल से बाँधा तब इन्होंने उनका उद्धार किया।
[सं.यमल + अर्जुन, तरु, द्रुम]
यमल वृक्ष को तोड़नेवाले, यमलार्जुन नामक वृक्षों के द्वारा कुबेर के दोनों पुत्रों का उद्धार करनेवाले, श्रीकृष्ण
गोकुल में दो। अर्जुन वृक्ष। कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव नारद के शाप से वृक्ष बन गये थे। इनका उद्धार श्रीकृष्ण ने किया था जब वे यशोदा-द्वारा बाँधे गये थे।
नारद - साप भए जमलार्जुन, तिनकौं अवजु उधारौं - १० - ३४३।
वह लोक जहाँ मरने के बाद, हिंदुओं के विश्वास के अनुसार, लोग जाते हैं, यमपुरी।
कुल जमा :- सब मिलाकर, कुल।
उगता है, उपजता है। (अंकुर) फूटता है।
जज्ञ मैं करते तब मेघ बरसत मही, बीज अंकुर तबै जमते सारौ - ४ - ११।
भृगुवंशी एक ऋषि जो परशुराम के पिता थे।
जा परसें जीते जम सैनी, जमन, कपालिक जैनी - ९:११ !
किसी तरल पदार्थ का ठोस हो जाना।
एक पदार्थ का दूसरे पर मजबूती से स्थित हो जाना।
दृष्टि जमना :- किसी चीज पर नजर का देर तक ठहरना।
मन में बात जमना :- बात का मन पर पूरा-पूरा प्रभाव पड़ना।
रंग जमना :- (१) अच्छा प्रभाव पड़ना।
(२) खूब आनंद आना।
अच्छा हाथ या प्रहार पड़ना।
द्रव पदार्थ को ठोस बनाया, (दही आदि) जमाया।
दूध भात भोजन घृत अमृत अरु आछो करि दयौ जमाए - १० - ३०९।
वह जिम्मेदारी जो किसी अपराधी या ऋणी के लिए ली जाय, जामिनी।
धर्म जमानत मिल्यौ न चाहै, तातैं ठाकुर लूट्यौ - १ - १८५।
थाती प्रान तुम्हारी मोपै, जनमत हीं जौ दीन्ही। सौ मैं बाँटि दई पाँचनि कौं, देह जमानति लीन्ही - १ - १९६।
वह जो जमानत करे, जामिन, जिम्मेदार।
[हिं. जमानत + ई (प्रत्य.)]
किसी द्रव पदार्थ को ठोस बनाना।
किसी पदार्थ को दूसरे पर मजबूती और स्थायी रूप से स्थित करना।
जो अमानत के तौर पर रखा गया हो।
हरि, हौं ऐसौ अमल कमायौ। साबिक जमा हुती जो जोरी मिनजालिक तल ल्यायौ - १ - १४३।
जमा मारना :- बेइमानी या अनुचित रीति से किसी का धन या माल ले लेना।
द्रव पदार्थ को ठोस बनाकर, (दही आदि) जमाकर।
रैनि जमाइ धरथौ हौ गोरस परयौ स्याम कैं हाथ - १० - २७७।
स्थित की, (किसी पदार्थ पर दृढ़तापूर्वक) स्थित की।
सूर - स्याम किलकत् द्विज देख्यौ, मनौ कमल पर बिजु जमाई - १० - ८२।
जमने या जमाने की क्रिया, रीति या मजदूरी।
दृष्टि जमाना :- एक टक देर तक किसी ओर देखना।
मन में बात जमाना :- किसी बात का मन पर पूरा-पूरा प्रभाव डालना।
रंग जमाना :- (१) बहुत अधिक प्रभावित करना।
(२) बहुत आनंदित करना।
हाथ के काम का अच्छा अभ्यास करना।
किसी काम की अच्छी तरह करना।
किसी कार-बार को अच्छी तरह चलने योग्य बताना।
प्रताप, सौभाग्य या सुखसमृद्धि के दिन।
जमाना देखना :- बहुत अनुभव प्राप्त करना।
अनुचित रीति या बेइमानी से दूसरों को धन मार लेने या हड़प जानेवाला।
किसी द्रव पदार्थ को ठंडा करके गाढ़ा किया, जमाया।
(क) माखनरोटी लेहु सद्य दधि रैन जमायौ - ४३१।
(ख) अति मीठौ दधि आज जमायौ, बलदाऊ तुम लेहु - ४४२।
जमींदार का स्वत्व या अधिकार।
ज़मीन-आसमान एक करना :- बहुत परिश्रम या उद्योग करना।
जमीन आसमान का फरक :- बहुत अधिक अंतर या भिन्नता।
जमीन-आसमान के कुलाबे मिलाना :- बहुत डींग या शेखी हाँकना।
जमीन का पैर तले से निकलना :- सन्नाटे में आ जाना, बहुत चकित होना।
जमीन चूमने लगना :- मुँह के बल जमीन पर गिरना।
जमीन देखना :- (१) मुँह के बल गिरना। (२) नीचा देखना।
जमीन दिखाना :- (१) मुँह के बल गिराना। (२) नीचा दिखाना।
जमीन पकड़ना :- जमकर बैठना।
जमीन पर पैर न रखना (पड़ना) :- बहुत घमंड या अभिमान करना (होना)।
किसी कार्य की निश्चित प्रणाली या योजना।
(क) माधौ जू, यह मेरी इक गाइ।……..। हित करि मिले लेहु गोकुलपति, अपने गोधन माहँ - १.५१।
(ख) कमलनयन घनस्याम मनोहर सब गोधन को भूप।
भक्त जमुने सुगम, अगम औरै - १ - १२२।
दोउ माता निरखत आलस मुख, छबि पर तन - मन वारतिं। बार - बार जमुहात सूर प्रभु, इहिं उपमा कवि कहै कहा री - १० - २२८।
कमल - नैन हरि करौ कलेवा। माखन - रोटी, सद्य जम्यौ दधि, भाँति - भाँति के मेवा - १० - २१२।
बहुतों के सामने कोई काम उत्तमता पूर्वक हुआ, बहुतों को रुची या प्रभावित किया।
बटा धरनी डारि दीनौ, लै चले ढरकाइ। आपु अपनी घात निरखत, खेल जम्यौ बनाइ - १० - २४४।
मानौ अनि सृष्टि रचिबे कौं अंबुज नाभि जम्यौ - १ - २७३।
जँभाकर, जमुहाई लेकर, (मुख) खोलकर।
मुख जम्हाई त्रिभुवन दिखरायौ - १० - ३९१।
(क) छनकहिं मैं जरि भस्म होइगौ, जब देखै उठि जागि जम्हाई - १० - ५५०।
(ख) सकसकात तन भीजि पसीना, उलटि पलटि तन तोरि जम्हाई - ७४८।
(क) बल - मोहन दोऊ अलसाने। कछुकछु खाइ दूध - अँचयौ, तव जम्हात जननी जाने - १० - २३०।
(ख) ऐड़त अंग जम्हात बदन भरि कहत सबै यह बानी - ३४५४।
ऋषभ देव की स्त्री का नाम।
रिषभ राज सब मन उत्साह। कियौ जयंती सौं पुनि ब्याह - ५ - २।
विपक्षियों का पराभव, जीत।
देवताओं या महात्माओं की अभिवंदना करने के लिए हृदयोल्लास-व्यंजक शब्द।
(क) सूरदास सर लग्यौ सचानहिं. जय - जय कृपानिधान - १ - ९७।
(ख) जय जय करत सकल सुर - नर - मुनि जल मैं कियौ प्रवेश - सारा, ४१।
विष्णु के एक पार्षद का नाम जो विजय का भाई था। सनकादिक के शाप से इसको हिरण्याक्ष, रावण और शिशुपाल तथा विजय को हिरण्यकशिपु, कुंभकर्ण और कंस के रूप में जन्मना पड़ा।
(क) जय अरु बिजय कथा नहिं कछुवै दसमुख - बध बिस्तार - १ - २१५।
(ख) जय अरु बिजय असुर योनिन कौ भये तीन अवतार - सारा. ४४।
एक अभिवादनजिसका तात्पर्य है-जय हो और जियौ।
गीतगोविंद नामक संस्कृत काव्य के रचयिता।
सौराष्ट्र का एक राजा जो दुर्योधन का बहनोई था।
पराजित द्वारा विजयी को लिखकर दिया हुआ विजय-पत्र।
हाथी जिस पर राजा विजय के बाद सवार हो।
विजय मिलने पर विजयी को पहनायी जानेवाली माला।
विवाह के पूर्व वरे हुए पुरुष के गले में कन्या द्वारा डाली जानेवाली माला।
स्तंभ जो विजय के स्मारकरूप में बनवाया जाय।
जय दिलानेवाली, विजय करानेवाली।
तोरयौ। धनुष स्वयंवर कीनो रावन अजित जयो - २२६४।
बाल, किसोर, तरुन, जर, जुग सो सुपक सारि ढिग ढारी - १ - ६०।
जमलार्जुन दोउ सुत कुबेर के तेउ उखारे जर तै - ९६३।
जलती है, भस्म होती है, जले।
जाकै हिय - अंतर रघुनंदन, सो क्यौं पावक जरई - ९ - ९९।
जिस पर सोने के तार आदि का काम बना हो।
लाखागृह तैं जरत पांडुसुत बुधि - बल नाथ उबारे - १ - १०
सोने-चाँदी का तार जिससे जरी का काम होता है।
जरी के काम का, जिसमें सुनहरे-रुपहले तार लगे हों।
देखि जरनि जड़, नारि की, (रे) जरति प्रेत के संग - १ - ३२५।
अब मोहिं राखि लेहु मनमोहन, अधम अंग पद परतौ। खरकूकर की नाइँ मानि सुख, बिषय - अगिनि मैं जरतौ - १ - २०३।
एक ऋषि जिन्होने बासुकि नाग की मनसा नामक कन्या से विवाह किया था।
जलना, जल सकना, जलने देना।
(क) पावक - जठर जरन नहिं दीन्हौं, कंचन सी मम देह करी - १ - ११६।
(ख) छल कियौ पांडवनि कौरव, कपट - पासा ढरन। ख्वाय विष, गृह लाय दीन्हौ, तउ न पाए जरन - १ - २०२।
गुदा हुआ काला-नीला चिन्ह।
चुभाने-गड़ाने की नुकीली चीज।
(क) सुत - तनया - बनिताविनोद - रस, इहिं जुर - जरनि जरायौ - १ - १५४।
(ख) तब फिरि जरनि भई नख सिख तैं दिशा बात जनु मिलकी - २७८६।
(क) देखि जरनि, जड़, नारि की, (रे) जरति त के संग। चिता न चित फीकौ भयौ, (रे) रची जु पिय के रंग - १ - ३२५।
(ख) हदय की कबहुँ न जरनि घटी। बिनु गोपाल बिथा या तन की कैसे जाति कटी - १ - ९८।
(ग) अति तप देखि कृपा हरि कीन्हो। तन की जरनि दूर भयी सबकी मिलि तरुनिनि सुख दीन्हौ - ७६९।
बिछुरी मनौ संग तैं हिरनी। चितवत रहत चकित चारों दिसि, उपजी बिरह तन जरनी - ९ - ७३।
(क) बड़ी करवर टरी साँप सौं ऊबरी, बाते कैं कहत तोहिं लगति जरनी - ६९८।
(ख) देखौ चारौ चंद्रसुख सीतल बिन दरसन क्यौं मिटती जरनी - ३३३०।
जो देखने में बहुत चटक, भड़कीला और सुंदर हो।
[फ़ा. ज़रब + ईला (प्रत्य.)]
जल जाय, भस्म हो जाय, नष्ट हो जाय।
वारौं कर जु कठिन अति, कोमल नयन जरहु जिनि डाँटी - १० - २५९।
(क) हा जदुनाथ जरा तन ग्रास्यौ, प्रतिभौ उतरि गयौ - १ - २९८।
(ख) सुरति के दस द्वार रूँधे जरा घेरथौ आइ - १ - ३१६।
एक राक्षसी जिसने जरासंध के शरीर के दो खंडों को मिलाकर जीवित कर दिया था।
(क) जरा जरासंध की संधि जोरयौ हुतौ। भीम ता संध को चीर डारथौ - २७५१।
(ख) जुगजुग जीवै जरा बापुरी मिलै राहु अरु केतु - ३८५९।
एक व्याध जिसके वाण से श्रीकृष्ण देवलोक सिधारें थे।
राजत जंत्रहार, केहरिनख, पहुँची रतन - जराइ - १० - १३३।
पवन कौ पूत महाबल जोधा, पल मैं लंक जराई - ९ - १४०।
जिस पर नग इत्यादि जड़े हों, जड़ाऊ।
(क) पालनौ अति सुंदर गढ़ि ल्याउ रे बढ़ेया।….। पँच रँग रेसम लगाउ, हीरा मोतिनि मढ़ाउ, बहुबिधि रुचि करि जराउ, ल्याउ रे जरैया - १० - ४१।
(ख) गोरे भाल बिंदु सेंदुर पर टीका धरौ जराउ।
पीड़ित करती है, जलाती है।
मनसिज व्यथा जराति अरनि लौ उर अंतर दहिए—२८९२।
कृत्या चली जहाँ द्वारावति हरि जानी यह बात। आज्ञा करी चक्र को माधव छिन कृत्या कर घात। कासी जाय जय छिनक में गये द्वारका फेर - सारा. ७०८, ७०९।
वह झिल्ली जिसमें लिपटा हुआ बच्चा पैदा होता है।
गर्भ से झिल्ली में लिपटा हुआ पैदा होनेवाला जीव, पिंडज।
(क) सुत - तनया - बनिता - बिनोद रस, इहिं जुर - जरनि जरायौ - १ - १५४।
कपिल कुलाहल सुनि अकुलायौ। कोप - दृष्टि करि तिन्हैं जरायौ - ९ - ९।
वह जो जड़ाऊ हो, जड़ाऊ कामवाली।
बहु नग लगे जराव की अँगिया भजा बहूटनि बलय संग को - १०४२।
विरह ताप तन अधिक जरावत, जैसैं दव - द्रुम बेली - ९:९४।
पीड़ित करता है, कष्ट पहुँचाता है।
जब नहिं देख्यौ गुपाल लाल को बिरह जरावत छाती - २९८१।
पठवौ कुटुँब - सहित जम आलय, नैंकु देहि धौं मोकौ आवन। अगिनि - पुंज सित धनुष - बान धरि, तोहिं असुर - कुल - सहित जरावन - ९ - १३१।
जलाता है, पीड़ित करता है।
सूरदास प्रभु मोकों करहिं कृपा अब नित प्रति बिरह जरावै - १६७७।
मगध देश का एक राजा जो बृहद्रथ का पुत्र और कंस का ससुर था। श्रीकृष्ण ने जब कंस को मार डाला तब दामाद की मृत्यु का बदला करने के लिए इसने मथुरा पर अठारह बार आक्रमण किया। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर भीम और अर्जुन को लेकर श्रीकृष्ण इसकी राजधानी गिरिब्रज पहुँचे। वहाँ भीम ने इसे मार डाला।
धिक धिक जीवन है अब यह तन, क्यौं न होई जरि छार - ९ - ८३।
बहु बिधि जरि करि जराउ ल्याउ रे जरैया - १० - ४१।
चंदन चरचि तनु दहत मलयनिल स्रवन बिरहानल जरिबो - २८६०।
क्रीड़ा करत तमाल - तरुन - तर स्यामा स्याम उमँगि रस भरिया। यौं लपटाइ रहे उर उर ज्यौं, मरकत मनि कंचन मैं जरिया - ६८८।
उलटि पवन जब बावर जरियौ, स्वान चल्यौ सिर झारी - १ - २२१।
जरिहै लंक कनकपुर तेरौ, उदवत रघुकुल भानु - ९ - ७९।
(हाय) जली, (अरे) जल गयी, जली हुई।
ब्रह्म - बाण तैं गर्भ उबारयौ, टेरत जरी जरी - १ - १६।
जरे पर चूना :- दुखी को और दुख पहुँचाना।
उ. - वैसहिं जाइ जरे पर चूनो दूनो दुख तिहिं काले - ३१५६।
ऊधौ तुम यह मत लै आए। इक हम जरें खिझावन आए मानौ सिखै पठाए - ३११०।
जरैं बरैं :- नष्ट-भ्रष्ट हो जायें।
उ. - (क) डीठि लगावति कान्ह को जरैं बरैं वै आँखि - १०६९।
(ख) जरै रिसि जिहिं तुम्हहिं बाध्यौ लगै मोहिं बलाइ - ३८७।
डाह करता है, ईर्ष्या या द्वेष के कारण कुढ़ता है।
कोपै तात प्रहलाद भगत कौ, नामहिं लेते जरै - १ - ८२।
काहे को साँस उसाँस लेति है बैरी बिरह को दवा जरैगो - २८७०।
नग जड़ने का काम करनेवाला पुरुष, कुंदनसाज।
पालनौ अति सुंदर गढ़ि ल्याउरे बढ़ेया।….। पँच रँग रेसम लगाउ, हीरा मोतिनि मढ़ाउ, बहु बिधि जरि करि जराउ, ल्याउ रे जरैया - १० - ४१।
हौं तव संग जरौगी, यौं कहि तिया धूति धन खायौ - २ - ३०।
तेल, तूल, पावक पुट धरिकै, देखन चहैं जरौ - ९ - ९८।
दच्छ - सीस जो कुंड मैं जरयौ। ताके बदलैं अजसिर घरथो - ४ - ५।
पानी का एक काला कीड़ा, पैरौवा, भौंतुआ।
हमते भली जलचरी बापुरी अपनो नेम निबाहयौ - ३१४९।
संध्या का समय जब चरकर लौटती हुई गैयों के खुरों से उड़ी धूल सब तरफ छा जाती है।
बैलों आदि पर लादने को खुरजी जिसका एक-एक भाग दोनों तरफ रहता है।
ऊँचे स्थान से होनेवाला पानी का विस्तृत झीना प्रवाह।
दुर दमंकत सुभग सवननि जलज जुग डहडहत - १० - १८४।
[सं. जल+जात, जातक= उत्पन्न]
बिराजत अंग अंग रति बात। अपने कर करि धरे बिधाता षग षग नव जलजात - सा. उ. ३।
अवर जु सुभग बेद जलजातक कनक नीलमनि गात। उदित जराउ पंच तिय रवि ससि किरनि तहाँ सुदुरात - सा. उ. ९।
धातु की कटोरियों में पानी भर कर बजाया जानेवाला बाजा।
(क) उमँगे जमुन - जल प्रफुलित कुंज - पुंज, गरजत कारे भारे जूथ जलधर के - १० - ३४।
(ख) पूजत नाहिं सुभग स्यामल तन, जद्यपि जलधर धावत - ६६५।
(ग) मोहन कर तैं धार चलति, परि मोहिनि - मुख अतिहीं छबि गाढ़ी। मनु जलधर जलधार बृष्टि लघु, पुनि - पुनि प्रेम - चंद पर बाढ़ी - ७३६।
पत्थर या धातु क, प्रर्धा जिसमें शिवलिंग स्थापित किया जाता है।
पत्थर या धातु का अर्धा जिसमें शिवलिंग स्थापित किया जाता है।
जल-प्रवाह, पानी की धारा, पानी की झड़ी।
मोहन - कर तैं धार चलति, परि मोहनि - मुख अति हीं छबि गाढ़ी। मनु जलधर जलधार बृष्टिलघु, पुनि - पुनि प्रेम - चंद पर बाढ़ी - ७३६।
तपस्या की एक रीति जिसमें धार बाँध कर पानी डाला जाता है।
सुतनि तज्यौ, तिय तज्यौ, भ्रात तज्यौ, तन तैं त्वच भई न्यारी। स्रवन न सुनत, चरन - गति थाकी, नैन भए जलधारी १.११८।
बहुत अधिक ईर्ष्या या दाह।
जलती आग :- भयानक विपत्ति।
जलती आग में कूदना :- जान-बूझकर भारी विपत्ति में फँसना।
आँच को तेजी से फुँक जाना।
जले पर नमक (चूना) छिड़कना (लगाना) :- दुखी को और दुख देना।
जले फफोले फोड़ना :- दुखी को बदला चुकाने के लिए और दुख देना।
बहुत अधिक ईर्ष्या, डाह या द्वेष करना।
(४) बहुत अधिक ईर्ष्या, डाह या द्वेष करना।
जली कटी (भुनी) बात कहना (सुनाना) :- लगती या चुभती हुई बातें कहना।
जल मरना :- कुढ़ जाना, ईर्ष्या के कारण दुखी होना।
लंबी-चौड़ी या बढ़ी-चढ़ी बातें करना।
शव को नदी में बहाने की क्रिया।
एक प्रलय, जिसमें सारी सृष्टि जलमग्न हो जाती है।
एक कल्पित जलजंतु जिसका ऊपरी शरीर मनुष्य और निचला मछली का होता है।
बरसात। जलरितु नाम जान अब लागे हरि-भख-बचन गयौ री-सा. उ.।
सुंदर कर आनन समीप अति राजत इहिं आकार। जलरुह मनौ बैर बिधु सौं तजि मिलत लए उपहार - २८३।
सुनते मेघवर्तक साजि सैन लै आये। जलवर्त, वारिवर्त, पवनवर्त, बीजुवर्त; आगिवर्तक जलद संग ल्याये - ९४४।
जलाने का काम दूसरे से कराना, सुलगवाना, बलवाना।
किसी उत्सव में बहुत से लोगों का एकत्र होना।
सभा-समाज का बड़ा अधिवेशन।
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सौं संपुटि हाथ गह्यौ - सा. ३ - ३१। (ख) तैं जु नील पट ओट दियो री।….। जल - सुत बिंब मनहुँ जल राजत मनहुँ सरदससि राहु लियौ री - सा, उ, १८।
स्यामहृदय जलसुत की माला अतिहिं अनूपम छाजै री - १३४३।
जोंक की गति, धृष्टता, ढिठाई।
उठि राधे कह रैन, गँवावै। महिसुत गति तजि जल - सुत - तित तजि सिंधु - सुता - पति - भवन न भावै - सा. उ. २२।
[हिं. जल+सुत (जल से उत्पन्न जोंक) + तित (= गति)]
जलसुत - प्रीतम-सुत-रिपु-बांधव-आयुध
जलसुत - प्रीतम - सुतरिपु - बांधव आयुध आपुन बिलख भयौ री - सा.उ. २१।
[सं. जल+सुत (जल से उत्पन्न कमल)+प्रीतम (प्रियतम = कमल का प्रियतम, सूर्य)+सुत (सूर्य का सुत या पुत्र कर्ण)+रिपु (कर्ण का रिपु या शत्रु अर्जन)+बांधव (अर्जुन का भाई भीम) + आयुध (= हथियार, भीम का हथियार गदा ; यहाँ ‘गदा' शब्द से गद' अर्थ लिया)]
समुद्र में बादलों से बननेवाला एक स्तंभ जिसका दर्शन अशुभ होता है।
मंत्र आदि की सहायता से पानी बाँधना या उसकी गति रोकना।
वै जलहरें हम मीनं बापुरी कैसे जिवहिं निनारे - ४८७०।
पत्थर या धातु का अर्धा जिसमें शिवलग स्थापित किया जाता है।
शिवलिंग के ऊपर गर्मी में टाँगा जानेवाला जल भरा घड़ा जिससे पानी बराबर टपकता रहता है।
पितरों को अँजुली भर कर जल देना।
सत्यभामा के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण का एक पुत्र।
पेट की ज्वाला या आग, प्रेम, भूख।
गति गयंद कुच कुंभ किंकिणी मनहुँ घंट झहनावै। मोतिनहार जलाजले मानो खुमीदंते झलकावै।
आँच पर चढ़ाकर भाप या कोयले के रूप में करना।
ईर्ष्या, द्वेष आदि पैदा करना।
जला जला कर मारना :- बहुत तंग करना।
सिंधु ते काढ़ि संभु - कर सौंप्यो गुनहगार की नाई - ३०७७।
को गति गुनही सूर स्याम सँग काम बिमोह्यौ कामिनि - पृ. ३४४ (३४)।
एक प्रत्यय जो संख्या वाची शब्दों के अंत में लगता है।
निगमन नेति कयौ निर्गुन सों कइ गुनाधि बरनि है सूर नर - १९०६।
गोप जाति की स्त्री. गोपी।
इरि कौं बिमल जस गावति गोपँगना - १० - ११२।
ईर्ष्या, डाह आदि के कारण होनेवाली जलन या कुढ़न।
[हिं. जलना+प्रपा (प्रत्य.)]
[हिं. जलना+श्राव (प्रत्य.)]
किसी पदार्थ का तपान-गलाने पर जल जानेवाला अंश।
जलाने, सपाने, झुलसाने का काम या भाव।
तेज भगवान को पाय जलावन लगे असुरदल चल्यौ सबही पराई - १०उ. - ३५।
वह स्थान जहाँ पानी जमा हो।
[सं. जलस्थल या हिं. जलाजल]
जलिका, जलुका, जलूका, जलौका
लोगों का सजधज कर किसी उत्सव में या सवारी के साथ चलना।
डाह, ईर्ष्या आदि से सदा जलनेवाला।
परदा, नाटक का परदा, यवनिका।
बदन उघारि दिखायौ अपनौ नाटक की परिपाटी। बड़ी बार भई, लोचन उघरे, भरम - जवनिका फाटी - १० - २५४।
जवानी उठना (उभड़ना, चढ़ना) :- (१) यौवन का आगमन होना।
(२) मस्त होना।
जवानी ढलना :- बुढ़ापा आना।
उठती (चढ़ती) जवानी :- यौवन का आरंभ।
उतरती जवानी :- यौवन ढलाव।
(क) सूर आप गुजरान मुसाहिब लै जवाब पहुँचावै - १ - १४२।
जवाब तलब करना :- कारण पूछना, कैफियत माँगना।
(कोरा) जवाब मिलना :- बात अस्वीकृत होना।
जबाब का जवाब देना :- प्रतिपक्षी के बदले या कथन का कड़ा जबाब देना।
उ. - सूर स्याम मैं तुम्हें न डरैहौं जवाब को जवाब दैहौं - ८४३।
बदला, बदले में किया हुआ कार्य।
एक कँटीला क्षुप जो वर्षा के बाद फूलता-फलता है।
[हिं. जाना+ऐया (प्रत्य.)]
गयौ गिरि पानि जस जगत छायौ।
(क) जरासंध बंदी कटैं नृप - कुल जस गावै - १ - ४।
(ख) कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं पांडु की बधू जस नैंकु गायौ।
नंदजी की पत्नी जिन्होंने श्रीकृष्ण को पाला था।
दुतिया के ससि लों बाढ़ै सिसु, देखै जननि जसोइ - १० - ५६।
जसोद, जसोमति, जसोवा, जसोवै
दै री मोकौं ल्याइ बेनु, कहि, कर गहि रोवै। ग्वालिनि डराति जियहिं. सुनै जनि जसोवै - १० - २८४।
जहँ जहँ गाढ़ परी भक्तनि कौं, तहँ तहँ आपु जनायौं - १ - २०।
जहँ के तहाँ :- जिस स्थान पर हो, वहीं।
उ. - निरखि सुर नर सकल मोहे रहि गए जहँ के तहाँ - १० उ. २४।
भूमिकर, लगान या जगात उगाहने या वसूलने वाला।
साँचो सो लिखहार कहावै।….। मन्मथ करै कैद अपनी में जान जहतियो लावै - १ - १४२।
[सं. कोण, हिं. कोना+इया (प्रत्य.)]
बोरा ढोनेवाला पशु या मनुष्य।
[किं. गोन=बोरा+इया (प्रत्य.)]
[हिं. गोन = रस्सी+इया (प्रत्य.)]
वह स्थान जहाँ बहुत दुख और कष्ट हो।
अधर सुधा मुरली की पोषे जोग - जहर कत प्यावे रे - ३०७०।
जहर उगलना :- (१) बहुत चुभनेवाली बात कहना।
(२) जली-कटी सुनाना।
जहर करना :- बहुत तेज नमक करना।
कड़ुआ जहर :- (१) बहुत कड़ुआ।
(२) जिसमें बहुत तेज नमक पड़ा हो।
जहर का घूँट :- बहुत बुरे स्वाद का।
जहर का घँट पीना :- क्रोध को मन ही मन दबाना।
जहर का बुझाया हुआ :- बहुत कष्ट देनेवाला, बड़ा दुष्ट।
जहर की गाँठ (पुड़िया) :- बहुत दुखदायी।
जहर लगना :- बहुत बुरा लगना।
[सं. यत्र, पा. यत्थ, प्रा. जह]
जहाँ का तहाँ :- जिस स्थान पर हो, वहीं।
जहाँ का तहाँ रह जाना :- (१) आगे न बढ़ पाना।
(२) कुछ काम या कारवाई न होना।
जहाँ तहाँ :- (१) इधर-उधर, इतस्ततः।
उ - जहाँ तहाँ हैं सब आवैगे, सुनि - सुनि सस्तौ नाम। अब तौ परयौ रहैगौ दिन-दिन तुमकौं ऐसौ काम - १ - १९१।
(२) सब जगह, सब स्थानों पर।
उ. - मंत्र - जंत्र मेरै हरिनाम। घट-घट मैं जाकौ बिस्राम। जहाँ तहाँ सोइ करत सहाई। तासौं तेरौ क्छु न बसाइ - ७ - २।
बिनती करत मरत हों लाज। नख - सिख लौं मेरी यह देही है पाप की जहाज - १ - ९६।
जहाज का कौवा (काग या पंछी) :- (१) कौआ या पक्षी जो जहाज से इधर-उधर उड़कर जाय और आश्रय न मिलने पर फिर लौटकर आ जाय। इसकी तुलना ऐसे व्यक्ति से की जाती है जिसको इधर-उधर भटकने के बाद हारकर या लाचार होकर अंत में केवल एक व्यक्ति का ही आश्रय लेना पड़े।
उ. - मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पै आवै - १ - १६८।
(२) धूर्त, चालाक।
एक ऋषि जिन्होंने सारी गंगा का पान करके उसे कान से निकाल दिया था।
जह्न जा, जह्न तनया, जह्न सुता
[सं. जह्न +जा, तनया, सुता=पुत्री]
वैशाख शुक्ल सप्तमी, जब जह्नु, ने गंगा का पान किया था।
भाट, बंदी आदि जो राजाओं का यश गाते हैं।
वह भू-भाग जहाँ जल कम बरसे।
इस भू-भाग में पाये जानेवाले हिरन आदि पशु।
घुटने और कमर के बीच का भाग, उरु।
कुएँ की गाड़ी का खंभा या धुरा।
हरकारे आदि जिन्हें बहुत दौड़ना पड़ता है।
जाँचने की क्रिया, भाव या परख।
जाँचक मैं जाँचक कह जाँचै १ जौ जाँचै तौ रसना हारी - १ - ३४।
जाँचने या परीक्षा करनेवाला।
माँगने की क्रिया या भाव, भिखमंगी।
[सं. याचकता, हिं. जाचकता]
प्रार्थना या निवेदन करता है, माँगता है।
असरन - सरन सूर जाँचत है, को अब सुरति करावै - १ - १७।
प्रार्थना या निवेदन करती हैं।
प्रिय जनि रोकहि जान दै। हौं हरि - बिरह - जुरी जाँचति हौं, इती बात मोहिं दान दै - ८०५।
याचना करने (के लिए) माँगने (के हेतु)।
नंद - पौरि जे जाँचन आएँ। बहुरौ फिरि जाचक न कहाए - १० - ३२।
माँगा, याचना की, निवेदन किया।
सिव - बिरंचि, सुर - असुर, नाग - मुनि, सु तौ जाँचि जन आयौ। भूल्यौ भ्रम्यौ, तृषातुर मृग लौं, काहूँ स्रम न गँवायौ - १ - २०१।
माँगे, माँगने पर, प्रार्थना करने पर, (आश्रय आदि के लिए) निवेदन किया।
(क) कलानिधान सकल गुन - सागर, गुरु धौं कहा पढ़ाए (हो)। तिहि उपकार मृतक सुत जाँचे, सो जमपुर ते ल्याए (हो) - १ - ७।
(ख) जाँचे सिव बिरंचि - सुरपति सब, नैकुन काहू सरन दयौ - ९:६।
(ग) देत दान राख्यौ न भूप कछु, महा बड़े नग हीर। भए निहाल सूर सब जाचक, जे जाँचे रघुबीर - ९ - १६।
माँगा, (किसी वस्तु के देने की) प्रार्थना की।
(क) जिन जो जाँच्यौ सोइ दीन, अस नँदराय ढरे - १० - २४।
(ख) जिन जाँच्यौ जाइ रस नंदराय ढरे। मानो बरसत मास असाढ़ दादुर मोर ररे।
आटा पीसने की चक्की जो जमीन में गड़ी होती है।
(क) महाधीर गंभीर बचन सुर्नि जाँबवंत समुझाए।
(ख) जांबवंत सुतासुत कहाँ मम सुता बुधिबंत पुरुष यह सब सँभारे।
जामुन का फल।
जामुन की बनी शराब या सिरका।
स्वर्ण।
जामुन की बनी शराब या सिरका।
जांबवान की कन्या जो श्रीकृष्ण को ब्याही थी।
जांबवती अरपी कन्या भरि मनि राखी समुहाय। करि हरि ध्यान गये हरि - पुर को जहाँ जोगेस्वर जाय।
सुग्रीव को रीछ मंत्री जो ब्रह्मा का पुत्र माना गया है। प्रसिद्ध है कि सतयुग में इसने वामन भगवान की परिक्रमा की थी ; द्वापर में इसने स्यमंतक मणि की खोज में गये श्रीकृष्ण से घोर युद्ध किया था और अंत में उन्हें पहचान कर अपनी पुत्री जांबवती उन्हें ब्याह दी थी।
जांबवान की कन्या जांबवती जो श्रीकृष्ण को ब्याही थी।
नीकै गाइ गुपालहिं मन रे। जा गाए निर्भय पद पाए अपराधी अनगन रे - १ - ६६।
छिपाकर, लुकाकर, गुप्त रखकर।
कहौ नहीं साँची सो हमसौं जिसि गोप करो सुनिकै अक्रूर बिमल स्तुति मानै - २५५७।
नाम गोपाल जाति कुल गोपक गोप गोपाल उपासी - ३३१४।
गोप जाति की कन्या या बालिका।
(तुच्छतासूचक, आज्ञार्थक) जाओ, प्रस्थान या गमन करो।
जा पड़ना :- (१) किसी जगह पर अकस्मात पहुँच जाना
(२) हारे-थके या लाचार होकर कहीं पहुँचना।
जा रहना :- (१) किसी स्थान पर थोड़ा समय काटने के लिए ठहरना।
(२) जा बसना।
बरनि न जाइ-वर्णन नहीं की जा सकती।
बरनि न जाइ भगत की महिमा, बारंबार बेखानौं - १ - ११
भरि सोवै सुख - नींद मैं तहाँ सु जाइ जगावै - १ - ४४।
व्यर्थ, वृथा, निष्प्रयोजन।
पकरि कंस लै जाइगौ, कालहिं परै सँभारि - ५८९।
रायबरेली जिले का एक प्राचीन नगर जहाँ सूफी फकीरों की गद्दी है।
बहु दिन भए, हरि सुधि नहिं पाई। आज्ञा होउ तौ देखौं जाई - १ - २८६।
तुम तजि और कौन पै जाउँ - १ - १६४।
व्यर्थ, वृथा, असफल, अपूर्ण।
बरु मेरी परतिज्ञा जाउ। इत पारथ कोप्यौ है। हम पर, उत भीषम भट - राउ - १ - २७४।
चली जाउ-चली जाय, गमन करे।
चली जाउ सैना सब मोपर धरौ चरन रघुबीर। मोहि असीस जगत - जननी की नवत न बज्र - सरीर - ९ - १०७।
(क) कयौ, सरमिष्ठा सुत कहँ पाए ? उनि कहथौ, रिषि - किरपा तें जाए - ९ - १७४।
(ख) ता संगति नव सुत तिनं जाए - ४ - १२।
मथुरा क्यों न रहे जदुनंदन जो पै कान्ह देवकी जाए - ३४३४।
रायबरेली जिले का एक नगर जहाँ सूफी फकीरों की गद्दी है।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै - १ - १।
मानी हार बिमुख दुरजोधन, जाके जोधा हे सौ भाई १ - २४।
[हिं. जा=जो+के (प्रत्य.)]
रघुबीर मोसौं जन जाकें, ताहि कहा सँकराई - ६ - १४८।
जाकौं दीनानाथ निवाजैं। भव - सागर मैं कबहुँ न झुकै, अभय निसाने बाजें - १ - ३६।
स्रवनन सुनते रहते जाको नित सो दरसन भए नैन - २५५८।
कोरी - मटुकी दहयौ जमायौं, जाख न पूजन पायौ - ३४६।
लकड़ी का पहिया जो कुओं की नींव में दिया जाता है, जमवट, नेवार
तप कीन्हैं सो दैहैं आग। तो सेती तुम कीनौ जाग। जज्ञ कियें ग्रंधबपुर जैहौ। तहाँ आइ मोकौं तुम पैहौं - ९ - २।
जागने या सावधान होने की क्रिया या भाव, जागरण, सतर्कता।
घटती होइ जाहि ते अपनी ताकौ कीजै त्याग। धोखे कियो बास मन भीतर अब समुझे भइ जाग - ११९५।
प्रभाव या महिमा प्रकट रूप से और तुरंत दिखानेवाला।
जागता :- प्रत्यक्ष, साक्षात्।
जगत से संबंधित, सांसारिक।
किसी देवी-देवता का प्रत्यक्ष चमत्कार।
बढ़-चढ़कर होना, धनी, ओढ्य या समृद्ध होना।
आंतरिक वृत्तियों को जाग्रत अवस्था।
किसी धार्मिक अनुष्ठान के उपलक्ष में देवी-देवता का भजन-कीर्तन कर हुए सारी रात जागना।
बासर ध्यान करते सब बीत्यौ। निसि जागरन करन मन चीत्यौ।
इंद्रियों द्वारा कार्यों का अनुभव होते रहने की स्थिति या अवस्था।
वह जो जाग्रत या चैतन्य हो।
जागो, नींद त्यागो, सोकर उठो।
बदन उघारि जगावति जननी, जागहु बलि गई आनँद - कंद - १० - २०४।
किसी उत्सव या व्रत में रात भर जागकर भजन-कीर्तन करना।
(क) सोवत मुदित भयौ सपने मैं पाई निधि। जो पराई जागि परें कछु हाथ न आयौ, यौं जग की प्रभुताई - १ - १४७।
(ख) नारायन जल मैं रहे सोइ। जागि कयौ, बहुरो जग होइ - ९ - २ .
होश में आयी, संज्ञा प्राप्त की, सचेत हुई।
(क) स्याम नाम चकृत भई स्रवन सुनते जागी - १६५१।
(ख) किती दई सिख मंत्र साँवरे तउ हठ लहरि न जागी - २२७५
राजा या शासक की ओर से किसी सेवा के पुरस्कार-रूप में मिली हुई भूमि।
वह जिसे किसी राजा या शासक से जागीर मिली हो।
कमलनैन पौढे सुख - सेज्या, बैठे पारथ पाइ तरी। प्रभु जागे, अर्जुन - तन चितयौ, कब आए तुम, कुसल खरी ? - १ - २६८।
सजग हुए, चेते, सावधान हए।
जोग - जुगति बिसरी सबै, काम - क्रोध - मद जागे (हो) - १ - ४४।
जब जागै तब मिथ्या जानै१०उ - ६।
तीनौं पन ऐसे ही खोयौ समय गए पर जाग्यौ - १ - ७३।
नंद - पौरि जे जाँचन आए। बहुरौ फिरि जाचक न कहाए - १० - ३२।
[सं. याचक + ता (प्रत्य.)]
[सं. याचक + ता (प्रत्य.)]
हमरे तो गोपति - सुत अधिपति वनिता और रन ते - सा, उ, ३४।
जमीन पर बना गाय के खुर का चिह्न।
मोहनि कर तें दोहनि लीन्हीं गोपद बछरा जोरे - ७३२।
ऐसे कुमति जाट सूरज कौं प्रभु बिनु कोउ न धात्र - १.२१६।
तालाब आदि में गड़ा हुआ लट्ठा
पेट की अग्नि जो भोजन पचाती है।
संतान आदि के प्रति माता की ममता।
हा हा लागै पाइ | तिहारै। पाप होत है जाड़ नि मारें - ७९९।
[हिं. जाड़ा + नि (प्रत्य)]
वह पुत्र जो माता के गुणों से युक्त हो।
वह पुत्र जो माता के गुणों से युक्त हो।
नष्ट होता है, नाश होता है।
(क) रावन सौ नृप जात न जान्यौ, माया बिषम सीस पर नाची - १ - १८।
(ख) रस लैलै औटाइ करत गुर, डारि देत है खोई। फिरि औटाए स्वाद जात है, गुर हैं खाँड़ न होई - १ - ६३।
अधम कौन है अजामील तैं, जम जहँ जात डरै - १ - ३५।
सदा हित यह रहत नाहीं, सकल मिथ्या जात - १९१७।
जाने कहा बाँझ ब्यावर दुख जातक जनहि न पीर है कैसी - ३३२९।
हिंदू समाज का जन्मानुसार किया गया विभाग।
मानव समाज का निवास स्थान याकुल-परंपरा के अनुसार किया गया विभाग।
गुण, धर्म आदि के अनुसार किया गया विभाग, कोटि, वर्ग।
याकी जाति अबै हम चीन्ही - ३९१।
वे बौद्धकथाएँ जिनमें बुद्धदेव के पूर्व जन्मों की बातें होती हैं।
एक संस्कार जो बालक के जन्म के समय हिंदुओं में होता है।
जातकर्म करि पूजि पितर सुर पूजन बिप्र करायौ - सारा, ३९२।
सूर सुजसं - रागी न डरत सन, सुनि जातना कराल - १ - १८९।
जाती है, प्रस्थान करती है।
यह अति हरिहाई, हटकत हूँ बहुत अमारग जाति - १ - ५१।
[सं. यान=जाना, हिं. जाना]
कीजै कृपा दृष्टि की बरघा जन की जाति लुनाई - १ - १८५।
[सं. यान=जाना, हिं. जाना]
बालक के जन्म के समय होनेवाला एक संस्कार।
जाति, वर्ण, कुल, गोत्र आदि।
जाति - पाँति उन सम हम नाहीं। हम निर्गुन सब गुन उन पाहीं।
[सं. जाति + हिं. पाँति (पंक्ति)]
सेसनाग के ऊपर पौढ़त, तेतिक नाहिं बड़ाई। जातुधानि - कुच - गर मर्षत तब, तहाँ पूर्नता पाई - १ - २१५।
सोइ कछु कीजै दीनदयाल। जातें जन छन चरन न छाँड़ै, करुनासागर, भक्तरसाल - १.१२७।
जम कौ त्रास सबै मिटि जातौ, भक्त नाम तेरौ परतौ - १ - २९७।
सूरदास कछु थिर न रहैगो जो आयौ, सो जातौ - १ - ३०२।
लै जातौ-क्रि. स.= ले जाती, साथ लिबा जाता।
रावन मारि, तुम्हें ले जातौ, रामाज्ञा नहिं पायौ - ९ - ८८।
हुतौ आढ्य तब कियौ असत्यय, करी न ब्रज - बन - जात्र। पोषे नहिं तुव दास प्रेम सौं, पोष्यौ अपनौ गात्र - १ - २१६।
यह कहि पारथ हरि - पुर गए। सुन्यौ, सकल जादव छै भए - १ - २८६।
(क) जन यह कैसे कहै गुसाई। तुम बिनु दीनबंधु जादवपति, सब फीकी ठकुराई - १ - १९५।
(क) भक्तबछल श्री जादवराइ। भीषम की परतिज्ञा राखी, अपनौ बचन फिराई - १ - २६७।
(ख) हरि सौं भीषम विनय सुनाई। कृपा करी तुम जादवराई - १ - २७७।
जल-जीव-जंतु के स्वामी, वरुण।
[सं. गो+पद + ई (प्रत्य.)]
दीनदयाल, गोपाल, गोपपति, गावत गुन आवत ढिग ढरहरि - १ - ३१२।
रोवत सुनि कुंती तहँ आई। कहौ, कुसल जादौ - जदुराई - १ - २८८।
फूले फिरै जादौकुल आनँद समूल मूल, अंकुरित पुन्य फूले पाछिले पहर के - १० - ३४।
अब किहिं सरन जाउँ जादौपति, राखि लेहु, बलि, त्रास निवारी - १ - २६०।
तुम्हरी गति न कछु कहि जाइ। दीनानाथ, कृपाल, परम सुजान जादौराइ - ३ - ३।
समझ, अनुमान, ख्याल, विचार।
जान-पहचान-परिचय, जानकारी।
जान में :- जानकारी में, ध्यान में।
प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ। अतिगंभीर - उदार - उदधि हरि जान - सिरोमनि राइ - १ - ८।
जान आना :- जी ठिकाने होना, चित्त स्थिर होना।
जान का गाहक (लेवा) :- (१) मार डालने की इच्छा रखनेवाला।
(२) परेशान करनेवाला।
जान का रोग :- सदा कष्ट देनेवाला विषय, व्यक्ति या वस्तु।
जान के लाले पड़ना :- जान बचाना कठिन हो जाना।
अपनी जान को जान न समझना :- (१) अपने प्राण की चिंता न करना।
(२) बहुत ज्यादा परिश्रम करना, परिश्रम के आगे अपने सुख-दुख की परवाह न करना।
दूसरे की जान को जान न समझना :- दूसरे से बहुत ज्यादा परिश्रम कराना, अपने काम के आगे दूसरे के सुख-दुख की परवाह न करना।
(दूसरी की, किसी की) जान को रोना :- कष्ट देनेवाले को झुँझलाहट के साथ याद करके उसे बुराभला कहना।
जान खाना :- (१) बार-बार परेशान करना।
(२) किसी बात या काम के लिए बार-बार कहना।
जान खोना :- मरना।
जान चुराना :- किसी काम को न करने की इच्छा से टाल - टूल करना।
जान छुड़ाना :- (१) किसी झंझट से बचने के लिए अपने को अलग रखना, संकट टालना।
(२) प्राण बचाना।
जान छूटना :- (१) किसी झंझट या मुसीबत से छुटकारा मिलना।
(२) प्राण बचना।
जान जाना :- मरना।
(किसी पर) जान जाना :- (किसी से) इतना प्रेम होना कि उसे बिना देखे विकल हो जाना।
जान जोखों :- जीवन का संकट या डर।
जान तोड़कर :- बहुत परिश्रम करके।
जान दूभर होना :- झंझटों, कष्टों या संकटों के मारे जीने की इच्छा न रह जाना।
जान देना :- मरना।
(किसी पर) जान देना :- (१) किसी के अप्रिय कार्य से दुखी होकर, लजाकर या क्रोध से मरना।
(२) किसी को इतना चाहना कि उसके लिए प्राण देने को तैयार रहना।
(किसी के लिए) जान देना :- (किसी से) इतना ज्यादा प्रेम करना कि सब कुछ सहने, यहाँ तक कि प्राण तक देने, को तैयार रहना।
(किसी वस्तु के लिए या पीछे) जान देना :- किसी वस्तु की प्राप्ति या रक्षा के लिए प्राण तक देने को तैयार रहना।
जान निकलना :- (१) मरना।
(२) डर लगना।
(३) बहुत कष्ट होना।
जान पड़ना :- ज्ञात होना, मालूम पड़ना।
जान पर आ बनना (नौबत आना) :- (१) बहुत परेशानी होना।
(२) जान बचना कठिन मालूम होना।
जान पर खेलना :- प्राण की परवाह न करके अपने को किसी संकट या मुसीबत में डालना।
जान बचाना :- (१) प्राण की रक्षा करना।
(२) किसी झंझट या मुसीबत से बचने के लिए अपने को दूर रखना।
जान मार कर काम करना :- कड़ा परिश्रम करना।
जान मारना :- (१) मार डालना।
(२) परेशान करना।
(३) बहुत मेहनत करना।
(४) कड़ा काम लेना।
जान में जान आना :- धीरज बँधना, भय या घबराहट का संकट-काल टल जाना।
जान लेना :- (१) मार डालना।
(२) परेशान करना।
(३) कड़ा काम लेना।
जान सी निकलने लगना :- (१) बहुत कष्ट होना।
(२) संकट या कष्ट से घबड़ा जाना।
जान सूखना :- (१) भय या संकट के कारण स्तब्ध रह जाना।
(२) बहुत बुरा लगना, परंतु कुछ कह न सकना; खल जाना।
(३) बड़ा कष्ट होना।
जान से जाना :- (१) मरना।
(२) बहुत कष्ट सहना या परेशान होना।
जान से मारना :- प्राण लेना।
जान से हाथ धोना :- मर जाना।
जान हलकान (हलाकान) करना :- तंग या हैरान करना।
जान हलकान (हलाकान) होना :- तंग या परेशान होना।
जान हथेली पर लिये फिरना :- जान की परवाह न करके संकट का सामना करना।
जान होंठों पर आना :- (१) प्राण निकलने को होना।
(२) बहुत कष्ट होना।
उत्तम या श्रेष्ठ अंश या भाग, सार भाग या तत्व।
शोभा, सुंदरता, मजा या स्वाद बढ़ानेवाली चीज।
जान आना :- शोभा या सुंदरता बढ़ना।
बीतना, व्यर्थ जाना, निष्फल होना।
लागे (लागो) जान-बीतने लगे, व्यर्थ ही कटने लगे।
(क) हरि न मिले माई री जनम ऐसे ही लागो जान - २७४३। (ख) अब यों ही लागे दिन जान - २७४४।
पाऊँ जान-जाने का मार्ग पाऊँ।
चहुँ दिसि लंक - दुर्ग दानव दल, कैमैं पाऊँ जान - ९ - ७५।
जान-अजान :- जान बूझकर या बे समझे बुझे।
उ. - जान-अजान नाम जो लेइ। हरि बैकुँठ बास तिहिं देइ - ६ - ४।
अपनैं जान :- अपनी समझ में, जहाँ तक मेरी बुद्धि जाती है।
उ. - अपनै जान मैं बहुत करी - १ - ११५।
जान पड़ना :- (१) मालूम होना, प्रतीत होना।
(२) अनुभव होना।
जानकर अनजान बनना :- दूसरे को धोखा देने या स्वयं झंझट और परेशानी से बचने के लिए जानते हुए भी किसी प्रसंग में अनभिज्ञ बनना।
जान-बूझकर :- समझ-बूझकर, सोच-विचार कर।
जान रखना :- (१) ध्यान में रखना।
(२) (चेतावनी देते या धमकाते हुए) समझाना।
जानता (है), अनुभव करता (है)।
दीपक पीर न जानई (रे) पावक परत पतंग। तनु तौ तिहिं ज्वाला जरथौ। (पै) चित न भयौ रस - भंग - १ - ३२५।
कछु कुल - धर्म न जानई, रूप सकल जग राँच्यौ (हौं) - १ - ४४।
जाननेवाला, जानकारी रखनेवाला।
[हिं. जानना + कार (प्रत्य.)]
[हिं. जानना + कार (प्रत्य.)]
विषय या प्रसंग का ज्ञान या परिचय।
राजा जनक की पुत्री सीता जो श्रीरामचंद्र की पत्नी थीं।
इहिं बिधि सोच करत अति ही नृप, जानकि - शोर निरखि बिलखात - ९ - ३८।
जानकी जिनकी स्त्री है। वे रामचंद्र जी।
जानकी के लिए जीवनरूप हैं जो वे रामचंद्र जी।
जानकी के पति श्रीरामचंद्रजी।
सौ बातन की एकै बात। सब तजि भजौ जानकीनाथ।
तुलसीदास जी का एक काव्य जिसमें जानकी-विवाह वर्णित है।
जानकीरमण, जानकीरमन, जानकीरवन
जिहिं जिहिं भाइ करत जन - सेवा अंतर की गति जानते - १ - १३।
जिसमें बल या बूता हो, सबल।
किसी वस्तु या प्रसंग के संबंध में ज्ञान या जानकारी होना।
जानना-बूझना-ज्ञान या जानकारी रखना।
किसी का कुछ जानना :- (१) किसी से सहायता पाना।
(२) किसी के किये हुए उपकार को मानना।
मैं नहीं जानता :- मैं जिम्मेदार नहीं हूँ।
सूचना या खबर पाना या रखना।
सोचना, अनुमान करना, अटकल लड़ाना।
जनपद संबंधी वस्तु या प्रसंग।
[हिं. जानना + हार (प्रत्य.)]
मरने या नष्ट हो जानेवाला।
पौरि - पाट, टूटि परे, भागे दरवाना। लंका मैं सोर परथौ, अजहुँ तें न जाना - ९ - १३९।
गमन या प्रस्थान करना, अग्रसर होना।
किसी बात पर जाना :- किसी बात या कथन पर ध्यान देना या उसे मान लेना।
[हिं. जान + पन (प्रत्य.)]
[हिं. जान + पन (प्रत्य.)]
ज्ञानियों में श्रेष्ठ, बहुत बुद्धिमान व्यक्ति, सुजान।
वह जो स्वीकृति लेकर किसी पद पर काम करे।
उत्तराधिकारी।
ज्ञानियों में श्रेष्ठ, बहुत बुद्धिमान मनुष्य।
प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ। अति गंभीर उदार उदधि हरि जान सिरोमनिराई - १ - ८।
क्या जाना है :- क्या हानि होनी है ?
किसी बात से भी जाना :- बहुत कुछ करके भी कुछ हाथ या अधिकार न होना, कुछ करने योग्य न समझा जाना।
(समय) बीतना या व्यतीत होना।
नष्ट या चौपट होना, बिगड़ जाना।
जान कर, समझ कर, सूचना पाकर।
जैसे तुम गज कौ पाउँ छुड़ायौ। अपने जन कौं दुखित जानि कै पाउँ पियादे धायौ - १ - २०।
जानिहौं अब बाने की बात - १ - १७९।
(क) अबिगत - गति जानी न परै। मन - बच - कर्म अगाध अगोचर, किहि बिधि बुधि सँचरै - १ - १०५।
(ख) हरि, हौं महापतित, अभिमानी। परमारथ सौं बिरत, 'विषय - रत, भाव - भगति। नहिं नैंकहु जानी - १ - १४९।
(क) सूर स्याम उर ऊपर उबरे, यह सब घर - घर जानी - १० - ५३।
(ख) ब्रजे - भीतर उपज्यौ मेरौ रिपु, मैं जानी यह बात - १० - ६०।
(ग) उन ब्रज - बासिनि बात न जानी समुझे सूर सकट पग पेलत - - १० - ६३।
(घ) तुमहिं। भलैं करि जानी - ५३४।
जानी दुश्मन-प्राण का गाहक शत्रु।
जानु - जंघ त्रिभंग सुंदर कलित कंचन दंड - १ - ३०७।
जानु सुजानु करभ - कर प्राकृति, कटि - प्रदेस किंका राजै - १ - ६९।
पैयाँ पैयाँ, हाथ-पैरों के बल।
गौतम बुद्ध की पत्नी, यशोधरा।
गाय का पालन-पोषण करनेवाला।
गाइ लेहु मेरे गोपालहिं - १ - ७४।
सावधान हो, होश में आ, चेत जा।
रे मन, आपु कौ पहिचानि। सब जनम तें भ्रमत खोयौ, अजहुँ तौ कछु जानि - १ - ७०।
(क) जानि बँधाए श्री बनवारी ३९१।
(ख) औरन जानि जान मैं दीन्हौ - १० - ३१४।
जानि बुझि :- जान बूझकर, सब कुछ समझते हुए भी।
उ. - जानि-बूझि मैं होत - अजान - १ - ३४२।
मेरे जीव ऐसी आवत भइ चतुरानन की माँझ। सूर बिन मिले प्रलय जानिबो इनही दिवसनि साँझ - २७६२।
जानता (हूँ), समझता (हूँ), अनुभव करता (हैं)।
जे जे जात, परत ते भूतल, ज्यौं ज्वालागत चीर। कौन सहाइ, जानियत नाहीं, होत बीर निर्बोर - १ - २६९।
ना जानियै अहि धौं को वह, ग्वाल रूप बपु धारि - ६०४।
और बात नहिं जानूँ - सारा. ११७।
तो मैं जानूँ :- (यदि अमुक कार्य हो जाय या बात ठीक सिद्ध की जा सके) तो मैं समझूँ।
जान लेता है, ज्ञान रखता है। अनुभव करता है।
मन - बानी कौं अगम अगोचर सो जानै जो पावै - १ - २।
तब जानौगे :- (सावधान या मना करते हुए कहना कि अमुक कार्य करने पर) बुरा फल या परिणाम देखोगे।
उ. - अव जु कालि ते अनत सिधारो तब जानौगे तुम्हहिं हरी - ११८४।
माधौ जू, मोते और न पापी। लंपट, धूत, पूत दमरी कौ, बिषय - जाप कौ जापी - १ - १४०।
इन नैननि के नीर सखी री सेज भई घरनाव। चाहत हौं ताही पै चढिकै हरि जी के ढिग जाब - २७९८।
एक मुनि जिनकी माता का नाम जबला था। सत्यकाम नाम से भी इन्हें पुकारा जाता है।
पता हुआ, मालूम पड़ा, जाना, ज्ञात हुआ।
रावन सौ नृप ज़ात न जान्यौ माया बिषम सीस पर नाची - १ - १७।
पायौ बीच इंद्र अभिमानी हरि बिन गोकुल जान्यौ - २८२०।
मंत्र या स्तोत्र की विधिपूर्वक प्रवृत्ति।
लंपट - धूत, पूत दमरी कौ, बिषयजाप कौ जापी - १ - १४०।
भगवान के नाम का बार-बार स्मरण-उच्चारण।
जापर दीनानाथ ढरै। सोइ कुलीन, बड़ौ। सुंदर सोइ, जिहिं पर कृपा करै - १ - ३५।
[हिं. जा=जो+पर (प्रत्य.)]
एक ऋषि जो राजा दशरथ के गुरु और मंत्री थे। इन्होंने चित्रकूट-सभा में राम को घर लौटने के लिए समझाया था।
पहर, प्रहर, तीन घंटे का समय।
रघुनाथ पियारे, आजु रहो (हौ)। चारि जाम बिस्राम हमारैं, छिन - छिन मीठे बचन कह्यौ (हो) - ९ - ३३।
विरह दुख जहाँ नाहिं जामत नहीं उपजै प्रेम - २९०९।
एक ढीला-ढाला पहनावा जो प्रायः विवाह आदि के अवसर पर अब भी पहना जाता है।
जामे से बाहर होना :- बहुत क्रुद्ध होना।
जामा (जामे) में फूला न समाना :- बहुत प्रसन्न होना।
तनया जामातनि कौं समदत, नैन नीर भरि आए - ९ - २७।
[सं. जामातृ+हिं. (प्रत्य.)]
जमदग्नि के पुत्र परशुराम।
शीशे या अबरक की बनी पेटी।
वह दही या खट्टा पदार्थ जो दूध जमाने के काम आता है।
सुग्रीव का मित्र जो ब्रह्मा का पुत्र था। त्रेता में इसने श्रीरामचंद्र की सहायता की थी, द्वापर में श्रीकृष्ण ने इसे हरा कर इसकी कन्या जांबवती से विवाह किया था और सतयुग में इसने वामन, भगवान की परिक्रमा की थी।
जांबवान की पुत्री जो श्रीकृष्ण को ब्याही थी।
रिच्छराज वह मनि तासौ लै जामवती कहँ दीन्हीं - १० उ. २६।
जाम रहत जामिनि के बीतें, तिहिं शौसर उठि धाऊँ। सकुच होत सुकुमार नींद मैं, कैसैं प्रभुहिं जगाऊँ - ९ - १७२।
एक छोटा बेर के बराबर फल जिसका रंग बैंगनी और काला होता है।
दधि - सुत जामे नंद - दुवार - १० - १७३।
रायबरेली का समीपवर्ती एक प्राचीन स्थान जहाँ सूफी फकीरों की गद्दी हैं।
जरा मरन ते रहित अमाया। मात पिता सुत बंधु न जया।
जाल का झोला जिसमें कंकड़पत्थर रखकर चलाये या फेके जायँ।
ग्वालिनी, गोपपत्नी या गोपकुमारी।
ब्रज की गोपालक जाति की वे स्त्रियाँ या कन्याएँ जो श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं और जिन्होंने उनकी बालक्रीड़ा तथा अन्य लीलाओं का सुख उठाया था।
जना, पैदा किया, जन्म दिया।
(क) मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ। मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौं, तू जसुमति कब जायौ - १० - २१५।
(ख) धनि जसुमति ऐसो सुत जायौ - १० - २४८।
उत्पन्न या पैदा किया हुआ।
अहो जसोदा कत त्रासति हौ यहै कोखि कौ जायौ - ३५६।
दसौं दिसि तैं कर्म रोक्यौ, मीन कौं ज्यौं जार - २ - ४।
चले छुड़ाय छिनक मैं तबहीं जार दई सब लंक - सारा. २८६।
जन्मपत्री में पड़नेवाला एक योग जिससे ज्ञात होता है कि संतान जारज है।
(क) काल अगिनि सबही जग जारत - १ - २८४।
(ख) हौं तो मोहन को बिरहजरी रे तू कत जारत रे पापी - २८४९।
(क) अस्वत्थामा बहुरि खिस्याइ। ब्रह्म - अस्त्र कौं दियौ चलाइ। गर्भ परीच्छित जारन गयौ। तब हरि ताहि जरननहिं दयौ - १ - २८९।
(ख) पुनि रिषिहूँ कौं जारन लाग्यौ - ९ - ५।
कार्तिक शुक्ल अष्टमी जब श्रीकृष्ण ने गैया चराना शुरू किया था।
आरजपंथ छिड़ाय गोपिकन अपने स्वारथ भोरी - २८६२।
करि प्रति हार तज्यौ सुर गोपुर कंचकोट सन फूट्यौ - २७५२।
गोपों में श्रेष्ठ श्रीनंद।
छिपाने या गुप्त रखनेवाली।
भतृहरि की बहन मैनावती का पुत्र जो रंगपुर (बंगाल) का राजा था और माता के उपदेश से वैरागी हो गया था।
एक पीली मिट्टी जो द्वारका के उस सरोवर से निकलती है जिसके किनारे जाकर, श्रीकृष्ण के स्वर्गवासी होने पर, अनेक गोपियों ने प्राण तजे थे।
गाइ.गोप - गोपीजन कारन गिरि कर - कमल लियो - १ - १२१।
सरोवर जहाँ गैयाँ जल पिएँ।